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Luke 1
Hindi 2017 (नया नियम)
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1
इसलिये कि बहुतों ने उन बातों का जो हमारे बीच में बीती हैं, इतिहास लिखने में हाथ लगाया है।
2
जैसा कि उन्होंने जो पहले ही से इन बातों के देखनेवाले और वचन के सेवक थे हम तक पहुँचाया।
3
इसलिये हे श्रीमान थियुफिलुस मुझे भी यह उचित मालूम हुआ कि उन सब बातों का सम्पूर्ण हाल आरम्भ से ठीक-ठीक जाँच करके उन्हें तेरे लिये क्रमानुसार लिखूँ।
4
कि तू यह जान ले, कि वे बातें जिनकी तू ने शिक्षा पाई है, कैसी अटल हैं।
5
यहूदियों के राजा हेरोदेस के समय अबिय्याह के दल में जकरयाह नाम का एक याजक था, और उसकी पत्नी हारून के वंश की थी, जिसका नाम इलीशिबा था।
6
और वे दोनों परमेश्वर के सामने धर्मी थे, और प्रभु की सारी आज्ञाओं और विधियों पर निर्दोष चलने वाले थे।
7
उनके कोई सन्तान न थी, क्योंकि इलीशिबा बाँझ थी, और वे दोनों बूढ़े थे।।
8
जब वह अपने दल की पारी पर परमेश्वर के सामने याजक का काम करता था।
9
तो याजकों की रीति के अनुसार उसके नाम पर चिट्ठी निकली, कि प्रभु के मन्दिर में जाकर धूप जलाए।
10
और धूप जलाने के समय लोगों की सारी मण्डली बाहर प्रार्थना कर रही थी।
11
कि प्रभु का एक स्वर्गदूत धूप की वेदी की दाहिनी ओर खड़ा हुआ उसको दिखाई दिया।
12
और जकरयाह देखकर घबराया और उस पर बड़ा भय छा गया।
13
परन्तु स्वर्गदूत ने उससे कहा, “हे जकरयाह, भयभीत न हो क्योंकि तेरी प्रार्थना सुन ली गई है और तेरी पत्नी इलीशिबा से तेरे लिये एक पुत्र उत्पन्न होगा, और तू उसका नाम यूहन्ना रखना।
14
और तुझे आनन्द और हर्ष होगा: और बहुत लोग उसके जन्म के कारण आनन्दित होंगे।
15
क्योंकि वह प्रभु के सामने महान होगा; और दाखरस और मदिरा कभी न पिएगा; और अपनी माता के गर्भ ही से पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो जाएगा।
16
और इस्राएलियों में से बहुतेरों को उनके प्रभु परमेश्वर की ओर फेरेगा।
17
वह एलिय्याह की आत्मा और सामर्थ्य में हो कर उसके आगे-आगे चलेगा, कि पितरों का मन बाल-बच्चों की ओर फेर दे; और आज्ञा न माननेवालों को धर्मियों की समझ पर लाए; और प्रभु के लिये एक योग्य प्रजा तैयार करे।
18
जकरयाह ने स्वर्गदूत से पूछा, “यह मैं कैसे जानूँ? क्योंकि मैं तो बूढ़ा हूँ; और मेरी पत्नी भी बूढ़ी हो गई है।”
19
स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया, “मैं जिब्राईल हूँ, जो परमेश्वर के सामने खड़ा रहता हूँ; और मैं तुझ से बातें करने और तुझे यह सुसमाचार सुनाने को भेजा गया हूँ।
20
और देख, जिस दिन तक ये बातें पूरी न हो लें, उस दिन तक तू मौन रहेगा, और बोल न सकेगा, इसलिये कि तू ने मेरी बातों की जो अपने समय पर पूरी होंगी, प्रतीति न की।”
21
लोग जकरयाह की बाट देखते रहे और अचम्भा करने लगे कि उसे मन्दिर में ऐसी देर क्यों लगी?
