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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Luke 18
Luke 18
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
तखन यीशु अपना शिष्य सभ केँ ई बुझयबाक लेल जे निराश नहि भऽ कऽ प्रार्थना करैत रहबाक अछि, एक दृष्टान्त देलथिन।
2
ओ कहलथिन, “कोनो शहर मे एक न्यायाधीश रहैत छल जे ने परमेश्वरक डर मानैत छल आ ने कोनो मनुष्य केँ मोजर दैत छल।
3
ओहि शहर मे एक विधवा सेहो रहैत छलि जे बेर-बेर ओकरा लग आबि कऽ कहैत छलैक जे, ‘हमर उचित न्याय कऽ दिअ और हमरा संग जे अपराध कऽ रहल अछि, तकरा सँ हमरा बचाउ।’
4
“किछु दिन धरि ओ नहि मानलक, मुदा बाद मे ओ मोने-मोन सोचऽ लागल जे, ‘ओना तँ हम ने परमेश्वरक डर मानैत छी आ ने मनुष्य केँ मोजर दैत छी,
5
तैयो ई विधवा हमरा ततेक तंग कऽ देने अछि जे हम एकर उचित न्याय अवश्य कऽ देबैक। नहि तँ ई बेर-बेर आबि कऽ हमरा अकछ कऽ देत!’ ”
6
तखन प्रभु कहलथिन, “ओ अधर्मी न्यायाधीश की कहलक, से सुनलहुँ?
7
तँ की परमेश्वर अपन चुनल लोक, जे हुनका सँ दिन-राति विनती करैत छनि, तकरा सभक लेल उचित न्याय नहि करथिन? की ओकरा सभक लेल न्याय करऽ मे देरी करताह?
8
हम अहाँ सभ केँ कहैत छी, ओ ओकरा सभक लेल उचित न्याय करथिन, और शीघ्र करथिन। मुदा मनुष्य-पुत्र जहिया औताह, तँ की एहन विश्वास हुनका ककरो लग भेटतनि?”
9
तखन यीशु एहन लोक सभक लेल जे अपना केँ धर्मी मानि कऽ अपना धार्मिकता पर भरोसा रखैत छल और आन लोक सभ केँ हेय दृष्टि सँ देखैत छल, तकरा सभक लेल ई दृष्टान्त सुनौलनि,
10
“दू आदमी मन्दिर मे प्रार्थना करऽ गेल। एक गोटे फरिसी रहय और दोसर कर असूल करऽ वला।
11
फरिसी ठाढ़ भऽ कऽ एहि तरहेँ अपना विषय मे प्रार्थना कऽ कऽ कहऽ लागल, ‘हे परमेश्वर, हम अहाँ केँ धन्यवाद दैत छी जे हम आन लोक सभ जकाँ ठकहारा, दुष्कर्मी, वा परस्त्रीगमन करऽ वला नहि छी, आ ने एहि कर असूल करऽ वला सन छी।
12
हम सप्ताह मे दू दिन उपास करैत छी, और जे किछु हमरा भेटैत अछि, ताहि मे सँ हम दसम अंश अहाँ केँ चढ़बैत छी।’
13
“मुदा कर असूल करऽ वला फराके सँ ठाढ़ भऽ कऽ स्वर्ग दिस अपन आँखि उठयबाक साहसो नहि कयलक, बल्कि छाती पिटैत बाजल, ‘हे परमेश्वर, हम पापी छी, हमरा पर दया करू।’
14
“हम अहाँ सभ केँ कहैत छी जे, ओ पहिल आदमी नहि, बल्कि ई दोसर आदमी परमेश्वरक नजरि मे धर्मी ठहरि कऽ अपना घर गेल। कारण, जे केओ अपना केँ पैघ बुझैत अछि, से तुच्छ कयल जायत, और जे अपना केँ तुच्छ मानैत अछि से पैघ कयल जायत।”
15
लोक सभ यीशु लग अपन छोट-छोट धिआ-पुता सभ केँ सेहो अनैत छलनि जे ओ ओकरा सभ पर हाथ राखि आशीर्वाद देथिन। शिष्य सभ ई देखि कऽ लोक सभ केँ डाँटऽ लगलनि।
16
मुदा यीशु धिआ-पुता सभ केँ अपना लग बजौलनि, और शिष्य सभ केँ कहलथिन, “बच्चा सभ केँ हमरा लग आबऽ दिऔक, ओकरा सभ केँ नहि रोकिऔक। किएक तँ, परमेश्वरक राज्य एहने सभक अछि।
17
हम अहाँ सभ केँ सत्य कहैत छी जे, जे केओ बच्चा जकाँ परमेश्वरक राज्य ग्रहण नहि करत, से ओहि मे कहियो नहि प्रवेश करत।”
18
एकटा ऊँच अधिकारी यीशु सँ पुछलथिन, “यौ उत्तम गुरुजी! अनन्त जीवन प्राप्त करबाक लेल हम की करू?”
