bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
/
Acts 5
Acts 5
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
← Chapter 4
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 6 →
1
हनन्याह नामक एक व्यक्ति ने अपनी पत्नी सफीरा के साथ मिलकर अपनी कुछ संपत्ति बेची
2
और उसके मूल्य में से कुछ अपने लिए रख लिया—यह बात उसकी पत्नी भी जानती थी—और उसका एक भाग लाकर प्रेरितों के चरणों में रख दिया।
3
परंतु पतरस ने कहा, “हनन्याह, शैतान ने तेरे मन में यह बात क्यों डाली कि तू पवित्र आत्मा से झूठ बोले और भूमि के मूल्य में से कुछ अपने लिए रख ले?
4
जब वह तेरे पास रही, तो क्या वह तेरी न थी? और जब बिक गई तो क्या तेरे अधिकार में न थी? फिर तेरे मन में ऐसा करने का विचार क्यों आया? तूने मनुष्यों से नहीं, परंतु परमेश्वर से झूठ बोला है।”
5
इन शब्दों को सुनते ही हनन्याह गिर पड़ा और दम तोड़ दिया; और सब सुननेवालों पर बड़ा भय छा गया।
6
तब जवानों ने उठकर उसके शव को कपड़े में लपेटा और बाहर ले जाकर गाड़ दिया।
7
फिर लगभग तीन घंटे के बाद ऐसा हुआ कि उसकी पत्नी, जो इस घटना से अनजान थी, भीतर आई।
8
पतरस ने उससे कहा, “मुझे बता, क्या तुमने वह भूमि इतने में ही बेची थी?” उसने कहा, “हाँ, इतने में ही।”
9
तब पतरस ने उससे कहा, “तुम दोनों प्रभु के आत्मा की परीक्षा करने के लिए क्यों एकमत हुए? देख, तेरे पति के गाड़नेवाले द्वार पर ही हैं और वे तुझे भी बाहर ले जाएँगे।”
10
वह तुरंत उसके पैरों पर गिर पड़ी और दम तोड़ दिया। फिर जवानों ने भीतर आकर उसे मरा पाया, और उसे बाहर ले जाकर उसके पति के पास गाड़ दिया।
11
तब सारी कलीसिया पर और इस बात के सब सुननेवालों पर बड़ा भय छा गया।
12
प्रेरितों के हाथों के द्वारा बहुत से चिह्न और अद्भुत कार्य लोगों के मध्य किए जा रहे थे; (और सब एक मन होकर सुलैमान के ओसारे में इकट्ठे होते थे।
13
यद्यपि औरों में से किसी को उनमें सम्मिलित होने का साहस नहीं होता था, फिर भी लोग उनकी बड़ाई करते थे;
14
और प्रभु पर विश्वास करनेवाले पुरुषों और स्त्रियों की संख्या बढ़ती जा रही थी।)
15
यहाँ तक कि लोग बीमारों को बिछौनों और खाटों पर ला-लाकर सड़कों पर लिटा देते थे कि जब पतरस आए तो उसकी छाया ही उनमें से किसी पर पड़ जाए।
16
यरूशलेम के आस-पास के नगरों से भी बहुत लोग बीमारों और अशुद्ध आत्माओं के सताए हुओं को ला-लाकर एकत्रित होते थे, और वे सब अच्छे किए जाते थे।
17
तब महायाजक उठा और अपने सब साथियों के साथ जो सदूकी पंथ के थे, ईर्ष्या से भरकर
18
प्रेरितों को पकड़ा और उन्हें कारागार में डाल दिया।
19
परंतु रात को प्रभु के एक स्वर्गदूत ने बंदीगृह के द्वार खोलकर उन्हें बाहर निकाला और कहा,
20
“जाओ और मंदिर में खड़े होकर लोगों को इस जीवन की सब बातें सुनाओ।”
21
यह सुनकर वे भोर को ही मंदिर में जाकर उपदेश देने लगे। जब महायाजक तथा उसके साथी आए तो उन्होंने महासभा और इस्राएलियों के सब धर्मवृद्धों को इकट्ठा किया, और बंदीगृह से प्रेरितों को लाने का आदेश भेजा।
22
परंतु जब सिपाही वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने उन्हें बंदीगृह में नहीं पाया, और लौटकर यह सूचना दी,
