bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu DGV (किताब-ए मुक़द्दस)
/
Luke 13
Luke 13
Urdu DGV (किताब-ए मुक़द्दस)
← Chapter 12
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 14 →
1
उस वक़्त कुछ लोग ईसा के पास पहुँचे। उन्होंने उसे गलील के कुछ लोगों के बारे में बताया जिन्हें पीलातुस ने उस वक़्त क़त्ल करवाया था जब वह बैतुल-मुक़द्दस में क़ुरबानियाँ पेश कर रहे थे। यों उनका ख़ून क़ुरबानियों के ख़ून के साथ मिलाया गया था।
2
ईसा ने यह सुनकर पूछा, “क्या तुम्हारे ख़याल में यह लोग गलील के बाक़ी लोगों से ज़्यादा गुनाहगार थे कि इन्हें इतना दुख उठाना पड़ा?
3
हरगिज़ नहीं! बल्कि मैं तुमको बताता हूँ कि अगर तुम तौबा न करो तो तुम भी इसी तरह तबाह हो जाओगे।
4
या उन 18 अफ़राद के बारे में तुम्हारा क्या ख़याल है जो मर गए जब शिलोख़ का बुर्ज उन पर गिरा? क्या वह यरूशलम के बाक़ी बाशिंदों की निसबत ज़्यादा गुनाहगार थे?
5
हरगिज़ नहीं! मैं तुमको बताता हूँ कि अगर तुम तौबा न करो तो तुम भी तबाह हो जाओगे।”
6
फिर ईसा ने उन्हें यह तमसील सुनाई, “किसी ने अपने बाग़ में अंजीर का दरख़्त लगाया। जब वह उसका फल तोड़ने के लिए आया तो कोई फल नहीं था।
7
यह देखकर उसने माली से कहा, ‘मैं तीन साल से इसका फल तोड़ने आता हूँ, लेकिन आज तक कुछ भी नहीं मिला। इसे काट डाल। यह ज़मीन की ताक़त क्यों ख़त्म करे?’
8
लेकिन माली ने कहा, ‘जनाब, इसे एक साल और रहने दें। मैं इसके इर्दगिर्द गोडी करके खाद डालूँगा।
9
फिर अगर यह अगले साल फल लाया तो ठीक, वरना इसे कटवा डालना’।”
10
सबत के दिन ईसा किसी इबादतख़ाने में तालीम दे रहा था।
11
वहाँ एक औरत थी जो 18 साल से बदरूह के बाइस बीमार थी। वह कुबड़ी हो गई थी और सीधी खड़ी होने के बिलकुल क़ाबिल न थी।
12
जब ईसा ने उसे देखा तो पुकारकर कहा, “ऐ औरत, तू अपनी बीमारी से छूट गई है!”
13
उसने अपने हाथ उस पर रखे तो वह फ़ौरन सीधी खड़ी होकर अल्लाह की तमजीद करने लगी।
14
लेकिन इबादतख़ाने का राहनुमा नाराज़ हुआ क्योंकि ईसा ने सबत के दिन शफ़ा दी थी। उसने लोगों से कहा, “हफ़ते के छः दिन काम करने के लिए होते हैं। इसलिए इतवार से लेकर जुमे तक शफ़ा पाने के लिए आओ, न कि सबत के दिन।”
15
ख़ुदावंद ने जवाब में उससे कहा, “तुम कितने रियाकार हो! क्या तुममें से हर कोई सबत के दिन अपने बैल या गधे को खोलकर उसे थान से बाहर नहीं ले जाता ताकि उसे पानी पिलाए?
16
अब इस औरत को देखो जो इब्राहीम की बेटी है और जो 18 साल से इबलीस के बंधन में थी। जब तुम सबत के दिन अपने जानवरों की मदद करते हो तो क्या यह ठीक नहीं कि औरत को इस बंधन से रिहाई दिलाई जाती, चाहे यह काम सबत के दिन ही क्यों न किया जाए?”
17
ईसा के इस जवाब से उसके मुख़ालिफ़ शरमिंदा हो गए। लेकिन आम लोग उसके इन तमाम शानदार कामों से ख़ुश हुए।
18
ईसा ने कहा, “अल्लाह की बादशाही किस चीज़ की मानिंद है? मैं इसका मुवाज़ना किससे करूँ?
