bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
/
Luke 11
Luke 11
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
← Chapter 10
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 12 →
1
एक समय येशु किसी स्थान पर प्रार्थना कर रहे थे। प्रार्थना समाप्त होने पर उनके एक शिष्य ने उनसे कहा, “प्रभु! हमें प्रार्थना करना सिखाइए, जैसे योहन ने अपने शिष्यों को सिखाया है।”
2
येशु ने शिष्यों से कहा, “जब तुम प्रार्थना करते हो, तब यह कहो: पिता! तेरा नाम पवित्र माना जाए। तेरा राज्य आए।
3
हमें प्रतिदिन हमारा दैनिक भोजन दिया कर।
4
हमारे पाप क्षमा कर, क्योंकि हम भी अपने सब अपराधियों को क्षमा करते हैं और हमें परीक्षा में न डाल।”
5
येशु ने उन से यह भी कहा, “मान लो कि तुम में कोई आधी रात को अपने किसी मित्र के पास जा कर कहे, ‘मित्र, मुझे तीन रोटियाँ उधार दो,
6
क्योंकि मेरा एक मित्र सफर में मेरे यहाँ पहुँचा है और उसे खिलाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है।’
7
और वह घर के भीतर से उत्तर दे, ‘मुझे तंग न करो। अब तो द्वार बन्द हो चुका है। मेरे बाल-बच्चे मेरे साथ बिस्तर पर हैं। मैं उठ कर तुम को कुछ नहीं दे सकता।’
8
मैं तुम से कहता हूँ−वह मित्रता के नाते भले ही उठ कर उसे कुछ न दे, किन्तु उसके लज्जा छोड़कर माँगने के कारण वह उठेगा और उसकी आवश्यकता पूरी करेगा।
9
“मैं तुम से कहता हूँ−माँगो तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो तो तुम पाओगे; खटखटाओ तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा।
10
क्योंकि जो माँगता है, उसे मिलता है; जो ढूँढ़ता है, वह पाता है और जो खटखटाता है, उसके लिए द्वार खोला जाता है।
11
“यदि तुम्हारा पुत्र तुम से मछली माँगे, तो तुम में ऐसा कौन पिता है जो मछली के बदले उसे साँप देगा?
12
अथवा अण्डा माँगे, तो उसे बिच्छू देगा?
13
बुरे होने पर भी यदि तुम अपने बच्चों को सहज ही अच्छी वस्तुएँ देते हो, तो स्वर्गिक पिता अपने माँगने वालों को पवित्र आत्मा क्यों नहीं देगा?”
14
येशु एक भूत को जो गूँगा था, निकाल रहे थे। भूत के निकलते ही गूँगा मनुष्य बोलने लगा और लोग अचम्भे में पड़ गये।
15
परन्तु उन में से कुछ ने कहा, “यह भूतों के नायक बअलजबूल की सहायता से भूतों को निकालता है।”
16
कुछ लोगों ने येशु की परीक्षा लेने के लिए उन से स्वर्ग का कोई चिह्न माँगा।
17
परंतु येशु जानते थे कि वे क्या सोच रहे हैं। अत: येशु ने उन से कहा, “जिस राज्य में फूट पड़ जाती है, वह उजड़ जाता है और घर के घर ढह जाते हैं।
18
यदि शैतान के यहाँ फूट पड़ गई हो, तो उसका राज्य कैसे टिका रहेगा? क्योंकि तुम कहते हो कि मैं बअलजबूल की सहायता से भूतों को निकालता हूँ।
19
यदि मैं बअलजबूल की सहायता से भूतों को निकालता हूँ, तो तुम्हारे पुत्र किसकी सहायता से उन्हें निकालते हैं? इसलिए वे तुम लोगों का न्याय करेंगे।
20
परन्तु यदि मैं परमेश्वर की अंगुली से भूतों को निकालता हूँ, तो निस्संदेह परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है।
21
“जब बलवान मनुष्य हथियार बाँध कर अपने भवन पर पहरा देता है, तो उसकी धन-सम्पत्ति सुरक्षित रहती है।
