bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible (ERV) (पवित्र बाइबल)
/
Ezekiel 20
Ezekiel 20
Hindi Bible (ERV) (पवित्र बाइबल)
← Chapter 19
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 43
Chapter 44
Chapter 45
Chapter 46
Chapter 47
Chapter 48
Chapter 21 →
1
एक दिन इस्राएल के अग्रजों (प्रमुखों) में से कुछ मेरे पास यहोवा की राय पूछने आए। यह पाँचवें महीने (अगस्त) का दसवाँ दिन और देश—निकाले का सातवाँ वर्ष था। अग्रज (प्रमुख) मेरे सामने बैठे।
2
तब यहोवा का वचन मेरे पास आया। उसने कहा,
3
“मनुष्य के पुत्र, इस्राएल के अग्रजों (प्रमुखों) से बात करो। उनसे कहो, ‘मेरा स्वामी यहोवा, ये बातें बताता है: क्या तुम लोग मेरी सलाह मांगने आये हो यदि तुम लोग आए हो तो मैं तुम्हें यह नहीं दूँगा। मेरे स्वामी यहोवा ने यह बात कही।’
4
क्या तुम्हें उनका निर्णय करना चाहिए मनुष्य के पुत्र क्या तुम उनका निर्णय करोगे तुम्हें उन्हें उन भयंकर पापों के बारे में बताना चाहिए जो उनके पूर्वजों ने किये थे।
5
तुम्हें उनसे कहना चाहिए, ‘मेरा स्वामी यहोवा यह कहता है: जिस दिन मैंने इस्राएल को चुना, मैंने अपना हाथ याकूब के परिवार के ऊपर उठाया और मैंने मिस्र देश में उनसे एक प्रतिज्ञा की। मैंने अपना हाथ उठाया और कहा: “मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ।”
6
उस दिन मैंने तुम्हें मिस्र से बाहर लाने का वचन दिया था और मैं तुमको उस प्रदेश में लाया जिसे मैं तुम्हें दे रहा था। वह एक अच्छा देश था जो अनेक अच्छी चीजों से भरा था। यह सभी देशों से अधिक सुन्दर था!
7
“‘मैंने इस्राएल के परिवार से उनकी भयंकर देवमूर्तियों को फेंकने के लिये कहा। मैंने, उन मिस्र की गन्दी देवमूर्तियों के साथ उन्हें गन्दा न होने के लिये कहा। “मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा हूँ।”
8
किन्तु वे मेरे विरुद्ध हो गये और उन्होंने मेरी एक न सुनी। उन्होंने अपनी भयंकर देवमूर्तियों को नहीं फेंका। उन्होंने अपनी गन्दी देवमूर्तियों को मिस्र में नहीं छोड़ा। इसलिये मैंने (परमेश्वर ने) उन्हें मिस्र में नष्ट करने का निर्णय किया अर्थात् अपने क्रोध की पूरी शक्ति का अनुभव कराना चाहा।
9
किन्तु मैंने उन्हें नष्ट नहीं किया। मैं लोगों से जहाँ वे रह रहे थे पहले ही कह चुका था कि मैं अपने लोगों को मिस्र से बाहर ले जाऊँगा। मैं अपने अच्छे नाम को समाप्त नहीं करना चाहता, इसलिये मैंने उन लोगों के सामने इस्राएलियों को नष्ट नहीं किया।
10
मैं इस्राएल के परिवार को मिस्र से बाहर लाया। मैं उन्हें मरूभूमि में ले गया।
11
तब मैंने उनको अपने नियम दिये। मैंने उनको सारे नियम बताये। यदि कोई व्यक्ति उन नियमों का पालन करेगा तो वह जीवित रहेगा।
12
मैंने उनको विश्राम के सभी विशेष दिनों के बारे में भी बताया। वे पवित्र दिन उनके और मेरे बीच विशेष प्रतीक थे। वे यह संकेत करते थे कि मैं यहोवा हूँ और मैं उन्हें अपने विशेष लोग बना रहा हूँ।