22
जब वह बाहर आया, तो उनसे बोल न सका: अतः वे जान गए, कि उसने मन्दिर में कोई दर्शन पाया है; और व उनसे संकेत करता रहा, और गूँगा रह गया।
23
जब उसकी सेवा के दिन पूरे हुए, तो वह अपने घर चला गया।
24
इन दिनों के बाद उसकी पत्नी इलीशिबा गर्भवती हुई; और पाँच महीने तक अपने आप को यह कह के छिपाए रखा।
25
कि मनुष्यों में मेरा अपमान दूर करने के लिये प्रभु ने इन दिनों में कृपादृष्टि करके मेरे लिये ऐसा किया है।
26
छठवें महीने में परमेश्वर की ओर से जिब्राईल स्वर्गदूत गलील के नासरत नगर में,
27
एक कुँवारी के पास भेजा गया। जिसकी मंगनी यूसुफ नाम दाऊद के घराने के एक पुरूष से हुई थी: उस कुँवारी का नाम मरियम था।
28
और स्वर्गदूत ने उसके पास भीतर आकर कहा, “आनन्द और जय तेरी हो, जिस पर ईश्वर का अनुग्रह हुआ है! प्रभु तेरे साथ है!”
29
वह उस वचन से बहुत घबरा गई, और अतःचने लगी कि यह किस प्रकार का अभिवादन है?
30
स्वर्गदूत ने उससे कहा, “हे मरियम; भयभीत न हो, क्योंकि परमेश्वर का अनुग्रह तुझ पर हुआ है।
31
और देख, तू गर्भवती होगी, और तेरे एक पुत्र उत्पन्न होगा; तू उसका नाम यीशु रखना।
32
वह महान होगा; और परमप्रधान का पुत्र कहलाएगा; और प्रभु परमेश्वर उसके पिता दाऊद का सिंहासन उसको देगा।
33
और वह याकूब के घराने पर सदा राज्य करेगा; और उसके राज्य का अन्त न होगा।”
34
मरियम ने स्वर्गदूत से कहा, “यह कैसे होगा? मैं तो पुरूष को जानती ही नहीं।”
35
स्वर्गदूत ने उसको उत्तर दिया, “पवित्र आत्मा तुझ पर उतरेगा, और परमप्रधान की सामर्थ्य तुझ पर छाया करेगी इसलिये वह पवित्र जो उत्पन्न होनेवाला है, परमेश्वर का पुत्र कहलाएगा।
36
और देख, और तेरी कुटुम्बिनी इलीशिबा के भी बुढ़ापे में पुत्र होनेवाला है, यह उसका, जो बाँझ कहलाती थी छठवाँ महीना है।
37
क्योंकि जो वचन परमेश्वर की ओर से होता है वह प्रभावरहित नहीं होता।”
38
मरियम ने कहा, “देख, मैं प्रभु की दासी हूँ, मुझे तेरे वचन के अनुसार हो।” तब स्वर्गदूत उसके पास से चला गया।
39
उन दिनों में मरियम उठकर शीघ्र ही पहाड़ी देश में यहूदा के एक नगर को गई।
40
और जकरयाह के घर में जाकर इलीशिबा को नमस्कार किया।
41
ज्योंही इलीशिबा ने मरियम का नमस्कार सुना, त्योंही बच्चा उसके पेट में उछला, और इलीशिबा पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गई।
42
और उसने बड़े शब्द से पुकार कर कहा, “तू स्त्रियों में धन्य है, और तेरे पेट का फल धन्य है!
43
और यह अनुग्रह मुझे कहाँ से हुआ, कि मेरे प्रभु की माता मेरे पास आई?