22
किन्तु यदि कोई उस से भी अधिक बलवान उस पर टूट पड़े और उसे हरा दे, तो जिन हथियारों पर उसे भरोसा था, वह उन्हें उससे छीन लेता और उसकी लूटी धन-सम्पत्ति को बाँट देता है।
23
“जो मेरे साथ नहीं है, वह मेरे विरोध में है और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।
24
“जब अशुद्ध आत्मा किसी मनुष्य से निकल जाती है, तो वह विश्राम की खोज में सूखे स्थानों में भटकती फिरती है। विश्राम न मिलने पर वह कहती है, ‘जहाँ से मैं आई हूँ, वहीं अपने घर वापस जाऊंगी’।
25
लौटने पर वह उस घर को झाड़ा-बुहारा और सजा-सजाया हुआ पाती है।
26
तब वह जाकर अपने से भी अधिक बुरी सात आत्माओं को ले आती है और वे उस घर में प्रवेश कर वहीं बस जाती हैं। इस प्रकार उस मनुष्य की यह पिछली दशा पहली से भी अधिक बुरी हो जाती है।”
27
येशु ये बातें कह ही रहे थे कि भीड़ में से कोई स्त्री उन्हें सम्बोधित करते हुए ऊंचे स्वर से बोल उठी, “धन्य है वह गर्भ, जिसने आप को धारण किया और धन्य हैं वे स्तन जिनका आपने पान किया है!”
28
परन्तु येशु ने कहा, “किन्तु वे कहीं अधिक धन्य हैं, जो परमेश्वर का वचन सुनते और उसका पालन करते हैं।”
29
जब और भीड़ एकत्र होने लगी तब येशु कहने लगे, “यह दुष्ट पीढ़ी है। यह चिह्न माँगती है, परन्तु नबी योना के चिह्न को छोड़ इसे और कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।
30
जिस प्रकार योना नीनवे महानगर के निवासियों के लिए एक चिह्न बन गया था, उसी प्रकार मानव-पुत्र भी इस पीढ़ी के लिए चिह्न बन जाएगा।
31
न्याय के दिन दक्षिण देश की रानी इस पीढ़ी के लोगों के साथ खड़ी होगी और इन्हें दोषी ठहराएगी, क्योंकि वह सुलेमान की बुद्धि से परिपूर्ण बातें सुनने के लिए पृथ्वी के छोर से आयी थी, और देखो−यहाँ वह है, जो सुलेमान से भी महान् है!
32
न्याय के दिन नीनवे के लोग इस पीढ़ी के साथ खड़े होंगे और इसे दोषी ठहराएँगे, क्योंकि उन्होंने योना का संदेश सुन कर पश्चात्ताप किया था, और देखो−यहाँ वह है, जो योना से भी बड़ा है!
33
“दीपक जला कर कोई उसे तहखाने में या पैमाने के नीचे नहीं, बल्कि दीवट पर रखता है, जिससे भीतर आने वालों को उसका प्रकाश मिले।
34
तुम्हारी आँख तुम्हारे शरीर का दीपक है। यदि तुम्हारी आँखें अच्छी हैं, तो तुम्हारा सारा शरीर भी प्रकाशमान है। किन्तु यदि वे खराब हो जाएँ, तो तुम्हारा शरीर भी अंधकारमय है।
35
इसलिए इस बात का ध्यान रखो कि जो ज्योति तुम में है, वह अन्धकार न हो जाए।
36
यदि तुम्हारा सारा शरीर प्रकाश में है और उसका कोई अंश अन्धकार में नहीं, तो वह वैसा ही सर्वथा प्रकाशमान होगा, जैसा जब दीपक अपनी किरणों से तुम को आलोकित कर देता है।”
37
येशु बोल ही रहे थे कि किसी फरीसी ने उन से यह निवेदन किया, “आप मेरे साथ भोजन करें।” येशु भीतर जा कर भोजन करने बैठे।
38
फरीसी को यह देख कर आश्चर्य हुआ कि येशु ने भोजन से पहले हाथ-पैर नहीं धोये।
39
प्रभु ने उससे कहा, “तुम फरीसी लोग कटोरों और थालियों को बाहर से तो माँजते हो, परन्तु तुम्हारे भीतर लालच और दुष्टता भरी है।
40
मूर्खो! जिसने बाहरी भाग बनाया, क्या उसी ने भीतरी भाग नहीं बनाया?