13
“‘किन्तु इस्राएल का परिवार मरूभूमि में मेरे विरुद्ध उठ खड़ा हुआ। उन्होंने मेरे नियमों का अनुसरण नहीं किया। उन्होंने मेरे नियमों का पालन करने से इन्कार किया और वे नियम अच्छे हैं। यदि कोई व्यक्ति उनका पालन करेगा तो वह जीवित रहेगा। उन्होंने मेरे विशेष विश्राम के दिनों के प्रति ऐसा व्यवहार किया मानो उनका कोई महत्व न हो। वे उन दिनों में अनेकों बार काम करते रहे। मैंने मरूभूमि में उन्हें नष्ट करने का निश्चय किया अर्थात् अपने क्रोध की पूरी शक्ति का अनुभव उन्हें कराना चाहा।
14
किन्तु मैंने उन्हें नष्ट नहीं किया। अन्य राष्ट्रों ने मुझे इस्राएल को मिस्र से बाहर लाते देखा। मैं अपने अच्छे नाम को समाप्त नहीं करना चाहता था, इसलिए मैंने उन राष्ट्रों के सामने इस्राएल को नष्ट नहीं किया।
15
मैंने मरूभूमि में उन लोगों को एक और वचन दिया। मैंने वचन दिया कि मैं उन्हें उस प्रदेश में नहीं लाऊँगा जिसे मैं उन्हें दे रहा हूँ। वह अनेक चीजों से भरा एक अच्छा प्रदेश था। यह सभी देशों से अधिक सुन्दर था।
16
“‘इस्राएल के लोगों ने मेरे नियमों का पालन करने से इन्कार किया। उन्होंने मेरे नियमों का अनुसरण नहीं किया। उन्होंने मेरे विश्राम के दिनों को ऐसे लिया मानो वे महत्व नहीं रखते। उन्होंने ये सभी काम इसलिये किये कि उनका हृदय उन गन्दी देवमूर्तियों का हो चुका था।
17
किन्तु मुझे उन पर करूणा आई, अत: मैंने उन्हें नष्ट नहीं किया। मैंने उन्हें मरुभूमि में पूरी तरह नष्ट नहीं किया।
18
मैंने उनके बच्चों से बाते कीं। मैंने उनसे कहा, “अपने माता—पिता जैसे न बनो। उनकी गन्दी देवमूर्तियों से अपने को गन्दा न बनाओ। उनके नियमों का अनुसरण न करो। उनके आदेशों का पालन न करो।
19
मैं यहोवा हूँ। मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ। मेरे नियमों का पालन करो। मेरे आदेशों को मानो। वह काम करो जो मैं कहूँ।
20
यह प्रदर्शित करो कि मेरे विश्राम के दिन तुम्हारे लिये महत्वपूर्ण हैं। याद रखो कि वे तुम्हारे और हमारे बीच विशेष प्रतीक हैं। मैं यहोवा हूँ और वे पवित्र दिन यह संकेत करते हैं कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ।”
21
“‘किन्तु वे बच्चे मेरे विरुद्ध हो गये। उन्होंने मेरे नियमों का पालन नहीं किया। उन्होंने मेरे आदेश नहीं माने। उन्होंने वे काम नहीं किये जो मैंने उनसे कहा वे अच्छे नियम थे। यदि कोई उनका पालन करेगा तो वह जीवित रहेगा। उन्होंने मेरे विश्राम के दिनों को ऐसे लिया मानों वे महत्व न रखते हों। इसलिये मैंने उन्हें मरूभूमि में पूरी तरह नष्ट करने का निश्चय किया जिससे वे मेरे क्रोध की पूरी शक्ति का अनुभव कर सकें।
22
लेकिन मैंने अपने को रोक लिया। अन्य राष्ट्रों ने मुझे इस्राएल को मिस्र से बाहर लाते देखा। जिससे मेरा नाम अपवित्र न हो। इसलिये मैंने उन अन्य देशों के सामने इस्राएल को नष्ट नहीं किया।
23
