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3 John 1
3 John 1
Urdu 2017 BCS
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Chapter 1
1
मुझ बुज़ुर्ग की तरफ़ से उस प्यारे गियुस के नाम,जिससे मैं सच्ची मुहब्बत रखता हूँ |
2
ऐ प्यारे! मैं ये दु'आ करता हूँ कि जिस तरह तू रूहानी तरक़्क़ी कर रहा है,इसी तरह तू सब बातों में तरक़्क़ी करे और तन्दुरुस्त रहे |
3
क्योंकि जब भाइयों ने आकर तेरी उस सच्चाई की गवाही दी, जिस पर तू हक़ीक़त में चलता है,तो मैं निहायत ख़ुश हुआ |
4
मेरे लिए इससे बढ़कर और कोई ख़ुशी नहीं कि मैं अपने बेटो को हक़ पर चलते हुए सुनूँ |
5
ऐ प्यारे!जो कुछ तू उन भाइयों के साथ करता है जो परदेसी भी हैं,वो ईमानदारी से करता है |
6
उन्होंने कलीसिया के सामने तेरी मुहब्बत की गवाही दी थी |अगर तू उन्हें उस तरह रवाना करेगा,जिस तरह ख़ुदा के लोगों को मुनासिब है तो अच्छा करेगा |
7
क्योकि वो उस नाम की ख़ातिर निकले हैं,और ग़ैर-क़ौमों से कुछ नहीं लेते |
8
पस ऐसों की ख़ातिरदारी करना हम पर फ़र्ज़ है, ताकि हम भी हक़ की ताईद में उनके हम ख़िदमत हों |
9
मैंने कलीसिया को कुछ लिखा था, मगर दियुत्रिफ़ेस जो उनमे बड़ा बनना चाहता है,हमें क़ुबूल नहीं करता |
10
पस जब मैं आऊँगा तो उसके कामों को जो वो कर रहा है,याद दिलाऊँगा,कि हमारे हक़ में बुरी बातें बकता है; और इन पर सब्र न करके ख़ुद भी भाइयों को क़ुबूल नहीं करता,और जो क़ुबूल करना चाहते हैं उनको भी मना' करता है और कलीसिया से निकाल देता है |
11
ऐ प्यारे!बदी की नहीं बल्कि नेकी की पैरवी कर |नेकी करनेवाला ख़ुदा से है; बदी करनेवाले ने ख़ुदा को नहीं देखा |
12
देमेत्रियुस के बारे में सब ने और ख़ुद हक़ ने भी गवाही दी, और हम भी गवाही देते हैं,और तू जानता है कि हमारी गवाही सच्ची है |
13
मुझे लिखना तो तुझ को बहुत कुछ था,मगर स्याही और क़लम से तुझे लिखना नहीं चाहता |
14
बल्कि तुझ से जल्द मिलने की उम्मीद रखता हूँ, उस वक़्त हम रू-ब-रू बातचीत करेंगे |
15
तुझे इत्मीनान हासिल होता रहे |यहाँ के दोस्त तुझे सलाम कहते हैं |तू वहाँ के दोस्तों से नाम-ब-नाम सलाम कह |
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