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Luke 9
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
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1
फिर यीशु ने बारहों को एक साथ बुलाकर उन्हें सब दुष्टात्माओं पर और बीमारियों से स्वस्थ करने के लिए सामर्थ्य और अधिकार दिया,
2
और उन्हें परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने तथा बीमारों को स्वस्थ करने के लिए भेजा।
3
उसने उनसे कहा, “यात्रा के लिए कुछ न लेना, न तो लाठी, न थैला, न रोटी, न रुपए और न ही दो-दो कुरते रखना।
4
जिस किसी घर में तुम प्रवेश करो, वहीं रहो और वहीं से विदा हो।
5
यदि लोग तुम्हें ग्रहण न करें, तो उस नगर से निकलते हुए अपने पैरों से धूल झाड़ दो ताकि उनके विरुद्ध साक्षी हो।”
6
अतः वे निकलकर गाँव-गाँव सुसमाचार सुनाते और हर स्थान पर लोगों को स्वस्थ करते हुए फिरते रहे।
7
जब चौथाई देश के राजा हेरोदेस ने इन सब घटनाओं के विषय में सुना तो दुविधा में पड़ गया क्योंकि कुछ लोगों का कहना था कि यूहन्ना मृतकों में से जिलाया गया है,
8
और कुछ लोगों का यह भी कहना था कि एलिय्याह प्रकट हुआ है, और अन्य लोगों का यह कि प्राचीन काल का कोई भविष्यवक्ता जी उठा है।
9
परंतु हेरोदेस ने कहा, “यूहन्ना का सिर तो मैंने कटवाया था; फिर यह कौन है जिसके विषय में मैं ऐसी बातें सुन रहा हूँ?” और वह यीशु को देखना चाहता था।
10
जब प्रेरित लौट आए तो उन्होंने जो कुछ किया था यीशु को कह सुनाया। तब वह उन्हें लेकर चुपचाप बैतसैदा नामक नगर को चला गया।
11
परंतु जब लोगों को यह पता चला तो वे उसके पीछे चल पड़े। तब यीशु उनका स्वागत करके उन्हें परमेश्वर के राज्य के विषय में बताने लगा, और जिन्हें स्वस्थ होने की आवश्यकता थी उन्हें स्वस्थ करने लगा।
12
जब दिन ढलने लगा, तो बारहों ने पास आकर उससे कहा, “भीड़ को विदा कर, कि वे आस-पास के गाँवों और बस्तियों में जाकर ठहरें और उन्हें भोजन मिले, क्योंकि हम यहाँ निर्जन स्थान में हैं।”
13
परंतु उसने उनसे कहा, “तुम ही उन्हें खाने को दो। ” उन्होंने कहा, “यह तभी हो सकता है जब हम जाकर इन सब लोगों के लिए भोजन खरीद लें, नहीं तो हमारे पास पाँच रोटियों और दो मछलियों को छोड़ और कुछ नहीं है।”
14
क्योंकि वहाँ लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे। तब उसने अपने शिष्यों से कहा, “इन्हें लगभग पचास-पचास के समूहों में बैठा दो।”
15
उन्होंने ऐसा ही किया और उन सब को बैठा दिया।
16
तब उसने पाँच रोटियों और दो मछलियों को लिया और स्वर्ग की ओर देखकर आशिष माँगी, और उन्हें तोड़कर शिष्यों को देता गया कि लोगों को परोसें।
17
अतः सब खाकर तृप्त हो गए, और उन्होंने बचे हुए टुकड़ों की बारह टोकरियाँ उठाईं।
18
फिर ऐसा हुआ कि जब वह अकेले प्रार्थना कर रहा था और शिष्य उसके साथ थे, तो उसने उनसे पूछा, “लोग मुझे क्या कहते हैं?”
