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Luke 19
Hindi 2017 (नया नियम)
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1
वह यरीहो में प्रवेश करके जा रहा था।
2
और देखो, जक्कई नाम एक मनुष्य था जो चुंगी लेनेवालों का सरदार और धनी था।
3
वह यीशु को देखना चाहता था कि वह कौन सा है? परन्तु भीड़ के कारण देख न सकता था। क्योंकि वह नाटा था।
4
तब उसको देखने के लिये वह आगे दौड़कर एक गूलर क पेड़ पर चढ़ गया, क्योंकि वह उसी मार्ग से जाने वाला था।
5
जब यीशु उस जगह पहुँचा, तो ऊपर दृष्टि कर के उससे कहा, “हे जक्कई, झट उतर आ; क्योंकि आज मुझे तेरे घर में रहना अवश्य है।”
6
वह तुरन्त उतरकर आनन्द से उसे अपने घर को ले गया।
7
यह देखकर सब लोग कुड़कुड़ाकर कहने लगे, “वह तो एक पापी मनुष्य के यहाँ जा उतरा है।”
8
जक्कई ने खड़े होकर प्रभु से कहा, “हे प्रभु, देख, मैं अपनी आधी सम्पत्ति कंगालों को देता हूँ, और यदि किसी का कुछ भी अन्याय करके ले लिया है तो उसे चौगुना फेर देता हूँ।”
9
तब यीशु ने उससे कहा, “आज इस घर में उद्धार आया है, इसलिये कि यह भी अब्राहम का एक पुत्र है।
10
“क्योंकि मनुष्य का पुत्र खोए हुओं को ढूँढ़ने और उन का उद्धार करने आया है।”
11
जब वे ये बातें सुन रहे थे, तो उसने एक दृष्टान्त कहा, इसलिये कि वह यरूशलेम के निकट था, और वे समझते थे, कि परमेश्वर का राज्य अभी प्रगट होने वाला है।
12
अतः उसने कहा, “एक धनी मनुष्य दूर देश को चला ताकि राजपद पाकर लौट आए।
13
“और उसने अपने दासों में से दस को बुलाकर उन्हें दस मुहरें दीं, और उनसे कहा, ‘मेरे लौट आने तक लेन-देन करना।’
14
“परन्तु उसके नगर के रहनेवाले उससे बैर रखते थे, और उसके पीछे दूतों के द्वारा कहला भेजा, कि हम नहीं चाहते, कि यह हम पर राज्य करे।
15
“जब वह राजपद पाकर लौट आया, तो ऐसा हुआ कि उसने अपने दासों को जिन्हें रोकड़ दी थी, अपने पास बुलवाया ताकि मालूम करे कि उन्होंने लेन-देन से क्या-क्या कमाया।
16
“तब पहले ने आकर कहा, ‘हे स्वामी तेरे मुहर से दस और मुहरें कमाई हैं।’
17
“उसने उससे कहा, ‘धन्य हे उत्तम दास, तुझे धन्य है, तू बहुत ही थोड़े में विश्वासी निकला अब दस नगरों का अधिकार रख।’
18
“दूसरे ने आकर कहा, ‘हे स्वामी तेरी मुहर से पाँच और मुहरें कमाई हैं।’
19
“उसने उससे कहा, ‘तू भी पाँच नगरों पर हाकिम हो जा।’
20
“तीसरे ने आकर कहा, ‘हे स्वामी देख, तेरी मुहर यह है, जिसे मैं ने अंगोछे में बान्ध रखा था।’
21
क्योंकि मैं तुझ से डरता था, इसलिये कि तू कठोर मनुष्य है: जो तू ने नहीं रखा उसे उठा लेता है, और जो तू ने नहीं बोया, उसे काटता है।
22
“उसने उससे कहा, ‘हे दुष्ट दास, मैं तेरे ही मुँह से तुझे दोषी ठहराता हूँ: तू मुझे जानता था कि कठोर मनुष्य हूँ, जो मैं ने नहीं रखा उसे उठा लेता, और जो मैं ने नहीं बोया, उसे काटता हूँ?
23
‘तो तू ने मेरे रूपये कोठी में क्यों नहीं रख दिए, कि मैं आकर ब्याज समेत ले लेता?’