इसलिये मैंने मरुभूमि में उन्हें एक और वचन दिया। मैंने उन्हें विभिन्न राष्ट्रों में बिखेरने और दूसरे अनेकों देशों में भेजने की प्रतीज्ञा की।
24
“‘इस्राएल के लोगों ने मेरे आदेश का पालन नहीं किया। उन्होंने मेरे नियमों को मानने से इन्कार कर दिया। उन्होंने मेरे विशेष विश्राम के दिनों को ऐसे लिया मानो वे महत्व न रखते हों। उन्होंने अपने पूर्वजों की गन्दी देवमूर्तियों को पूजा।
25
इसलिये मैंने उन्हें वे नियम दिये जो अच्छे नहीं थे। मैंने उन्हें वे आदेश दिये जो उन्हें सजीव नहीं कर सकते थे।
26
मैंने उन्हें अपनी भेंटों से अपने आप को गन्दा बनाने दिया। उन्होंने अपने प्रथम उत्पन्न बच्चों तक की बलि चढ़ानी आरम्भ कर दी। इस प्रकार मैंने उन लोगों को नष्ट करना चाहा। तब वे समझे कि मैं यहोवा हूँ।’
27
अत: मनुष्य के पुत्र, अब इस्राएल के परिवार से कहो। उनसे कहो, ‘मेरा स्वामी यहोवा ये बातें कहता है: इस्राएल के लोगों ने मेरे विरुद्ध बुरी बातें कहीं और मेरे विरुद्ध बुरी योजनायें बनाई।
28
किन्तु मैं इसके होते हुए भी, उन्हें उस प्रदेश में लाया जिसे देने का वचन मैंने दिया था। उन्होंने उन पहाड़ियों और हरे वृक्षों को देखा अत: वे उन सभी स्थानों पर पूजा करने गये। वे अपनी बलियाँ तथा क्रोध—भेंटें उन सभी स्थानों को ले गए। उन्होंने अपनी वे बलियाँ चढ़ाई जो मधुर गन्ध वाली थी और उन्होंने अपनी पेय—भेंटे उन स्थानों पर चढ़ाई।
29
मैंने इस्राएल के लोगों से पूछा कि वे उन ऊँचे स्थान पर क्यों जा रहे हैं। लेकिन वे ऊँचे स्थान आज भी वहाँ हैं।’”
30
परमेश्वर ने कहा, “इस्राएल के लोगों ने उन सभी बुरे कामों को किया। अत: इस्राएल के लोगों से बात करो। उनसे कहो, ‘मेरा स्वामी यहोवा यह कहता है: तुम लोगों ने उन कामों को करके अपने को गन्दा बना लिया है जिन्हें तुम्हारे पूर्वजों ने किया। तुमने एक वेश्या की तरह काम किया है। तुमने उन भयंकर देवताओं के साथ मुझे छोड़ दिया है जिनकी पूजा तुम्हारे पूर्वज करते थे।
31
तुम उसी प्रकार की भेंट चढ़ा रहे हो। तुम अपने बच्चों को आग में (असत्य देवताओं की भेंट के रूप में) डाल रहे हो। तुम अपने को आज भी गन्दी देवमूर्तियों से गन्दा बना रहे हो! क्या तुम सचमुच सोचते हो कि मैं तुम्हें अपने पास आने दूँगा और अपनी सलाह मांगने दूँगा मैं यहोवा और स्वामी हूँ। मैं अपने जीवन की शपथ खाकर प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर नहीं दूँगा और तुम्हें सलाह नहीं दूँगा!
32
तुम कहते रहते हो कि तुम अन्य राष्ट्रों की तरह होओगे। तुन उन राष्ट्रों के लोगों की तरह रहते हो। तुम लकड़ी और पत्थर के खण्डों (देवमूर्तियों) की पूजा करते हो!’”
33
मेरा स्वामी यहोवा कहता है, “अपने जीवन की शपथ खाकर मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं तुम्हारे ऊपर राजा की तरह शासन करुँगा। मैं अपनी शक्तिशाली भुजाओं को उठाऊँगा और तुम्हें दण्ड दूँगा। मैं तुम्हारे विरुद्ध अपना क्रोध प्रकट करुँगा!