19
यीशु कहलथिन, “अहाँ हमरा ‘उत्तम’ किएक कहैत छी? परमेश्वर केँ छोड़ि आरो केओ उत्तम नहि अछि।
20
अहाँ धर्म-नियमक आज्ञा सभ तँ जनैत छी—‘परस्त्रीगमन नहि करह, हत्या नहि करह, चोरी नहि करह, झूठ गवाही नहि दैह, अपन माय-बाबूक आदर करह।’ ”
21
ओ उत्तर देलथिन, “एहि सभ आज्ञाक पालन हम बचपने सँ करैत छी।”
22
यीशु ई सुनि हुनका कहलथिन, “एक बातक कमी अहाँ मे एखनो अछि। अहाँ अपन सभ किछु बेचि कऽ ओकरा गरीब सभ मे बाँटि दिअ, अहाँ केँ स्वर्ग मे धन भेटत। तकरबाद आउ आ हमरा पाछाँ चलू।”
23
ई बात सुनि ओ बहुत उदास भेलाह, किएक तँ हुनका बहुत धन-सम्पत्ति छलनि।
24
यीशु हुनका दिस तकैत बजलाह, “धनिक सभक लेल परमेश्वरक राज्य मे प्रवेश कयनाइ कतेक कठिन अछि!
25
धनिक केँ परमेश्वरक राज्य मे प्रवेश कयनाइ सँ ऊँट केँ सुइक भूर दऽ कऽ निकलनाइ आसान अछि।”
26
एहि पर सुनऽ वला लोक सभ पुछलकनि, “तखन उद्धार ककर भऽ सकैत छैक?!”
27
यीशु उत्तर देलथिन, “जे बात मनुष्यक लेल असम्भव अछि, से परमेश्वरक लेल सम्भव अछि।”
28
पत्रुस हुनका कहलथिन, “देखू, हम सभ अपन सभ किछु त्यागि कऽ अहाँक पाछाँ आयल छी।”
29
यीशु हुनका सभ केँ कहलथिन, “हम अहाँ सभ केँ सत्ये कहैत छी जे, प्रत्येक व्यक्ति जे घर, घरवाली, भाय, माय-बाबू वा धिआ-पुता केँ परमेश्वरक राज्यक लेल त्याग करैत अछि,
30
तकरा एहि युग मे ओकर कतेको गुना भेटतैक, और आबऽ वला युग मे अनन्त जीवन।”
31
यीशु बारहो शिष्य केँ एक कात लऽ जा कऽ कहलथिन, “सुनू, अपना सभ यरूशलेम जा रहल छी। ओतऽ जा कऽ जे किछु प्रभुक प्रवक्ता सभक द्वारा मनुष्य-पुत्रक विषय मे लिखल गेल अछि, से सभ बात पूरा होयत।
32
ओ गैर-यहूदी सभक हाथ मे सौंपल जायत, लोक ओकर हँसी उड़ौतैक, बेइज्जति करतैक, ओकरा पर थुकतैक, कोड़ा लगौतैक, और जान सँ मारि देतैक।
33
मुदा तेसर दिन ओ फेर जीबि उठत।”
34
मुदा शिष्य सभ एहि बात सभ सँ किछु नहि बुझि सकलाह। हुनकर सम्पूर्ण कथन हुनका सभक लेल रहस्ये बनल रहल। बुझऽ मे नहि अयलनि जे हुनकर कहबाक तात्पर्य की छनि।
35
यीशु जखन यरीहो नगर लग पहुँचलाह, तँ एकटा आन्हर आदमी रस्ताक कात मे भीख मँगैत बैसल छल।
36
लोकक भीड़ ओहि दने जाइत सुनि ओ पुछऽ लागल जे, की भऽ रहल अछि?
37
लोक ओकरा कहलकैक, “नासरत-निवासी यीशु एहि दऽ कऽ जा रहल छथि।”
38
तखन ओ सोर पारऽ लागल, “यौ दाऊदक पुत्र यीशु, हमरा पर दया करू!”
39
आगाँ-आगाँ चलऽ वला लोक सभ ओकरा डँटैत चुप रहबाक लेल कहलकैक, मुदा ओ आओर जोर सँ हल्ला कऽ कऽ कहऽ लागल, “यौ दाऊदक पुत्र, हमरा पर दया करू!”
40
यीशु ठाढ़ भऽ गेलाह आ अपना लग ओकरा अनबाक आदेश देलथिन। आन्हर आदमी जखन हुनका लग आयल तँ ओ पुछलथिन,
41
“तोँ की चाहैत छह, हम तोरा लेल की करिअह?” ओ उत्तर देलकनि, “प्रभु, हम देखऽ चाहैत छी।”
42
यीशु ओकरा कहलथिन, “आब तोँ देखि सकैत छह! तोहर विश्वास तोरा नीक कऽ देलकह।”
43
ओ तुरत देखऽ लागल और परमेश्वरक स्तुति-प्रशंसा करैत यीशुक पाछाँ चलऽ लागल। ई देखि सभ लोक सेहो परमेश्वरक स्तुति करऽ लागल।
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