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John 11
Hindi 2017 (नया नियम)
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1
मरियम और उसकी बहिन मरथा के गाँव बैतनिय्याह का लाजर नाम एक मनुष्य बीमार था।
2
यह वही मरियम थी जिस ने प्रभु पर इत्र डालकर उसके पाँवों को अपने बालों से पोंछा था, इसी का भाई लाजर बीमार था।
3
सो उसकी बहिनों ने उसे कहला भेजा, “हे प्रभु, देख, जिस से तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।”
4
यह सुनकर यीशु ने कहा, “यह बीमारी मृत्यु की नहीं, परन्तु परमेश्वर की महिमा के लिये है, कि उसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।”
5
और यीशु मरथा और उसकी बहन और लाजर से प्रेम रखता था।
6
सो जब उसने सुना, कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहाँ दो दिन और ठहर गया।
7
फिर इस के बाद उसने चेलों से कहा, “आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।”
8
चेलों ने उससे कहा, “हे रब्बी, अभी तो यहूदी तुझे पत्थरवाह करना चाहते थे, और क्या तू फिर भी वहीं जाता है?”
9
यीशु ने उत्तर दिया, “क्या दिन के बारह घंटे नहीं होते? यदि कोई दिन को चले, तो ठोकर नहीं खाता, क्योंकि इस जगत का उजाला देखता है।
10
परन्तु यदि कोई रात को चले, तो ठोकर खाता है, क्योंकि उसमें प्रकाश नहीं।”
11
उसने ये बातें कहीं, और इस के बाद उनसे कहने लगा, “हमारा मित्र लाजर सो गया है, परन्तु मैं उसे जगाने जाता हूँ।”
12
तब चेलों ने उससे कहा, “हे प्रभु, यदि वह सो गया है, तो बच जाएगा।”
13
यीशु ने तो उसकी मृत्यु के विषय में कहा था: परन्तु वे समझे कि उसने नींद से सो जाने के विषय में कहा।
14
तब यीशु ने उनसे साफ कह दिया, “लाजर मर गया है।
15
और मैं तुम्हारे कारण आनन्दित हूँ कि मैं वहाँ न था जिस से तुम विश्वास करो। परन्तु अब आओ, हम उसके पास चलें।”
16
तब थोमा ने जो दिदुमुस कहलाता है, अपने साथ के चेलों से कहा, “आओ, हम भी उसके साथ मरने को चलें।”
17
सो यीशु को आकर यह मालूम हुआ कि उसे कब्र में रखे चार दिन हो चुके हैं।
18
बैतनिय्याह यरूशलेम के समीप कोई दो मील की दूरी पर था।
19
और बहुत से यहूदी मरथा और मरियम के पास उनके भाई के विषय में शान्ति देने के लिये आए थे।
20
जब मरथा यीशु के आने का समाचार सुनकर उससे भेंट करने को गई, परन्तु मरियम घर में बैठी रही।
21
मरथा ने यीशु से कहा, “हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता, तो मेरा भाई कदापि न मरता।
22
और अब भी मैं जानती हूँ, कि जो कुछ तू परमेश्वर से माँगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।”
23
यीशु ने उससे कहा, “तेरा भाई जी उठेगा।”
24
मरथा ने उससे कहा, मैं जानती हूँ, “अन्तिम दिन में पुनरूत्थान के समय वह जी उठेगा।”
25
यीशु ने उससे कहा, “पुनरूत्थान और जीवन मैं ही हूँ, जो कोई मुझ पर विश्वास करता है वह यदि मर भी जाए, तौभी जीएगा।
26
और जो कोई जीवित है, और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनन्तकाल तक न मरेगा। क्या तू इस बात पर विश्वास करती है?”