41
जो भीतर है, उसमें से दान कर दो, और देखो, सब कुछ तुम्हारे लिए शुद्ध हो जाएगा।
42
“फरीसियो! धिक्कार है तुम लोगों को! क्योंकि तुम पुदीने, सदाब और हर प्रकार के साग का दशमांश तो देते हो; लेकिन न्याय और परमेश्वर के प्रति प्रेम की उपेक्षा करते हो। तुम्हारे लिए उचित तो यह था कि तुम इन्हें भी करते रहते और उनकी भी उपेक्षा नहीं करते।
43
फरीसियो! धिक्कार है तुम लोगों को! क्योंकि तुम सभागृहों में प्रथम आसन और बाजारों में प्रणाम चाहते हो।
44
धिक्कार है तुम लोगों को! क्योंकि तुम उन कबरों के समान हो, जो दीख नहीं पड़तीं और जिन पर लोग अनजाने ही चलते-फिरते हैं।”
45
इस पर व्यवस्था के एक आचार्य ने येशु से कहा, “गुरुवर! आप ऐसी बातें कह कर हमारा भी अपमान करते हैं।”
46
येशु ने उत्तर दिया, “व्यवस्था के आचार्यो! धिक्कार है तुम लोगो को भी! क्योंकि तुम मनुष्यों पर ऐसे बोझ लादते हो जिन्हें ढोना कठिन है, परन्तु स्वयं उन्हें उठाने के लिए अपनी एक उँगली भी नहीं लगाते।
47
धिक्कार है तुम लोगों को! क्योंकि तुम नबियों के लिए मकबरे बनवाते हो, जब कि तुम्हारे पूर्वजों ने उनकी हत्या की।
48
इस प्रकार तुम अपने पूर्वजों के कर्मों की गवाही देते हो और उन कर्मों से सहमत भी हो, क्योंकि उन्होंने तो उनकी हत्या की और तुम उनके मकबरे बनवाते हो।
49
“इसलिए परमेश्वर की प्रज्ञ ने यह कहा, ‘मैं उनके पास नबियों और प्रेरितों को भेजूँगी; वे उन में से कितनों की हत्या करेंगे और कितनों पर अत्याचार करेंगे।
50
इसलिए संसार के आरम्भ से जितने नबियों का रक्त बहाया गया है−हाबिल के रक्त से ले कर जकर्याह के रक्त तक, जो वेदी और मन्दिरगर्भ के बीच मारा गया था−उसका हिसाब इस पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा। मैं तुम से कहता हूँ, उसका हिसाब इसी पीढ़ी को चुकाना पड़ेगा।
52
“व्यवस्था के आचार्यो, धिक्कार है तुम लोगों को! क्योंकि तुम ने ज्ञान की कुंजी ली तो है। पर तुम ने स्वयं प्रवेश नहीं किया, और जो प्रवेश कर रहे थे, उन्हें रोक दिया।”
53
जब येशु उस घर से निकले, तब शास्त्री और फरीसी बुरी तरह उनके पीछे पड़ गये और बहुत-सी बातों के सम्बन्ध में उन से प्रश्न करने लगे।
54
वे इस ताक में थे कि येशु के मुँह से निकली कोई बात पकड़ें।
← Chapter 10
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 12 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24