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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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2 Peter 2
2 Peter 2
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
मुदा परमेश्वरक ओहि प्रवक्ता सभक समय मे लोकक बीच एहनो व्यक्ति सभ छल जे झूठ बाजि कऽ अपना सभ केँ परमेश्वरक प्रवक्ता कहैत छल। तहिना अहूँ सभक बीच झुट्ठा शिक्षक सभ ठाढ़ होयत। ओ सभ गुप्त रूप सँ विनाश मे लऽ जाय वला गलत शिक्षा सभ देबऽ लागत, एतऽ तक जे ओ सभ ओहि स्वामी केँ सेहो अस्वीकार करतनि जे ओकरा सभक छुटकाराक लेल दाम चुका कऽ किनने छथिन, आ एहि तरहेँ ओ सभ जल्दिए अपन विनाशक कारण बनत।
2
बहुतो लोक ओकरा सभक निर्लज्ज वला चालि-चलन अपना लेत, आ ओकरा सभक कारणेँ सत्यक मार्गक बदनामी होयत।
3
ओ सभ लोभक कारणेँ अपन बनाओल बात सभ द्वारा अहाँ सभ सँ अनुचित लाभ उठाओत। दण्डक आज्ञा ओकरा सभ पर बहुत पहिनहि भऽ चुकल अछि; ओ एखनो लागू अछि, और आब ओकरा सभक विनाश नजदीक आबि गेल अछि।
4
मोन राखू जे, जे स्वर्गदूत सभ पाप कयलक तकरा सभ केँ परमेश्वर नहि छोड़लनि, बल्कि ओकरा सभ केँ नरकक अन्हार मे जंजीर सँ जकड़ि कऽ न्यायक दिनक प्रतीक्षा करबाक लेल राखि देलनि।
5
ओ प्राचीन कालक संसार केँ नहि छोड़ि, ओहि मेहक अधर्मी लोक केँ जल-प्रलय द्वारा नष्ट कऽ देलथिन, मुदा धार्मिकताक प्रचार करऽ वला नूह आ हुनका संग सात आरो व्यक्तिक रक्षा कयलथिन।
6
ओ सदोम आ गमोरा नगर सभ केँ भस्म कऽ विनाशक दण्ड देलथिन, जाहि सँ ई घटना भविष्यक अधर्मी सभक लेल एक चेतावनी होअय।
7
मुदा ओ लूत केँ बचौलथिन, जे धर्मी लोक छलाह आ ओहि अधर्मी लोक सभक कुकर्मी व्यवहारक कारणेँ दुखी छलाह।
8
कारण, ओ धर्मी पुरुष ओहि लोक सभक बीच मे रहि कऽ दिन प्रति दिन ओकरा सभक जे अधर्मक काज केँ देखैत आ सुनैत छलाह ताहि सँ हुनकर धर्मनिष्ठ आत्मा केँ घोर कष्ट होइत छलनि।
9
एहि तरहेँ अपना सभ देखैत छी जे प्रभु धर्मी लोक केँ संकट मे सँ बचौनाइ आ अधर्मी सभ केँ दण्ड देबाक लेल न्यायक दिन तक रखनाइ जनैत छथि,
10
विशेष रूप सँ तकरा सभ केँ, जे सभ अपना पापी स्वभावक अशुद्ध इच्छा सभक वश मे भऽ तकर सभक पूर्ति करैत अछि आ किनको अधीन मे नहि रहैत अछि। ई झुट्ठा शिक्षक सभ उदण्ड आ घमण्डी अछि, और स्वर्गिक प्राणी सभक निन्दा करऽ सँ सेहो नहि डेराइत अछि,
11
जखन कि स्वर्गदूत सभ, शक्ति आ सामर्थ्य मे श्रेष्ठ होइतो, प्रभुक सम्मुख ओकरा सभक निन्दा कऽ कऽ ओकरा सभ पर दोष नहि लगबैत छथि।
12