19
उन्होंने उत्तर दिया, “ यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला, और कुछ लोग एलिय्याह, फिर कुछ लोग उसे प्राचीन काल का एक भविष्यवक्ता कहते हैं, जो जी उठा है।”
20
उसने उनसे कहा, “परंतु तुम मुझे क्या कहते हो?” पतरस ने उत्तर दिया, “परमेश्वर का मसीह।”
21
तब यीशु ने उन्हें चेतावनी देकर यह आज्ञा दी कि यह बात किसी से न कहना,
22
और कहा, “अवश्य है कि मनुष्य का पुत्र बहुत दुःख उठाए; धर्मवृद्धों, मुख्य याजकों और शास्त्रियों द्वारा ठुकराया जाए, मार डाला जाए और तीसरे दिन जी उठे।”
23
तब वह सब से कहने लगा, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहता है, तो वह अपने आप का इनकार करे, प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए और मेरे पीछे हो ले;
24
क्योंकि जो कोई अपना प्राण बचाना चाहेगा, वह उसे गँवाएगा; परंतु जो कोई मेरे कारण अपना प्राण गँवाएगा, वह उसे बचाएगा।
25
क्योंकि मनुष्य यदि सारे जगत को प्राप्त करे, परंतु अपना प्राण गँवा दे या उसकी हानि उठाए तो उसे क्या लाभ होगा?
26
जो कोई मुझसे और मेरे वचनों से लजाएगा, मनुष्य का पुत्र भी जब अपनी, और अपने पिता की और पवित्र स्वर्गदूतों की महिमा में आएगा तो उससे लजाएगा।
27
परंतु मैं तुमसे सच कहता हूँ कि यहाँ खड़े लोगों में से कुछ ऐसे हैं कि जब तक परमेश्वर के राज्य को न देख लें, तब तक मृत्यु का स्वाद कदापि न चखेंगे।”
28
फिर ऐसा हुआ कि इन बातों के लगभग आठ दिन बाद यीशु पतरस, यूहन्ना और याकूब को साथ लेकर प्रार्थना करने पहाड़ पर गया।
29
जब वह प्रार्थना कर रहा था तो उसके मुख का रूप बदल गया और उसका वस्त्र श्वेत होकर चमकने लगा।
30
और देखो, दो पुरुष उससे बातचीत कर रहे थे, वे मूसा और एलिय्याह थे।
31
वे महिमा में प्रकट होकर यीशु की मृत्यु की बात कर रहे थे जो यरूशलेम में होने वाली थी।
32
पतरस और उसके साथी नींद में थे; परंतु जब वे पूरी तरह जागे तो उन्होंने यीशु की महिमा को और उन दो पुरुषों को जो उसके साथ खड़े थे, देखा।
33
जब वे यीशु के पास से जाने लगे, तो पतरस ने यीशु से कहा, “हे स्वामी, हमारा यहाँ होना अच्छा है, इसलिए हम तीन मंडप बनाएँ, एक तेरे लिए, एक मूसा के लिए और एक एलिय्याह के लिए।” वह नहीं जानता था कि क्या कह रहा है।
34
जब वह ये बातें कह ही रहा था कि एक बादल आया और उन पर छाने लगा, और जब वे बादल से घिरने लगे तो डर गए।
35
फिर बादल में से यह आवाज़ आई, “यह मेरा पुत्र है, जिसे मैंने चुना है, इसकी सुनो।”
36
यह आवाज़ आने के बाद यीशु अकेला पाया गया। अतः वे चुप रहे और जो कुछ उन्होंने देखा था उसके विषय में उन दिनों किसी को नहीं बताया।
37
फिर ऐसा हुआ कि अगले दिन जब वे पहाड़ से नीचे उतरे तो एक बड़ी भीड़ उससे मिली।
38
और देखो, भीड़ में से एक मनुष्य ने पुकारकर कहा, “हे गुरु, मैं तुझसे विनती करता हूँ, मेरे पुत्र पर दृष्टि कर, क्योंकि वह मेरा एकलौता पुत्र है;
39
और देख, एक आत्मा उसे जकड़ लेती है और वह अचानक चिल्लाने लगता है, और वह उसे ऐसे मरोड़ती है कि उसके मुँह से फेन निकलने लगता है और उसे तड़पाकर कठिनाई से छोड़ती है।
40
मैंने तेरे शिष्यों से विनती की कि उसे निकाल दें, परंतु वे निकाल न सके।”
