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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1 Thessalonians 5
1 Thessalonians 5
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
यौ भाइ लोकनि, कोन बात कहिया कखन होयत, ताहि सम्बन्ध मे किछु लिखबाक कोनो आवश्यकता नहि अछि,
2
कारण, अहाँ सभ अपने नीक सँ जनैत छी जे, “प्रभुक दिन” ताहि तरहेँ अचानक आओत जाहि तरहेँ राति मे चोर अबैत अछि।
3
लोक सभ कहैत रहत जे, “सभ शान्त आ सुरक्षित अछि,” तखन जहिना गर्भवती स्त्री पर अचानक बच्चा केँ जन्म देबाक कष्ट अबैत छैक, तहिना ओकरा सभ पर विनाश आओत, और ओकरा सभ केँ बचबाक कोनो उपाय नहि रहतैक।
4
मुदा, यौ भाइ लोकनि, अहाँ सभ अन्हार मे नहि रहि रहल छी जे ओ दिन चोर जकाँ अहाँ सभ पर अचानक आबि जाय।
5
अहाँ सभ केओ तँ इजोतक सन्तान छी, दिनक सन्तान छी। अपना सभ रातिक वा अन्हारक नहि छी।
6
एहि लेल अपना सभ आन लोक सभ जकाँ सुतल नहि रही, बल्कि सतर्क रही आ अपना केँ वश मे राखी।
7
कारण, जे सभ सुतैत अछि से रातिए मे सुतैत अछि आ जे सभ पिबि कऽ माति जाइत अछि सेहो रातिए मे मतैत अछि।
8
मुदा अपना सभ जे छी, से दिनक छी आ तेँ विश्वास आ प्रेम केँ कवच जकाँ, और मुक्तिक आशा केँ टोप जकाँ पहिरि कऽ सतर्क रही।
9
कारण, परमेश्वर अपना सभ केँ दण्ड पयबाक लेल नहि, बल्कि अपना सभक प्रभु यीशु मसीह द्वारा उद्धार पयबाक लेल चुनने छथि।
10
प्रभु यीशु अपना सभक लेल एहि लेल मरलाह जे अपना सभ ⌞हुनकर फेर अयबाक समय मे⌟ चाहे जीवित होइ वा मरि गेल होइ, हुनका संग जीबी।
11
तेँ अहाँ सभ एक-दोसर केँ प्रोत्साहित करू और विश्वास मे मजगूत बनाउ, जेना अहाँ सभ करितो छी।
12
यौ भाइ लोकनि, अहाँ सभ सँ हमरा सभक आग्रह अछि जे, अहाँ सभक बीच जे सभ परिश्रम करैत छथि, आत्मिक देख-रेख करैत छथि और प्रभुक दिस सँ अहाँ सभ केँ शिक्षा आ चेतावनी दैत छथि, तिनका सभक आदर करिऔन।
13
हुनका सभक काजक कारणेँ प्रेमपूर्बक हुनका सभक सम्मान करिऔन। एक-दोसरक संग मेल-मिलाप सँ रहू।
14
यौ भाइ लोकनि, अहाँ सभ सँ हमरा सभक इहो आग्रह अछि जे, आलसी भाय सभ केँ चेतावनी दिअ। जे केओ हिम्मत हारि लेने छथि, तिनका सभक हिम्मत बढ़ाउ। जे केओ कमजोर छथि तिनका सभक सहायता करू। सभक संग सहनशीलताक व्यवहार करैत धैर्य राखू।
15
एहि बातक ध्यान राखू जे, केओ अधलाह व्यवहारक बदला अधलाह व्यवहार नहि करी, बल्कि सदिखन एक-दोसराक लेल आ सभ लोकक लेल भलाइ करैत रहबाक प्रयास करू।
16
सदिखन आनन्दित रहू,
17
लगातार प्रार्थना करैत रहू।
18
प्रत्येक परिस्थिति मे परमेश्वर केँ धन्यवाद दिऔन, कारण, अहाँ सभ जे मसीह यीशु मे छी तिनका सभ सँ परमेश्वर यैह बात चाहैत छथि।
19
परमेश्वरक पवित्र आत्माक आगि केँ नहि मिझाउ।
20
परमेश्वरक दिस सँ पाओल-सुनाओल सम्बाद सभ केँ तुच्छ नहि बुझू।
21
सभ बात केँ ठीक सँ जाँचू-बुझू और जे ठीक अछि ताहि मे दृढ़ रहू।
22
सभ तरहक अधलाह बात सँ दूर रहू।
23
शान्ति देबऽ वला परमेश्वर स्वयं अहाँ सभ केँ पूर्ण रूप सँ पवित्र करथि। ओ अहाँ सभक आत्मा, प्राण आ शरीर केँ अपना सभक प्रभु यीशु मसीहक अयबाक समय धरि निर्दोष आ सुरक्षित राखथि।
24
ई काज ओ अवश्य करताह, कारण ओ जे अहाँ सभ केँ बजबैत छथि से विश्वासयोग्य छथि।
25
यौ भाइ लोकनि, हमरा सभक लेल प्रार्थना करैत रहू।
26
ओहिठामक सभ भाय लोकनि केँ हमरा सभक दिस सँ पवित्र प्रेमक संग नमस्कार कहिऔन।
27
अहाँ सभ केँ प्रभुक समक्ष ई आज्ञा दैत छी जे, सभ भाय केँ ई पत्र पढ़ि कऽ सुनाओल जाय।
28
अपना सभक प्रभु यीशु मसीहक कृपा अहाँ सभ पर बनल रहय।
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