एहन लोक अविवेकी जानबर जकाँ अछि जे नीक-अधलाह किछु नहि बुझैत अछि आ जे पकड़ल और मारल जयबाक लेल उत्पन्न होइत अछि। ई लोक जाहि बात सभ केँ बुझितो नहि अछि, तकर निन्दा करैत अछि। जानबर सभ जकाँ, एकरो सभ केँ नष्ट कयल जयतैक।
13
ई सभ जे दोसर केँ हानि पहुँचौने अछि, तकरा बदला मे एकरा सभ केँ सेहो हानि होयतैक। एकरा सभक लेल मनोरंजनक अर्थ अछि, दिन-दुपहरक समय मे भोग-विलास कयनाइ। ई सभ कलंकित आ दुषित लोक अछि आ अहाँ सभक संग बैसि कऽ खाइत-पिबैत काल सेहो एकरा सभक मोन अपना भोग-विलासक बात सभ मे मग्न रहैत छैक।
14
ई सभ बिनु कुकर्मक इच्छा राखि, स्त्रीगण केँ देखिए नहि सकैत अछि। ई सभ पाप करऽ सँ चुकैत नहि अछि। ई सभ चंचल बुद्धि वला लोक सभ केँ अपना जाल मे फँसा लैत अछि। एकरा सभक मोन केँ लोभ करबाक आदत भऽ गेल छैक। एकरा सभ पर परमेश्वरक सराप अछि!
15
ई सभ सोझका बाट छोड़ि कऽ भटकि गेल अछि, किएक तँ ई सभ बेओरक पुत्र बिलामक बाट पर चलऽ लागल अछि, जे अधर्मक मजदूरीक लोभ कयने छल।
16
मुदा ओकरा अपन अपराधक लेल एकटा गदहा सँ डाँट-फटकार सुनऽ पड़लैक—एकटा पशु, जे बात नहि करैत अछि, से मनुष्य जकाँ बाजऽ लागल आ एहि तरहेँ ओहि भविष्यवक्ताक पागलपन केँ रोकि देलक।
17
ई झुट्ठा शिक्षक सभ ओहन इनार अछि, जाहि मे पानि नहि छैक, ओहन मेघ अछि, जकरा हवा उड़िआ कऽ लऽ जाइत अछि। एकरा सभक लेल अन्हार-गुज स्थान निश्चित कयल गेल अछि।
18
कारण, ई सभ घमण्डक बेकार बात सभ कहैत, लोकक शारीरिक लालसा सभ केँ जगा कऽ काम-वासनाक बात सभ द्वारा ओहन लोक सभ केँ फुसला कऽ फँसा लैत अछि जे सभ हाले मे कुकर्मक बाट पर चलऽ वला सभक संगति सँ बाँचि आयल अछि।
19
ई सभ ओकरा सभ केँ स्वतन्त्र करबाक वचन दैत अछि, जखन कि ई सभ स्वयं भ्रष्टताक गुलाम अछि, किएक तँ जँ केओ कोनो बातक वश मे अछि तँ ओ तकर गुलाम भऽ गेल अछि।
20
जँ ई सभ अपना सभक प्रभु आ उद्धारकर्ता यीशु मसीह केँ चिन्हि कऽ संसारक अशुद्धता सँ बाँचि कऽ निकलि गेलाक बाद फेर ओहि मे फँसि कऽ ओकरे वश मे भऽ गेल, तँ एकरा सभक ई दशा पहिलुको दशा सँ अधलाह अछि।
21
जे पवित्र शिक्षा एकरा सभ केँ देल गेल छल, तकरा बुझि लेलाक बाद ओहि सँ मुँह मोड़ि लेब, ताहि सँ नीक एकरा सभक लेल ई रहैत जे एकरा सभ केँ धार्मिकताक बाटक ज्ञाने नहि प्राप्त भेल रहितैक।
22
एहन लोकक विषय मे ई कहावत सत्य ठहरैत अछि जे, “कुकुर अपन बोकरल चटबाक लेल घूमि अबैत अछि” आ “नहाओल-सोन्हाओल सुगरनी घूमि कऽ फेर थाल मे ओँघराय लगैत अछि।”
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