41
इस पर यीशु ने कहा, “हे अविश्वासी और भ्रष्ट पीढ़ी! कब तक मैं तुम्हारे साथ रहूँगा और तुम्हारी सहूँगा? अपने पुत्र को यहाँ ले आ।”
42
वह अभी आ ही रहा था कि दुष्टात्मा ने उसे पटककर मरोड़ा; परंतु यीशु ने उस अशुद्ध आत्मा को डाँटा, और लड़के को अच्छा करके उसके पिता को सौंप दिया।
43
तब सब लोग परमेश्वर की महानता पर आश्चर्यचकित हुए। जब सब लोग उन सब कार्यों पर जिन्हें वह कर रहा था आश्चर्य कर रहे थे, तो यीशु ने अपने शिष्यों से कहा,
44
“तुम इन वचनों पर अपने कान लगाओ कि मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के हाथों पकड़वाया जाने वाला है।”
45
परंतु वे इस बात को नहीं समझे, और उनसे यह गुप्त रखी गई थी कि वे इसे न जानें, और वे इस बात के विषय में उससे पूछने से डरते थे।
46
अब उनमें यह विवाद छिड़ गया कि हममें से बड़ा कौन है।
47
परंतु यीशु ने उनके मन के विचार को जान लिया, और एक बच्चे को लेकर अपने पास खड़ा किया,
48
और उनसे कहा, “जो कोई मेरे नाम से इस बच्चे को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है, और जो मुझे ग्रहण करता है, वह मेरे भेजनेवाले को ग्रहण करता है; क्योंकि तुम सब में जो छोटा है, वही बड़ा है।”
49
तब यूहन्ना ने कहा, “हे स्वामी, हमने किसी को तेरे नाम से दुष्टात्माओं को निकालते हुए देखा, और उसे रोकने का प्रयास किया क्योंकि वह हमारे साथ तेरा अनुसरण नहीं करता।”
50
परंतु यीशु ने उससे कहा, “उसे मत रोको, क्योंकि जो तुम्हारे विरोध में नहीं, वह तुम्हारी ओर है।”
51
फिर ऐसा हुआ कि जब उसके स्वर्ग में उठाए जाने का दिन निकट आ रहा था, तो उसने यरूशलेम जाने का विचार दृढ़ किया।
52
उसने अपने आगे दूतों को भेजा। उन्होंने जाकर सामरियों के एक गाँव में प्रवेश किया कि उसके लिए तैयारी करें;
53
परंतु उन्होंने उसका स्वागत नहीं किया, क्योंकि वह यरूशलेम की ओर जा रहा था।
54
यह देखकर उसके शिष्य याकूब और यूहन्ना ने कहा, “हे प्रभु, तू चाहे तो क्या हम आग को आकाश से उतरकर उन्हें भस्म करने को कहें?”
55
परंतु उसने मुड़कर उन्हें डाँटा [और कहा, “तुम नहीं जानते कि तुम कैसी आत्मा के हो।
56
क्योंकि मनुष्य का पुत्र मनुष्यों के प्राणों को नाश करने नहीं, बल्कि बचाने आया है।” ] और वे दूसरे गाँव की ओर चले गए।
57
जब वे मार्ग में जा रहे थे, किसी ने यीशु से कहा, “ जहाँ भी तू जाएगा, मैं तेरे पीछे चलूँगा।”
58
यीशु ने उससे कहा, “लोमड़ियों की माँदें और आकाश के पक्षियों के घोंसले होते हैं, परंतु मनुष्य के पुत्र के लिए सिर रखने का भी स्थान नहीं है।”
59
उसने दूसरे से कहा, “मेरे पीछे हो ले।” परंतु उसने कहा, “प्रभु, पहले मुझे जाकर अपने पिता को गाड़ने की अनुमति दे।”
60
परंतु उसने उससे कहा, “मृतकों को अपने मृतक गाड़ने दे, पर तू जाकर परमेश्वर के राज्य का प्रचार कर।”
61
फिर एक और ने भी कहा, “प्रभु, मैं तेरे पीछे चलूँगा; परंतु पहले मुझे अपने घर वालों से विदा लेने की अनुमति दे।”
62
परंतु यीशु ने उससे कहा, “जो कोई हल पर हाथ रखकर पीछे की ओर देखता है, वह परमेश्वर के राज्य के योग्य नहीं।”
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