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Job 39
Job 39
Chhattisgarhi
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1
“का तेंह जानथस कि पहाड़ के जंगली छेरीमन कब पीला देथें? का तेंह देखथस कि हिरनी ह कब पीला देथे?
2
का तेंह ओमन के गरभ धारन करे के महिनामन ला गनथस? का तेंह ओमन के जनम देय के समय ला जानथस?
3
ओमन निहरके अपन पीला ला जनमथें; अऊ ओमन के लइका जनमे के पीरा ह खतम हो जाथे।
4
ओमन के पीलामन जंगल म बाढ़थें अऊ मजबूत होवत जाथें; ओमन चल देथें अऊ फेर लहुंटके नइं आवंय।
5
“कोन ह जंगली गदहामन ला खुला छोंड़ देथे? कोन ह ओमन के बंधना ला खोल दीस?
6
ओमन ला मेंह ओमन के घर बर सुन्ना जगह, अऊ ओमन के निवास बर नूनचूर ऊसर भुइयां देय हवंव।
7
ओमन तो सहर के कोलाहल ऊपर हांसथें; ओमन गदहा खेदइया के हांका ला नइं सुनंय।
8
ओमन अपन चारा बर पहाड़मन म किंदरथें अऊ हरियर-हरियर चारा खोजत रहिथें।
9
“का जंगली बईला ह तोर सेवा करे बर सहमती दीही? का ओह तोर कोटना के तीर म रात बिताही?
10
का तेंह जंगली बईला ला डोरी ले बांधके नांगर जोत सकथस? का ओह तोर पाछू घाटी म पाटा ला खींचही?
11
का तेंह ओकर बड़े बल के सेति ओकर ऊपर भरोसा करबे? का तेंह अपन मेहनत के काम ला ओकर ऊपर छोंड़ देबे?
12
का तेंह ओकर ऊपर भरोसा करबे कि ओह तोर अनाज ला लानय अऊ लानके तोर कोठार म रखय?
13
“सुतुरमुर्ग ह अपन डेनामन ला आनंद म फड़फड़ाथे, हालाकि ओमन के तुलना सारस के डेना अऊ पांखीमन ले नइं करे जा सकय।
14
सुतुरमुर्ग ह तो अपन अंडा भुइयां म देथे अऊ ओमन ला धुर्रा के गरमी ह सेथे,
15
ओला धियान नइं रहय कि ओमन काकरो गोड़ ले कुचरे जा सकथें, या कोनो जंगली पसु ओमन ला कुचर सकथे।
16
ओह अपन पीलामन ले कठोर बरताव करथे, मानो कि ओमन ओकर पीला नो हंय; ओह फिकर नइं करय कि ओकर मेहनत ह बेकार रिहिस,
17
काबरकि परमेसर ह ओला बुद्धि नइं देय हवय या ओला बने समझ नइं देय हवय।
18
तभो ले जब ओह दऊड़े बर अपन डेना ला बगराथे, त ओह घोड़ा अऊ ओकर सवारी करइया ऊपर हांसथे।
19
“का तेंह घोड़ा ला ओकर बल देथस या का तेंह ओकर घेंच म उड़त लम्बा बाल पहिराय हस?
20
का तेंह ओला फांफा कस उचके के बल देथस, जेकर फुंफकारे के अवाज ह आतंक फईला देथे?
21
ओह अपन बल ऊपर आनंद मनात, अपन खुर ले भुइयां ला खुरचथे, अऊ लड़ई के सामना करथे।
22
ओह बिगर कोनो भय के, डर के ऊपर हंसथे; ओह तलवार ला देखके पाछू नइं घुंचय।
23
तरकस ह अपन किनारा के बिरूध चमकत बरछी अऊ भाला के संग खड़खड़ाथे।
24
उत्तेजित होके रिस के मारे, ओह भुइयां ला छेदथे; अऊ तुरही के अवाज सुनके ओह सीधा ठाढ़ नइं होवय।
25
तुरही के अवाज म ओह हिनहिनाथे, ‘अहा!’ ओह दूरिहाच ले लड़ई के गंध ला सुंघ लेथे, अऊ सेनापतिमन के ललकार अऊ लड़ई के गरजन ला सुन लेथे।
26
“का बाज चिरई ह तोर बुद्धि के दुवारा उड़थे अऊ दक्खिन कोति उड़े बर अपन डेनामन ला बगराथे?
27
का गिधवा ह तोर हुकूम ले बहुंत ऊपर म उड़थे अऊ अपन खोंधरा ला ऊंच जगह म बनाथे?
28
ओह निकले चट्टान के चोटी म रहिथे अऊ उहां रात बिताथे; खड़े चट्टान ह ओकर घर अय।
29
उहां ले ओह अपन जेवन के ताक म रहिथे; ओकर आंखी ह दूरिहा ले ही ओला देख लेथे।
30
ओकर पीलामन खून ला मजा लेके पीथें, अऊ जिहां लास रहिथे, उहां ओह घलो होथे।”
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