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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Colossians 4
Colossians 4
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
यौ मालिक लोकनि, अहाँ सभ ई बात जनैत जे स्वर्ग मे अहूँ सभक एक मालिक छथि, अपन दास सभक संग न्यायपूर्ण आ उचित व्यवहार करू।
2
अहाँ सभ सचेत रहि प्रार्थना मे लागल रहू आ धन्यवाद देबाक मनोभावना रखने रहू।
3
आ हमरो सभक लेल प्रार्थना करू, जे परमेश्वर हमरा सभ केँ सुसमाचार सुनयबाक अवसर देथि, जाहि सँ मसीहक ओहि सत्य केँ लोक सभ केँ सुना सकिऐक, जे पहिने गुप्त छल, मुदा आब प्रगट कयल गेल अछि, आ जकरा लेल हम जहल मे बन्दी छी।
4
प्रार्थना करू जे हम एकरा तहिना स्पष्ट रूप सँ सुना सकी, जहिना हमरा सुनयबाक चाही।
5
प्रभु यीशु केँ नहि मानऽ वला लोक सभक संग विवेकपूर्ण व्यवहार करू। हर अवसरक पूरा सदुपयोग करू।
6
जखन ओकरा सभ सँ बात-चीत करैत छी, तँ नम्रता और विचारशीलता सँ करू, तखन अहाँ सभ प्रत्येक लोक केँ समुचित उत्तर देनाइ सिखब।
7
हमर प्रिय भाय तुखिकुस अहाँ सभ केँ हमरा सम्बन्ध मे सभ समाचार सुनौताह। ओ प्रभुक विश्वस्त दास छथि आ प्रभुक काज मे हमरा संग-संग सेवा करैत छथि।
8
हुनका हम एही अभिप्राय सँ अहाँ सभक ओतऽ पठा रहल छियनि जे ओ अहाँ सभ केँ हमरा सभक कुशल-समाचार सुनबथि आ अहाँ सभक मोन उत्साहित करथि।
9
हुनका संग विश्वस्त आ प्रिय भाय उनेसिमुस सेहो छथि जे अहीं सभक ओहिठामक लोक छथि। ई दूनू गोटे अहाँ सभ केँ एहिठामक सम्पूर्ण परिस्थिति सँ अवगत करौताह।
10
अरिस्तर्खुस, जे एतऽ हमरा संग जहल मे बन्दी छथि, आ मरकुस, जे बरनबासक भाय लगैत छथि, से सभ अहाँ सभ केँ नमस्कार कहैत छथि। मरकुसक विषय मे अहाँ सभ केँ आदेश देल गेल अछि; ई जँ अहाँ सभक ओतऽ पहुँचथि तँ अहाँ सभ हिनकर आदर-सत्कार करिऔन।
11
यीशु, जे यूस्तुस कहबैत छथि, सेहो अहाँ सभ केँ नमस्कार कहैत छथि। जे सभ एतऽ हमरा संग परमेश्वरक राज्यक लेल काज कऽ रहल छथि, ताहि मे यैह तीनू गोटे यहूदी समाजक छथि। हिनका सभ सँ हमरा बहुत सहायता आ उत्साह भेटल अछि।
12
अहाँ सभक अपन लोक एपाफ्रास अहाँ सभ केँ नमस्कार कहैत छथि। मसीह यीशुक ई सेवक सदिखन अहाँ सभक लेल प्रार्थना मे संघर्ष करैत छथि। ओ प्रार्थना करैत छथि जे अहाँ सभ अपना विश्वास मे स्थिर रहि आत्मिक परिपूर्णता धरि बढ़ैत जाइ आ प्रत्येक बात मे परमेश्वरक इच्छा पूरा करऽ मे सुदृढ़ बनल रही।
13
हम हिनका बारे मे गवाही दऽ सकैत छी जे ई अहाँ सभक लेल आ लौदीकिया और हियरापुलिस नगर सभक विश्वासी सभक लेल बहुत परिश्रम कऽ रहल छथि।
14
प्रिय वैद्य लूका, आ देमास अहाँ सभ केँ नमस्कार कहैत छथि।
15
लौदीकिया नगर मे रहनिहार भाय सभ और नुम्फास केँ आ हुनका घर मे जमा होमऽ वला मण्डली केँ हमर नमस्कार कहिऔन।
16
जखन ई पत्र अहाँ सभक बीच पढ़ि कऽ सुना देल जायत, तँ अहाँ सभ एहन व्यवस्था करू जे ई लौदीकिया नगरक मण्डली मे सेहो पढ़ल जाय आ लौदीकियाक नाम सँ पठाओल पत्र अहाँ सभ सेहो पढ़ि कऽ सुनू।
17
अरखिप्पुस केँ ई कहू जे, “प्रभुक सेवा मे जे काज अहाँक जिम्मा देल गेल अछि, तकरा अहाँ अवश्य पूरा करू।”
18
हम, पौलुस, अपने हाथ सँ ई नमस्कार लिखि रहल छी। हम एतऽ जहल मे छी, से नहि बिसरू। अहाँ सभ पर प्रभुक कृपा बनल रहय।
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