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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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2 Peter 3
2 Peter 3
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Chapter 3
1
प्रिय मित्र सभ, हम अहाँ सभ केँ आब ई दोसर पत्र लिखि रहल छी। हम दूनू पत्र मे किछु बात सभक स्मरण दिअबैत अहाँ सभक मोन केँ जागरूक करऽ चाहलहुँ, जाहि सँ अहाँ सभ एहि बात सभक बारे मे ठीक प्रकार सँ सोची।
2
हम चाहैत छी जे, जे बात सभ प्राचीन समय मे परमेश्वरक पवित्र प्रवक्ता सभ द्वारा कहल गेल, और जे आज्ञा अपना सभक प्रभु आ उद्धारकर्ता अहाँ सभक मसीह-दूत लोकनि द्वारा अहाँ सभ केँ सुनबौलनि, ताहि सभ बातक अहाँ सभ स्मरण करी।
3
सभ सँ पहिने अहाँ सभ ई जानि लिअ जे अन्तिम दिन सभ मे हँसी उड़ाबऽ वला धर्मनिन्दक सभ आओत। ओ सभ अपन अधलाह इच्छा सभक अनुसार विचार-व्यवहार करत
4
आ हँसी उड़बैत कहत जे, “की ओ वचन नहि देने रहथि जे हम फेर आयब? तँ कहाँ अयलाह? हमरा सभक पूर्वज सभ तँ चल गेलाह, तैयो सृष्टिक आरम्भ सँ एखन धरि सभ किछु ओहिना चलैत आबि रहल अछि।”
5
मुदा ओ सभ जानि-बुझि कऽ ई बिसरि जाइत अछि जे प्राचीन समय मे आकाश आ पृथ्वी छल, और पृथ्वी परमेश्वरक आदेशे द्वारा जल मे सँ आ जलक माध्यम सँ बनाओल गेल।
6
और ओही जल द्वारा ओहि समयक संसार बाद मे जल-प्रलय सँ नष्ट सेहो भऽ गेल।
7
हुनके आदेश द्वारा वर्तमान आकाश आ पृथ्वी आगि सँ भस्म होयबाक लेल सुरक्षित राखल गेल अछि। एकरा ओहि दिनक लेल राखल जा रहल अछि जहिया अधर्मी लोक सभक न्याय होयतैक आ ओ सभ नष्ट कऽ देल जायत।
8
मुदा यौ प्रिय मित्र सभ, एकटा एहि बात केँ नहि बिसरू जे, प्रभुक दृष्टि मे एक दिन हजार वर्षक बराबरि अछि, आ हजार वर्ष एक दिनक बराबरि।
9
प्रभु अपन देल वचन पूरा करबा मे देरी नहि करैत छथि, जेना कि किछु लोक बुझैत अछि, बल्कि ओ अहाँ सभक प्रति धैर्य रखने छथि। ओ ई नहि चाहैत छथि जे केओ नाश होअय, बल्कि ई चाहैत छथि जे सभ केओ अपना पापक लेल पश्चात्ताप कऽ कऽ हृदय-परिवर्तन करय।
10
मुदा “प्रभुक दिन” चोर जकाँ अचानक आओत। तखन आकाश भयंकर आवाजक संग बिला जायत। सूर्य, चन्द्रमा और तारा सभ प्रचण्ड ताप सँ पिघलि जायत, आ पृथ्वी और ओहि परक सभ वस्तु भस्म भऽ जायत।
11
जँ सभ वस्तु एहि प्रकार सँ नष्ट होमऽ वला अछि, तँ अहाँ सभ केँ केहन लोक होयबाक चाही? अहाँ सभ केँ ई चाही जे “परमेश्वरक दिनक” प्रतीक्षा करैत और ओकरा जल्दी लयबाक प्रयास करैत पवित्र आ भक्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करी। ओहि दिन आकाश जरि कऽ नष्ट भऽ जायत आ सूर्य, चन्द्रमा और तारा सभ प्रचण्ड ताप सँ पिघलि जायत।
13
मुदा हुनकर देल वचनक अनुसार अपना सभ एक नव आकाश आ नव पृथ्वीक बाट ताकि रहल छी जाहि मे धार्मिकता वास करत।
14
एहि लेल, यौ प्रिय मित्र सभ, जखन अहाँ सभ एहि बात सभक प्रतीक्षा कऽ रहल छी, तँ एहन कोशिश करू जे ओहि दिन अहाँ सभ प्रभुक दृष्टि मे निर्दोष आ निष्कलंक ठहरी आ हुनका संग मेल-मिलाप सँ रही।
15
मोन राखू जे प्रभुक धैर्य लोक केँ उद्धार पयबाक मौका दैत अछि, जेना कि अपना सभक प्रिय भाय पौलुस सेहो अपन ओहि ज्ञान सँ अहाँ सभ केँ लिखने छथि जे ज्ञान हुनका प्रभु सँ देल गेलनि।
16
ओ अपन सभ पत्र मे एके प्रकार सँ एहि बात सभक सम्बन्ध मे लिखैत छथि। हुनकर पत्र सभ मे किछु बात सभ एहन अछि जे कठिनाइ सँ बुझऽ मे अबैत अछि। अज्ञानी आ चंचल बुद्धि वला लोक सभ धर्मशास्त्रक आन बात सभ जकाँ एहू बात सभ केँ गलत अर्थ लगबैत अछि आ एहि तरहेँ अपन विनाशक कारण बनैत अछि।
17
यौ प्रिय मित्र सभ, अहाँ सभ एहि बात सभ केँ पहिनहि सँ जनैत छी। एहि लेल सावधान रहू। कहीं अधर्मी मनुष्य सभक बहकावा मे आबि कऽ अहाँ सभ अपन सुरक्षित स्थान सँ डगमगा कऽ खसि ने पड़ी।
18
बल्कि अहाँ सभ अपना सभक प्रभु आ उद्धारकर्ता यीशु मसीहक कृपा आ ज्ञान मे बढ़ैत जाउ। हुनकर गुणगान एखनो आ अनन्त काल धरि होइत रहनि! आमीन।
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