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Ephesians 4
Ephesians 4
Urdu 2017 BCS
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1
पस मैं जो ख़ुदावन्द में क़ैदी हूँ, तुम से गुज़ारिश करता हूँ कि जिस बुलावे से तुम बुलाए गए थे उसके मुवाफ़िक़ चाल चलो,।
2
या'नी कमाल दरयादिली और नर्मदिल के साथ सब्र करके मुहब्बत से एक दुसरे की बर्दाश्त करो;।
3
सुलह सलामती के बंधन में रहकर रूह की सौग़ात क़ायम रखने की पूरी कोशिश करें
4
एक ही बदन है और एक ही रूह; चुनाँचे तुम्हें जो बुलाए गए थे, अपने बुलाए जाने से उम्मीद भी एक ही है।
5
एक ही ख़ुदावन्द, है एक ही ईमान है, एक ही बपतिस्मा,
6
और सब का ख़ुदा और बाप एक ही है, जो सब के ऊपर और सब के दर्मियान और सब के अन्दर है।
7
और हम में से हर एक पर मसीह की बाख़्शिश के अंदाज़े के मुवाफ़िक़ फ़ज़ल हुआ है।
8
इसी वास्ते वो फ़रमाता है, “जब वो 'आलम-ए-बाला पर चढ़ा तो क़ैदियों को साथ ले गया, और आदमियों को इन'आम दिए।”
9
(उसके चढ़ने से और क्या पाया जाता है? सिवा इसके कि वो ज़मीन के नीचे के 'इलाक़े में उतरा भी था।
10
और ये उतरने वाला वही है जो सब आसमानों से भी ऊपर चढ़ गया, ताकि सब चीज़ों को मा'मूर करे।)
11
और उसी ने कुछ को रसूल, और कुछ को नबी, और कुछ को मुबश्शिर, और कुछ को चरवाहा और उस्ताद बनाकर दे दिया ।
12
ताकि मुक़द्दस लोग कामिल बनें और ख़िदमत गुज़ारी का काम किया जाए,।
13
जब तक हम सब के सब ख़ुदा के बेटे के ईमान और उसकी पहचान में एक न हो जाएँ और पूरा इन्सान न बनें, या'नी मसीह के पुरे क़द के अन्दाज़े तक न पहुँच जाएँ।
14
ताकि हम आगे को बच्चे न रहें और आदमियों की बाज़ीगरी और मक्कारी की वजह से उनके गुमराह करनेवाले इरादों की तरफ़ हर एक ता'लीम के झोंके से मौजों की तरह उछलते बहते न फिरें
15
बल्कि मुहब्बत के साथ सच्चाई पर क़ायम रहकर और उसके साथ जो सिर है, या;नी मसीह के साथ,पैवस्ता हो कर हर तरह से बढ़ते जाएँ।
16
जिससे सारा बदन, हर एक जोड़ की मदद से पैवस्ता होकर और गठ कर, उस तासीर के मुवाफ़िक़ जो बक़द्र-ए-हर हिस्सा होती है, अपने आप को बढ़ाता है ताकि मुहब्बत में अपनी तरक्की करता जाए।
17
इस लिए मैं ये कहता हूँ और ख़ुदावन्द में जताए देता हूँ कि जिस तरह ग़ैर-क़ौमें अपने बेहूदा ख़यालात के मुवाफ़िक़ चलती हैं,तुम आइन्दा को उस तरह न चलना |
18
क्यूँकि उनकी 'अक़्ल तारीक हो गई है, और वो उस नादानी की वजह से जो उनमें है और अपने दिलों की सख़्ती के ज़रिए ख़ुदा की ज़िन्दगी से अलग हैं।
19
उन्होंने ख़ामोशी के साथ शहवत परस्ती को इख़्तियार किया, ताकि हर तरह के गन्दे काम की हिर्स करें।
20
मगर तुम ने मसीह की ऐसी ता'लीम नहीं पाई।
21
बल्कि तुम ने उस सच्चाई के मुताबिक़ जो ईसा' में है, उसी की सुनी और उसमें ये ता'लीम पाई होगी।
22
कि तुम अपने अगले चाल-चलन की पुरानी इन्सानियत को उतार डालो, जो धोके की शहवतों की वजह से ख़राब होती जाती है
23
और अपनी 'अक़्ल की रूहानी हालात में नये बनते जाओ,
24
और नई इन्सानियत को पहनो जो ख़ुदा के मुताबिक़ सच्चाई की रास्तबाज़ी और पाकीज़गी में पैदा की गई है।
25
पस झूट. बोलना छोड़ कर हर एक शख़्स अपने पड़ोसी से सच बोले, क्यूंकि हम आपस में एक दूसरे के 'बदन हैं।
26
ग़ुस्सा तो करो, मगर गुनाह न करो | सूरज के डूबने तक तुम्हारी नाराज़गी न रहे,
27
और इब्लीस को मौक़ा न दो।
28
चोरी करने वाला फिर चोरी न करे, बल्कि अच्छा हुनर इख़्तियार करके हाथों से मेहनत करे ताकि मुहताज को देने के लिए उसके पास कुछ हो।
29
कोई गन्दी बात तुम्हारे मुंह से न निकले, बल्कि वही जो ज़रूरत के मुवाफ़िक़ तरक़्क़ी के लिए अच्छी हो, ताकि उससे सुनने वालों पर फ़ज़ल हो।
30
और ख़ुदा के पाक रूह को ग़मगीन न करो, जिससे तुम पर रिहाई के दिन के लिए मुहर हुई।
31
हर तरह की गर्म मिज़ाजी, और क़हर,और ग़ुस्सा, और शोर-ओ-ग़ुल, और बुराई, हर क़िस्म की बद ख़्वाही समेत तुम से दूर की जाएँ।
32
और एक दूसरे पर मेंहरबान और नर्मदिल हो, और जिस तरह ख़ुदा ने मसीह में तुम्हारे क़ुसूर मु'आफ़ किए हैं, तुम भी एक दूसरे के क़ुसूर मु'आफ़ करो।
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