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2 Peter 1
2 Peter 1
Urdu 2017 BCS
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1
शमा'ऊन पतरस की तरफ़ से,जो ईसा' मसीह का बन्दा और रसूल है, उन लोगों के नाम जिन्होंने हमारे ख़ुदा और मुंजी ईसा' मसीह की रास्तबाज़ी में हमारा सा क़ीमती ईमान पाया है |
2
ख़ुदा और हमारे ख़ुदावन्द ईसा' की पहचान की वजह से फ़ज़ल और इत्मीनान तुम्हें ज़्यादा होता रहे |
3
क्योंकि उसकी इलाही क़ुदरत ने वो सब चीज़ें जो ज़िन्दगी और दीनदारी के मुता'ल्लिक़ हैं,हमें उसकी पहचान के वसीले से 'इनायत की,जिसने हम को अपने ख़ास जलाल और नेकी के ज़रि'ए से बुलाया |
4
जिनके ज़रिए उसने हम से क़ीमती और निहायत बड़े वा'दे किए; ताकि उनके वसीले से तुम उस ख़राबी से छूटकर,जो दुनिया में बुरी ख़्वाहिश की वजह से है,ज़ात-ए-इलाही में शरीक हो जाओ |
5
पस इसी ज़रिये तुम अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करके अपने ईमान पर नेकी,और नेकी पर मा'रिफ़त,
6
और मा'रिफ़त पर परहेज़गारी,और परहेज़गारी पर सब्र और सब्र पर दीनदारी,
7
और दीनदारी पर बिरादराना उल्फ़त, और बिरादराना उल्फ़त पर मुहब्बत बढ़ाओ |
8
क्यूँकि अगर ये बातें तुम में मौजूद हों और ज़्यादा भी होती जाएँ,तो तुम को हमारे ख़ुदावन्द ईसा' मसीह के पहचानने में बेकार और बेफल न होने देंगी |
9
और जिसमें ये बातें न हों,वो अन्धा है और कोताह नज़र अपने पहले गुनाहों के धोए जाने को भूले बैठा है |
10
पस ऐ भाइयों!अपने बुलावे और बरगुज़ीदगी को साबित करने की ज़्यादा कोशिश करो,क्यूँकि अगर ऐसा करोगे तो कभी ठोकर न खाओगे;
11
बल्कि इससे तुम हमारे ख़ुदावन्द और मुन्जी ईसा'मसीह की हमेशा बादशाही में बड़ी 'इज़्ज़त के साथ दाख़िल किए जाओगे |
12
इसलिए मैं तुम्हें ये बातें याद दिलाने को हमेशा मुस्त'इद रहूँगा,अगरचे तुम उनसे वाक़िफ़ और उस हक़ बात पर क़ायम हो जो तुम्हें हासिल है |
13
और जब तक मैं इस ख़ेमे में हूँ,तुम्हें याद दिला दिला कर उभारना अपने ऊपर वाजिब समझता हूँ |
14
क्यूँकि हमारे ख़ुदावन्द ईसा' मसीह के बताने के मुवाफ़िक़, मुझे मा'लूम है कि मेरे ख़ेमे के गिराए जाने का वक़्त जल्द आनेवाला है |
15
पस मैं ऐसी कोशिश करूँगा कि मेरे इन्तक़ाल के बा'द तुम इन बातों को हमेशा याद रख सको |
16
क्योंकि जब हम ने तुम्हे अपने ख़ुदा वन्द ईसा' मसीह की क़ुदरत और आमद से वाक़िफ़ किया था, तो दग़ाबाज़ी की गढ़ी हुई कहानियो की पैरवी नही की थी बल्कि ख़ुद उस कि अज़मत को देखा था
17
कि उसने ख़ुदा बाप से उस वक़्त 'इज़्ज़त और जलाल पाया, जब उस अफ़ज़ल जलाल में से उसे ये आवाज़ आई, “ये मेरा प्यारा बेटा है, जिससे मैं ख़ुश हूँ |”
18
और जब हम उसके साथ मुक़द्दस पहाड़ पर थे,तो आसमान से यही आवाज़ आती सुनी |
19
और हमारे पास नबियों का वो कलाम है जो ज़्यादा मौ'तबर ठहरा |और तुम अच्छा करते हो,जो ये समझ कर उसी पर ग़ौर करते हो कि वो एक चराग़ है जो अन्धेरी जगह में रौशनी बख़्शता है,जब तक सुबह की रौशनी और सुबह का सितारा तुम्हारे दिलों में न चमके |
20
और पहले ये जान लो कि किताब-ए-मुक़द्दस की किसी नबुव्वत की बात की तावील किसी के ज़ाती इख़्तियार पर मौक़ूफ़ नहीं,
21
क्योंकि नबुव्वत की कोई बात आदमी की ख़्वाहिश से कभी नहीं हुई,बल्कि आदमी रूह-उल-क़ुद्दुस की तहरीक की वजह से ख़ुदा की तरफ़ से बोलते थे |
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