44
और देख ज्योंही तेरे नमस्कार का शब्द मेरे कानों में पड़ा त्योंही बच्चा मेरे पेट में आनन्द से उछल पड़ा।
45
और धन्य है, वह जिस ने विश्वास किया कि जो बातें प्रभु की ओर से उससे कही गई, वे पूरी होंगी।”
46
तब मरियम ने कहा, “मेरा प्राण प्रभु की बड़ाई करता है।
47
और मेरी आत्मा मेरे उद्धार करनेवाले परमेश्वर से आनन्दित हुई।
48
क्योंकि उसने अपनी दासी की दीनता पर दृष्टि की है; इसलिये देखो, अब से सब युग-युग के लोग मुझे धन्य कहेंगे।
49
क्योंकि उस शक्तिमान ने मेरे लिये बड़े-बड़े काम किए हैं, और उसका नाम पवित्र है।
50
और उसकी दया उन पर, जो उससे डरते हैं, पीढ़ी से पीढ़ी तक बनी रहती है।
51
उसने अपना भुजबल दिखाया, और जो अपने आप को बड़ा समझते थे, उन्हें तित्तर-बित्तर किया।
52
उसने बलवानों को सिंहासनों से गिरा दिया; और दीनों को ऊँचा किया।
53
उसने भूखों को अच्छी वस्तुओं से तृप्त किया, और धनवानों को छूछे हाथ निकाल दिया।
54
उसने अपने सेवक इस्राएल को सम्भाल लिया कि अपनी उस दया को स्मरण करे,
55
जो अब्राहम और उसके वंश पर सदा रहेगी, जैसा उसने हमारे बाप-दादों से कहा था।”
56
मरियम लगभग तीन महीने उसके साथ रहकर अपने घर लौट गई।
57
तब इलीशिबा के जनने का समय पूरा हुआ, और वह पुत्र जनी।
58
उसके पड़ोसियों और कुटुम्बियों ने यह सुन कर, कि प्रभु ने उस पर बड़ी दया की है, उसके साथ आनन्दित हुए।
59
और ऐसा हुआ कि आठवें दिन वे बालक का खतना करने आए और उसका नाम उसके पिता के नाम पर जकरयाह रखने लगे।
60
और उसकी माता ने उत्तर दिया, “नहीं; वरन उसका नाम यूहन्ना रखा जाए।”
61
और उन्होंने उससे कहा, “तेरे कुटुम्ब में किसी का यह नाम नहीं।”
62
तब उन्होंने उसके पिता से संकेत करके पूछा कि तू उसका नाम क्या रखना चाहता है?
63
और उसने लिखने की पट्टी मँगाकर लिख दिया, “उसका नाम यूहन्ना है,” और सभों ने अचम्भा किया।
64
तब उसका मुँह और जीभ तुरन्त खुल गई; और वह बोलने और परमेश्वर का धन्यवाद करने लगा।
65
और उसके आस पास के सब रहनेवालों पर भय छा गया; और उन सब बातों की चर्चा यहूदिया के सारे पहाड़ी देश में फैल गई।
66
और सब सुननेवालों ने अपने-अपने मन में विचार करके कहा, “यह बालक कैसा होगा?” क्योंकि प्रभु का हाथ उसके साथ था।
67
और उसका पिता जकरयाह पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हो गया, और भविष्यद्ववाणी करने लगा।
68
“प्रभु इस्राएल का परमेश्वर धन्य हो, कि उसने अपने लोगों पर दृष्टि की और उन का छुटकारा किया है,
69
और अपने सेवक दाऊद के घराने में हमारे लिये एक उद्धार का सींग निकाला,
70
जैसे उसने अपने पवित्र भविष्यद्वक्ताओं के द्वारा जो जगत के आदि से होते आए हैं, कहा था,
71
अर्थात् हमारे शत्रुओं से, और हमारे सब बैरियों के हाथ से हमारा उद्धार किया है;
72
कि हमारे बाप-दादों पर दया करके अपनी पवित्र वाचा का स्मरण करे,
73
और वह शपथ जो उसने हमारे पिता अब्राहम से खाई थी,
74
कि वह हमें यह देगा, कि हम अपने शत्रुओं के हाथ से छुटकर,
75
उसके सामने पवित्रता और धार्मिकता से जीवन भर निडर रहकर उसकी सेवा करते रहें।
76
और तू हे बालक, परमप्रधान का भविष्यद्वक्ता कहलाएगा, क्योंकि तू प्रभु के मार्ग तैयार करने के लिये उसके आगे-आगे चलेगा,
77
कि उसके लोगों को उद्धार का ज्ञान दे, जो उनके पापों की क्षमा से प्राप्त होता है।
78
यह हमारे परमेश्वर की उसी बड़ी करूणा से होगा; जिसके कारण ऊपर से हम पर भोर का प्रकाश उदय होगा।
79
कि अन्धकार और मृत्यु की छाया में बैठनेवालों को ज्योति दे, और हमारे पाँवो को कुशल के मार्ग में सीधे चलाए।”
80
और वह बालक बढ़ता और आत्मा में बलवन्त होता गया, और इस्राएल पर प्रगट होने के दिन तक जंगलों में रहा।
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