24
“और जो लोग निकट खड़े थे, उसने उनसे कहा, ‘वह मुहर उससे ले लो, और जिसके पास दस मुहरें हैं उसे दे दो।’
25
“उन्होंने उससे कहा, ‘हे स्वामी, उसके पास दस मुहरें तो हैं।’
26
“मैं तुम से कहता हूँ, कि जिसके पास है, उसे दिया जाएगा; और जिसके पास नहीं, उससे वह भी जो उसके पास है ले लिया जाएगा।
27
“परन्तु मेरे उन बैरियों को जो नहीं चाहते थे कि मैं उन पर राज्य करूँ, उनको यहाँ लाकर मेरे सामने घात करो।”
28
ये बातें कहकर वह यरूशलेम की ओर उनके आगे-आगे चला।
29
और जब वह जैतून नाम पहाड़ पर बैतफगे और बैतनिय्याह के पास पहुँचा, तो उसने अपने चेलों में से दो को यह कहके भेजा,
30
“सामने के गाँव में जाओ, और उसमें पहुँचते ही एक गदही का बच्चा जिस पर कभी कोई सवार नहीं हुआ, बन्धा हुआ तुम्हें मिलेगा, उसे खोलकर लाओ।
31
“और यदि कोई तुम से पूछे, कि क्यों खोलते हो, तो यह कह देना, कि प्रभु को इस का प्रयोजन है।”
32
जो भेजे गए थे, उन्होंने जाकर जैसा उसने उनसे कहा था, वैसा ही पाया।
33
जब वे गदहे के बच्चे को खोल रहे थे, तो उसके मालिकों ने उनसे पूछा, “इस बच्चे को क्यों खोलते हो?”
34
उन्होंने कहा, “प्रभु को इस का प्रयोजन है।”
35
वे उसको यीशु के पास ले आए और अपने कपड़े उस बच्चे पर डालकर यीशु को उस पर बैठा दिया।
36
जब वह जा रहा था, तो वे अपने कपड़े मार्ग में बिछाते जाते थे।
37
और निकट आते हुए जब वह जैतून पहाड़ की ढलान पर पहुँचा, तो चेलों की सारी मण्डली उन सब सामर्थ्य के कामों के कारण जो उन्होंने देखे थे, आनन्दित होकर बड़े शब्द से परमेश्वर की स्तुति करने लगी:
38
“धन्य है वह राजा, जो प्रभु के नाम से आता है! स्वर्ग में शान्ति और आकाश मण्डल में महिमा हो!”
39
तब भीड़ में से कितने फरीसी उससे कहने लगे, “हे गुरू अपने चेलों को डाँट।”
40
उसने उत्तर दिया, “तुम में से कहता हूँ, यदि ये चुप रहें, तो पत्थर चिल्ला उठेंगे।”
41
जब वह निकट आया तो नगर को देखकर उस पर रोया।
42
और कहा, “क्या ही भला होता, कि तू; हाँ, तू ही, इसी दिन में कुशल की बातें जानता, परन्तु अब वे तेरी आँखों से छिप गई हैं।
43
“क्योंकि वे दिन तुझ पर आएँगे कि तेरे बैरी मोर्चा बान्धकर तुझे घेर लेंगे, और चारों ओर से तुझे दबाएँगे।
44
और तुझे और तेरे बालकों को जो तुझ में हैं, मिट्टी में मिलाएँगे, और तुझ में पत्थर पर पत्थर भी न छोड़ेंगे; क्योंकि तू ने वह अवसर जब तुझ पर कृपा दृष्टि की गई न पहचाना।”
45
तब वह मन्दिर में जाकर बेचनेवालों को बाहर निकालने लगा।
46
और उनसे कहा, “लिखा है; ‘मेरा घर प्रार्थना का घर होगा,’ परन्तु तुम ने उसे डाकुओं की खोह बना दिया है।”
47
और वह प्रति दिन मन्दिर में उपदेश करता था: और महायाजक और शास्त्री और लोगों के प्रमुख उसे नाश करने का अवसर ढूँढ़ते थे।
48
परन्तु कोई उपाय न निकाल सके; कि यह किस प्रकार करें, क्योंकि सब लोग बड़ी चाह से उसकी सुनते थे।
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