19
वह राई के एक दाने की मानिंद है जो किसी ने अपने बाग़ में बो दिया। बढ़ते बढ़ते वह दरख़्त-सा बन गया और परिंदों ने उस की शाख़ों में अपने घोंसले बना लिए।”
20
उसने दुबारा पूछा, “अल्लाह की बादशाही का किस चीज़ से मुवाज़ना करूँ?
21
वह उस ख़मीर की मानिंद है जो किसी औरत ने लेकर तक़रीबन 27 किलोग्राम आटे में मिला दिया। गो वह उसमें छुप गया तो भी होते होते पूरे गुंधे हुए आटे को ख़मीर कर गया।”
22
ईसा तालीम देते देते मुख़्तलिफ़ शहरों और देहातों में से गुज़रा। अब उसका रुख़ यरूशलम ही की तरफ़ था।
23
इतने में किसी ने उससे पूछा, “ख़ुदावंद, क्या कम लोगों को नजात मिलेगी?” उसने जवाब दिया,
24
“तंग दरवाज़े में से दाख़िल होने की सिर-तोड़ कोशिश करो। क्योंकि मैं तुमको बताता हूँ कि बहुत-से लोग अंदर जाने की कोशिश करेंगे, लेकिन बेफ़ायदा।
25
एक वक़्त आएगा कि घर का मालिक उठकर दरवाज़ा बंद कर देगा। फिर तुम बाहर खड़े रहोगे और खटखटाते खटखटाते इलतमास करोगे, ‘ख़ुदावंद, हमारे लिए दरवाज़ा खोल दें।’ लेकिन वह जवाब देगा, ‘न मैं तुमको जानता हूँ, न यह कि तुम कहाँ के हो।’
26
फिर तुम कहोगे, ‘हमने तो आपके सामने ही खाया और पिया और आप ही हमारी सड़कों पर तालीम देते रहे।’
27
लेकिन वह जवाब देगा, ‘न मैं तुमको जानता हूँ, न यह कि तुम कहाँ के हो। ऐ तमाम बदकारो, मुझसे दूर हो जाओ!’
28
वहाँ तुम रोते और दाँत पीसते रहोगे। क्योंकि तुम देखोगे कि इब्राहीम, इसहाक़, याक़ूब और तमाम नबी अल्लाह की बादशाही में हैं जबकि तुमको निकाल दिया गया है।
29
और लोग मशरिक़, मग़रिब, शिमाल और जुनूब से आकर अल्लाह की बादशाही की ज़ियाफ़त में शरीक होंगे।
30
उस वक़्त कुछ ऐसे होंगे जो पहले आख़िर थे, लेकिन अब अव्वल होंगे। और कुछ ऐसे भी होंगे जो पहले अव्वल थे, लेकिन अब आख़िर होंगे।”
31
उस वक़्त कुछ फ़रीसी ईसा के पास आकर उससे कहने लगे, “इस मक़ाम को छोड़कर कहीं और चले जाएँ, क्योंकि हेरोदेस आपको क़त्ल करने का इरादा रखता है।”
32
ईसा ने जवाब दिया, “जाओ, उस लोमड़ी को बता दो, ‘आज और कल मैं बदरूहें निकालता और मरीज़ों को शफ़ा देता रहूँगा। फिर तीसरे दिन मैं पायाए-तकमील को पहुँचूँगा।’
33
इसलिए लाज़िम है कि मैं आज, कल और परसों आगे चलता रहूँ। क्योंकि मुमकिन नहीं कि कोई नबी यरूशलम से बाहर हलाक हो।
34
हाय यरूशलम, यरूशलम! तू जो नबियों को क़त्ल करती और अपने पास भेजे हुए पैग़ंबरों को संगसार करती है। मैंने कितनी ही बार तेरी औलाद को जमा करना चाहा, बिलकुल उसी तरह जिस तरह मुरग़ी अपने बच्चों को अपने परों तले जमा करके महफ़ूज़ कर लेती है। लेकिन तूने न चाहा।
35
अब तेरे घर को वीरानो-सुनसान छोड़ा जाएगा। और मैं तुमको बताता हूँ, तुम मुझे उस वक़्त तक दुबारा नहीं देखोगे जब तक तुम न कहो कि मुबारक है वह जो रब के नाम से आता है।”
← Chapter 12
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 14 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24