bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
/
Acts 25
Acts 25
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
← Chapter 24
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 26 →
1
सूबे का हाकिम फ़ेस्तुस वारिद होने के तीन दिन बाद, क़ैसरिया से यरूशलेम गया
2
जहां अहम-काहिन और यहूदी रहनुमा उस के हुज़ूर में आकर पौलुस के ख़िलाफ़ पैरवी करने लगे।
3
उन्होंने फ़ेस्तुस से मिन्नत की, वह फ़ौरन पौलुस के यरूशलेम में मुन्तक़िल करने का हुक्म दे, दरअस्ल उन्होंने पौलुस को राह ही में मार डालने की साज़िश की हुई थी।
4
मगर फ़ेस्तुस ने जवाब दिया, “पौलुस तो क़ैसरिया में क़ैद हैं और मैं ख़ुद भी जल्द ही वहां पहुंचने वाला हूं।
5
क्यूं न तुम में से चंद इख़्तियार वाले लोग मेरे साथ चलें, और अगर उन्होंने वाक़ई कोई ग़लत काम किया है तो वहां उन पर मुक़द्दमा दायर करें।”
6
उन के साथ आठ या दस दिन गुज़ारने के बाद, फ़ेस्तुस क़ैसरिया गया। अगले दिन इस ने अदालत तलब की और हुक्म दिया के पौलुस को इस के सामने लाया जाये।
7
जब पौलुस हाज़िर हुए तो यरूशलेम से आने वाले यहूदियों ने पौलुस को घेर कर उन पर चारों जानिब से संगीन इल्ज़ामात की भरमार शुरू कर दी लेकिन कोई सबूत पेश न कर सके।
8
पौलुस ने अपनी सफ़ाई पेश करते हुए कहा: “मैंने न तो यहूदियों की शरीअत के बरख़िलाफ़ कोई क़ुसूर किया है न बैतुलमुक़द्दस का और क़ैसर के ख़िलाफ़।”
9
मगर फ़ेस्तुस ख़ुद को यहूदियों का मोहसिन साबित करना चाहता था, इसलिये उस ने पौलुस से कहा, “क्या तुझे यरूशलेम जाना मन्ज़ूर है ताके में इस मुक़द्दमा का फ़ैसला वहां करूं?”
10
पौलुस ने जवाब दिया: “मैं यहां क़ैसर की अदालत में खड़ा हूं, मेरे मुक़द्दमा का फ़ैसला इसी जगह होना चाहिये। आप ख़ुद भी अच्छी तरह जानते हैं के मैंने यहूदियों के ख़िलाफ़ कोई जुर्म नहीं किया।
11
ताहम, अगर, मैं क़ुसूरवार हूं, और मौत की सज़ा के लाइक़ हूं तो मुझे मरने से इन्कार नहीं। लेकिन जो इल्ज़ामात यहूदी मुझ पर लगा रहे हैं, अगर वह सच नहीं हैं तो फिर किसी को हक़ नहीं के मुझे उन के हवाले करे। मैं क़ैसर के हां अपील करता हूं!”
12
फ़ेस्तुस ने अपने सलाहकारों से मशवरा कर के, उस ने एलान किया: “तूने क़ैसर के हां अपील की है। क़ैसर के पास ही जायेगा!”
13
कुछ दिनों बाद अग्रिप्पा बादशाह और बिरनीके, क़ैसरिया आये ताके फ़ेस्तुस से मुलाक़ात कर सकें।
14
चूंके वह काफ़ी दिनों तक वहीं रहे इसलिये फ़ेस्तुस ने पौलुस के मुक़द्दमा का हाल बादशाह से बयान किया: “यहां एक आदमी है जिसे फ़ेलिक्स क़ैद में छोड़ गया है।
15
जब मैं यरूशलेम में था तो अहम-काहिनों और यहूदियों के बुज़ुर्ग मेरे पास ये फ़र्याद ले कर आये के इस के ख़िलाफ़ सज़ा का हुक्म सादर किया जाये।
16
“मैंने उन्हें बताया के रोमी दस्तूर के मुताबिक़ कोई शख़्स सज़ा पाने के लिये हवाले नहीं किया जा सकता जब तक के उसे अपने मुद्दईयों के रूबरू उन के इल्ज़ाम के बारे में अपनी सफ़ाई पेश करने का मौक़ा न दिया जाये।
17
चुनांचे जब वह लोग यहां आये तो मैंने फ़ौरन अगले ही दिन उसे अपनी अदालत में हाज़िर होने का हुक्म दिया।
18
जब उस के मुद्दई अपना दावा पेश करने के लिये उठे तो उन्होंने इस पर किसी ऐसे जुर्म का इल्ज़ाम न लगाया जिस का मुझे गुमान था।
19
बल्के उन का झगड़ा उन के अपने मज़हब और किसी आदमी हुज़ूर ईसा अलमसीह के बारे में था जो मर चुका है मगर पौलुस उसे ज़िन्दा बताता है।
20
मैं बड़ी उलझन में हूं के ऐसी बातों की तहक़ीक़ात कैसे करूं; इसलिये मैंने पौलुस से पूछा के क्या उसे यरूशलेम जाना मन्ज़ूर है ताके इन बातों का फ़ैसला वहां हो?
21
लेकिन पौलुस ने अपील कर दी के उन के मुक़द्दमा का फ़ैसला क़ैसर की अदालत में हो, लिहाज़ा मैंने हुक्म दिया के वह क़ैसर के पास भेजे जाने तक हवालात में रहे।”
22
तब अग्रिप्पा फ़ेस्तुस से कहा, “मैं भी इस शख़्स की बातें उस की ज़बानी सुनना चाहता हूं।” फ़ेस्तुस ने जवाब दिया, “आप उसे कल सुन सकेंगे।”
23
अगले दिन अग्रिप्पा और बिरनीके बड़ी शान-ओ-शौकत के साथ आये और पलटन के आला अफ़सरान और शहर के मुअज़्ज़ज़ लोगों के साथ दीवानख़ाने में दाख़िल हुए। फ़ेस्तुस ने हुक्म दिया, पौलुस को वहां हाज़िर किया जाये।
24
फिर फ़ेस्तुस ने कहा: “अग्रिप्पा बादशाह, और जमा हाज़िरीन, तुम इस शख़्स को देखते हो! जिस के बरख़िलाफ़ सारी यहूदी क़ौम ने मुझ से यरूशलेम में और यहां क़ैसरिया में, चिल्ला-चिल्ला कर दरख़्वास्त की है के इसे ज़िन्दा न छोड़ा जाये।
25
लेकिन मुझे मालूम हुआ है के पौलुस ने ऐसी कोई ख़ता नहीं की के उसे सज़ा-ए-मौत दी जाये, चूंके अब इस ने क़ैसर के हां अपील की है तो मैंने मुनासिब समझा के उसे रोम भेज दूं।
26
लेकिन आक़ा-ए-आला क़ैसर को लिखने के लिये मेरे पास कोई ख़ास बात नहीं है। लिहाज़ा मैंने उसे यहां तुम्हारे, और ख़ासतौर पर अग्रिप्पा बादशाह के सामने हाज़िर किया है, ताके तहक़ीक़ात के बाद कोई ऐसी बात मालूम हो जिसे मैं क़ैसर को लिख कर भेज सिक्को।
27
क्यूंके किसी क़ैदी को भेजते वक़्त इस पर लगाये गये इल्ज़ामात को ज़ाहिर न करना मेरे नज़दीक दानिशमन्दी नहीं है।”
← Chapter 24
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 26 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28