23
“हमने बंदीगृह को पूरी सुरक्षा के साथ बंद किया हुआ और पहरेदारों को द्वारों पर खड़े हुए पाया, परंतु जब उन्हें खोला तो हमें भीतर कोई नहीं मिला।”
24
जब मंदिर-परिसर के मुख्य सुरक्षा अधिकारी और मुख्य याजकों ने ये बातें सुनीं तो उनके विषय में बड़ी दुविधा में पड़ गए कि अब क्या होगा।
25
फिर किसी ने आकर उन्हें बताया, “देखो, जिन लोगों को तुमने बंदीगृह में डाला था, वे मंदिर में खड़े होकर लोगों को उपदेश दे रहे हैं।”
26
तब मुख्य सुरक्षा अधिकारी सिपाहियों के साथ जाकर उन्हें ले आया, पर बलपूर्वक नहीं, क्योंकि वे लोगों से डरते थे कि कहीं लोग उन पर पथराव न कर दें।
27
फिर उन्होंने उन्हें महासभा के सामने लाकर खड़ा कर दिया। तब महायाजक ने उनसे पूछा,
28
“क्या हमने तुम्हें कड़ा आदेश नहीं दिया था कि तुम इस नाम से उपदेश न देना? फिर भी देखो, तुमने यरूशलेम को अपनी शिक्षा से भर दिया है, और तुम उस मनुष्य का लहू हमारे सिर पर मढ़ना चाहते हो।”
29
तब पतरस और प्रेरितों ने उत्तर दिया, “मनुष्यों की अपेक्षा परमेश्वर की आज्ञा मानना आवश्यक है।
30
हमारे पूर्वजों के परमेश्वर ने यीशु को जिलाया, जिसे तुमने काठ पर लटकाकर मार डाला था।
31
उसी को परमेश्वर ने प्रभु और उद्धारकर्ता ठहराकर अपने दाहिनी ओर ऊँचा उठाया कि वह इस्राएल को पश्चात्ताप और पापों की क्षमा प्रदान करे।
32
हम इन बातों के साक्षी हैं, और वैसे ही पवित्र आत्मा भी है जिसे परमेश्वर ने अपनी आज्ञा माननेवालों को दिया है।”
33
जब उन्होंने यह सुना तो वे भड़क उठे और उन्हें मार डालना चाहा।
34
परंतु गमलीएल नामक एक फरीसी ने, जो व्यवस्था का शिक्षक तथा सब लोगों में आदरणीय था, महासभा में खड़े होकर उन लोगों को थोड़ी देर के लिए बाहर कर देने का आदेश दिया,
35
और उसने उनसे कहा, “हे इस्राएलियो, तुम इन लोगों के साथ जो करना चाहते हो, सोच समझकर करो।
36
क्योंकि कुछ समय पहले थियूदास स्वयं कुछ होने का दावा करते हुए उठ खड़ा हुआ, और लगभग चार सौ पुरुष उसके साथ हो लिए थे; परंतु वह मारा गया, और जितने उसके अनुयायी थे वे सब तितर-बितर हो गए और मिट गए।
37
इसके बाद नाम लिखाई के दिनों में यहूदा गलीली उठ खड़ा हुआ और लोगों को अपनी ओर कर लिया; परंतु वह भी नाश हो गया, और जितने उसके अनुयायी थे वे सब तितर-बितर हो गए।
38
इसलिए अब मैं तुमसे कहता हूँ, इन लोगों से दूर रहो और इन्हें छोड़ दो; क्योंकि यदि यह योजना या कार्य मनुष्यों की ओर से है तो नष्ट हो जाएगा,
39
परंतु यदि परमेश्वर की ओर से है, तो तुम उन्हें नष्ट नहीं कर सकोगे; कहीं ऐसा न हो कि तुम परमेश्वर से भी लड़नेवाले ठहरो।” तब उन्होंने उसकी मान ली,
40
और प्रेरितों को भीतर बुलवाकर उन्हें पिटवाया, और उन्हें यीशु के नाम से बात न करने की आज्ञा देकर छोड़ दिया।
41
तब वे महासभा के सामने से आनंदित होकर चले गए कि हम उसके नाम के लिए अपमानित होने के योग्य तो ठहरे;
42
और उन्होंने प्रतिदिन मंदिर-परिसर और घर-घर में उपदेश देना और यह सुसमाचार सुनाना न छोड़ा कि यीशु ही मसीह है।
← Chapter 4
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 6 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28