27
उसने उससे कहा, “हाँ, हे प्रभु, मैं विश्वास कर चुकी हूँ, कि परमेश्वर का पुत्र मसीह जो जगत में आनेवाला था, वह तू ही है।”
28
यह कहकर वह चली गई, और अपनी बहिन मरियम को चुपके से बुलाकर कहा, “गुरू यहीं है, और तुझे बुलाता है।”
29
वह सुनते ही तुरन्त उठकर उसके पास आई।
30
(यीशु अभी गाँव में नहीं पहुंचा था, परन्तु उसी स्थान में था जहाँ मरथा ने उससे भेंट की थी।)
31
तब जो यहूदी उसके साथ घर में थे, और उसे शान्ति दे रहे थे, यह देखकर कि मरियम तुरन्त उठके बाहर गई है और यह समझकर कि वह कब्र पर रोने को जाती है, उसके पीछे हो लिये।
32
जब मरियम वहाँ पहुँची जहाँ यीशु था, तो उसे देखते ही उसके पाँवों पर गिर के कहा, “हे प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई न मरता।”
33
जब यीशु न उसको और उन यहूदियों को जो उसके साथ आए थे रोते हुए देखा, तो आत्मा में बहुत ही उदास और व्याकुल हुआ,
34
और कहा, “तुम ने उसे कहाँ रखा है?” उन्होंने उससे कहा, “हे प्रभु, चलकर देख ले।”
35
यीशु के आंसू बहने लगे।
36
तब यहूदी कहने लगे, “देखो, वह उससे कैसी प्रीति रखता था।”
37
परन्तु उन में से कितनों ने कहा, “क्या यह जिस ने अन्धे की आँखें खोली, यह भी न कर सका कि यह मनुष्य न मरता?”
38
यीशु मन में फिर बहुत ही उदास होकर कब्र पर आया, वह एक गुफा थी, और एक पत्थर उस पर धरा था।
39
यीशु ने कहा, “पत्थर को उठाओ।” उस मरे हुए की बहिन मरथा उससे कहने लगी, “हे प्रभु, उसमें से अब तो दुर्गंध आती है, क्योंकि उसे मरे चार दिन हो गए।”
40
यीशु ने उससे कहा, “क्या मैं ने तुझ से न कहा था कि यदि तू विश्वास करेगी, तो परमेश्वर की महिमा को देखेगी।”
41
तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया, फिर यीशु ने आँखें उठाकर कहा, “हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तू ने मेरी सुन ली है।
42
और मै जानता था, कि तू सदा मेरी सुनता है, परन्तु जो भीड़ आस पास खड़ी है, उनके कारण मैं ने यह कहा, जिस से कि वे विश्वास करें, कि तू ने मुझे भेजा है।”
43
यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, “हे लाजर, निकल आ!”
44
जो मर गया था, वह कफन से हाथ पाँव बन्धे हुए निकल आया और उसका मुँह अंगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, “उसे खोलकर जाने दो।”
45
तब जो यहूदी मरियम के पास आए थे, और उसका यह काम देखा था, उन में से बहुतों ने उस पर विश्वास किया।
46
परन्तु उन में से कितनों ने फरीसियों के पास जाकर यीशु के कामों का समाचार दिया।
47
इस पर महायाजकों और फरीसियों ने मुख्य सभा के लोगों को इकट्ठा करके कहा, “हम करते क्या हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिन्ह दिखाता है।
48
यदि हम उसे योंही छोड़ दे, तो सब उस पर विश्वास ले आएँगे और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे।”
49
तब उन में से काइफा नाम एक व्यक्ति ने जो उस वर्ष का महायाजक था, उनसे कहा, “तुम कुछ नहीं जानते;
50
और न यह सोचते हो, कि तुम्हारे लिये यह भला है, कि हमारे लोगों के लिये एक मनुष्य मरे, और न यह, कि सारी जाति नाश हो।”
51
यह बात उसने अपनी ओर से न कही, परन्तु उस वर्ष का महायाजक होकर भविष्यद्वाणी की, कि यीशु उस जाति के लिये मरेगा;
52
और न केवल उस जाति के लिये, वरन् इसलिये भी, कि परमेश्वर की तित्तर बित्तर सन्तानों को एक कर दे।
53
सो उसी दिन से वे उसके मार डालने की सम्मति करने लगे।
54
इसलिये यीशु उस समय से यहूदियों में प्रगट होकर न फिरा; परन्तु वहाँ से जंगल के निकटवर्ती प्रदेश के इफ्राईम नाम, एक नगर को चला गया; और अपने चेलों के साथ वहीं रहने लगा।
55
और यहूदियों का फसह निकट था, और बहुतेरे लोग फसह से पहले दिहात से यरूशलेम को गए कि अपने आप को शुद्ध करें।
56
सो वे यीशु को ढूढ़ने और मन्दिर में खड़े होकर आपस में कहने लगे, “तुम क्या समझते हो? क्या वह पर्व में नहीं आएगा?”
57
और महायाजकों और फरीसियों ने भी आज्ञा दे रखी थी, कि यदि कोई यह जाने कि यीशु कहाँ है तो बताए, कि उसे पकड़ लें।
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