34
मैं तुम्हें इन अन्य राष्ट्रों से बाहर लाऊँगा। मैंने तुम लोगों को उन राष्ट्रों में बिखेरा। किन्तु मैं तुम लोगों को एक साथ इकट्ठा करुँगा और इन राष्ट्रों से वापस लौटाऊँगा। किन्तु मैं अपनी शक्तिशाली भुजाएं उठाऊँगा और तुम्हें दण्ड दूँगा। मैं तुम्हारे विरुद्ध अपना क्रोध प्रकट करुँगा।
35
मैं पहले की तरह तुम्हें मरुभूमि में ले चलूँगा। किन्तु यह वह स्थान होगा जहाँ अन्य राष्ट्र रहते हैं। हम आमने—सामने खड़े होंगे और मैं तुम्हारे साथ न्याय करुँगा।
36
मैं तुम्हारे साथ वैसा ही न्याय करुँगा जैसा मैंने तुम्हारे पूर्वजों के साथ मिस्र की मरुभूमि में किया था।” मेरे स्वामी यहोवा ने ये बातें कहीं।
37
“मैं तुम्हें अपराधी प्रमाणित करुँगा और साक्षीपत्र के अनुसार तुम्हें दण्ड दूँगा।
38
मैं उन सभी लोगों को दूर करुँगा जो मेरे विरुद्ध खड़े हुए और जिन्होंने मेरे विरुद्ध पाप किये। मैं उन लोगों को तुम्हारी जन्मभूमि से दूर करुँगा। वे इस्राएल देश में फिर कभी नहीं लौटेंगे। तब तुम जानोगे कि मैं यहोवा हूँ।”
39
इस्राएल के परिवार, अब सुनो, मेरा स्वामी यहोवा यह कहता है, “यदि कोई व्यक्ति अपनी गन्दी देवमूर्तियों की पूजा करना चाहता है तो उसे जाने दो और पूजा करने दो। किन्तु बाद में यह न सोचना कि तुम मुझसे कोई सलाह पाओगे! तुम मेरे नाम को भविष्य में और अधिक अपवित्र नहीं कर सकोगे! उस समय नहीं, जब तुम अपने गन्दी देवमूर्तियों को भेंट देना जारी रखते हो।”
40
मेरा स्वामी यहोवा कहता है, “लोगों को मेरी सेवा के लिये मेरे पवित्र—इस्राएल के ऊँचे पर्वत पर आना चाहिए! इस्राएल का सारा परिवार अपनी भूमि पर होगा वे वहाँ अपने देश में होंगे। यह वह ही स्थान है जहाँ तुम आ सकते हो और मेरी सलाह मांग सकते हो और तुम्हें उस स्थान पर मुझे अपनी भेंट चढ़ाने आना चाहिये। तुम्हें अपनी फसल का पहला भाग वहाँ उस स्थान पर लाना चाहिये। तुम्हें अपनी सभी पवित्र भेंटें वहीं लानी चाहिये।
41
तब तुम्हारी भेंट की मधुर गन्ध से प्रसन्न होऊँगा। यह सब होगा जब मैं तुम्हें वापस लाऊँगा। मैंने तुम्हें विभिन्न राष्ट्रों में बिखेरा था। किन्तु मैं तुम्हें एक साथ इकट्ठा करुँगा और तुम्हें फिर से अपने विशेष लोग बनाऊँगा और सभी राष्ट्र यह देखेंगे।
42
तब तुम समझोगे कि मैं यहोवा हूँ। तुम यह तब जानोगे जब मैं तुम्हें इस्राएल देश में वापस लाऊँगा। यह वही देश है जिसे मैंने तुम्हारे पूर्वजों को दने का वचन दिया था।
43
उस देश में तुम उन बुरे पापों को याद करोगे जिन्होंने तुम्हें दोषी बनाया और तुम लज्जित होगे।
44
इस्राएल के परिवार! तुमने बहुत बुरे काम किये और तुम लोगों को उन बुरे कामों के कारण नष्ट कर दिया जाना चाहिए। किन्तु अपने नाम की रक्षा के लिये मैं वह दण्ड तुम लोगों को नहीं दूँगा जिसके पात्र तुम लोग हो। तब तुम जानोगे कि मैं यहोवा हूँ।” मेरे स्वामी यहोवा ने ये बातें कहीं।
45
तब यहोवा का वचन मुझे मिला। उसने कहा,
46
“मनुष्य के पुत्र, यहूदा के दक्षिण भाग नेगव की ओर ध्यान दो। नेगव—वन के विरुद्ध कुछ कहो।
47
नेगव—वन से कहो, ‘यहोवा के सन्देश को सुनो। मेरे स्वामी यहोवा ने ये बातें कहीं: ध्यान दो, मैं तुम्हारे वन में आग लगाने वाला हूँ। आग हर एक हरे वृक्ष और हर एक सूखे वृक्ष को नष्ट करेगी। जो लपटें जलेंगी उन्हें बुझाया नहीं जा सकेगा। दक्षिण से उत्तर तक सारा देश अग्नि से जला दिया जाएगा।
48
तब लोग जानेंगे कि मैंने अर्थात यहोवा ने आग लगाई है। आग बुझाई नहीं जा सकेंगी!’”
49
तब मैंने (यहेजकेल) ने कहा, “हे मेरे स्वामी यहोवा! यदि मैं इन बातों को कहता हूँ तो लोग कहेंगे कि मैं उन्हें केवल कहानियाँ सुना रहा हूँ। वे नहीं सोचेंगे कि यह सचमुच घटित होगा!”
← Chapter 19
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 43
Chapter 44
Chapter 45
Chapter 46
Chapter 47
Chapter 48
Chapter 21 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28
29
30
31
32
33
34
35
36
37
38
39
40
41
42
43
44
45
46
47
48