bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
/
Romans 8
Romans 8
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
← Chapter 7
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 9 →
1
चुनांचे, जो अलमसीह ईसा में हैं अब उन पर सज़ा का हुक्म नहीं
2
क्यूंके अलमसीह ईसा के वसीले से पाक रूह की ज़िन्दगी बख़्शने वाली शरीअत ने मुझे गुनाह और मौत की शरीअत से आज़ाद कर दिया।
3
इसलिये जो काम गुनाह आलूदा जिस्म के सबब से शरीअत कमज़ोर होकर न कर सकी वह ख़ुदा ने अपने-अपने ही बेटे को गुनाह की क़ुर्बानी के तौर पर गुनाह आलूदा जिस्म की सूरत में भेज कर जिस्म में गुनाह की सज़ा का हुक्म दिया।
4
ताके हम में जो जिस्म के मुताबिक़ नहीं बल्के पाक रूह के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारते हैं शरीअत के नेक तक़ाज़े पूरे हूं।
5
जो लोग जिस्म के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारते हैं उन के ख़्यालात नफ़्सानी ख़ाहिशात की तरफ़ लगे रहते हैं। लेकिन जो लोग पाक रूह के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारते हैं उन के ख़यालात रूहानी ख़ाहिशों की तरफ़ लगे रहते हैं।
6
जिस्मानी ग़रज़ मौत है लेकिन रूहानी ग़रज़ ज़िन्दगी और इत्मीनान है।
7
इसलिये के जिस्मानी ग़रज़ ख़ुदा की अदावत करती है; वह न तो ख़ुदा की शरीअत के ताबे है न हो सकती है।
8
जो लोग जिस्म के ग़ुलाम हैं, ख़ुदा को ख़ुश नहीं कर सकते।
9
लेकिन तुम अपने जिस्म के नहीं बल्के रूह के ताबे हो बशर्ते के ख़ुदा का रूह तुम में बसा हुआ हो। और जिस में अलमसीह का रूह नहीं वह अलमसीह का नहीं।
10
लेकिन अगर अलमसीह तुम में है तो तुम्हारा बदन तो गुनाह के सबब से मुर्दा है लेकिन तुम्हारी रूह रास्तबाज़ी के सबब से ज़िन्दा है।
11
और अगर उस का रूह तुम में बसा हुआ है जिस ने हुज़ूर ईसा को मुर्दों में से ज़िन्दा किया तो अलमसीह को मुर्दों में से ज़िन्दा करने वाला तुम्हारे फ़ानी बदनों को भी अपने उस रूह के वसीले से ज़िन्दा करेगा जो तुम में बसा हुआ है।
12
चुनांचे ऐ भाईयो और बहनों! हम गुनाह आलूदा फ़ितरत के कर्ज़दार नहीं के उस फ़ितरत के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारें।
13
क्यूंके अगर तुम गुनाह आलूदा फ़ितरत के मुताबिक़ ज़िन्दगी गुज़ारोगे तो ज़रूर मरोगे लेकिन अगर पाक रूह के ज़रीये बदन के बुरे कामों को नाबूद करोगे तो ज़िन्दा रहोगे।
14
इसलिये के जो ख़ुदा के रूह की हिदायत पर चलते हैं वोही ख़ुदा के बेटे हैं।
15
क्यूंके तुम्हें वह रूह नहीं मिली जो तुम्हें फिर से ख़ौफ़ का ग़ुलाम बना दे बल्के फ़र्ज़न्दियत की रूह मिली है जिस के वसीले से हम “ अब्बा, ऐ बाप कह कर पुकारते हैं।”
16
पाक रूह ख़ुद हमारी रूह के साथ मिल कर गवाही देता है के हम ख़ुदा के फ़र्ज़न्द हैं।
17
और अगर फ़र्ज़न्द हैं तो वारिस भी हैं यानी ख़ुदा के वारिस और अलमसीह के हम मीरास, बशर्ते के हम उन के साथ दुख उठायें ताके उन के जलाल में भी शरीक हों।
18
में जानता हूं के ये दुख दर्द जो हम अब सहा रहे हैं उस जलाल के मुक़ाबले में कुछ भी नहीं जो हम पर ज़ाहिर होने को है।
19
चुनांचे सारी ख़िल्क़त बड़ी आरज़ू के साथ इस इन्तिज़ार में है के ख़ुदा अपने फ़र्ज़न्दों को ज़ाहिर करे।
20
इसलिये के ख़िल्क़त अपनी ख़ुशी से नहीं बल्के ख़ालिक़ की मर्ज़ी से बतालत के इख़्तियार में कर दी गई थी, इस उम्मीद के साथ
21
के वह भी आख़िरकार फ़ना की ग़ुलामी से छुड़ाई जायेगी और ख़ुदा के फ़र्ज़न्दों की जलाली आज़ादी में शरीक होगी।
22
हम जानते हैं के सारी ख़िल्क़त आज तक कराहती है गोया के वह दर्देज़ेह में मुब्तिला है।
23
और सिर्फ़ वोही नहीं बल्के हम भी जिन्हें पाक रूह के पहले फल हासिल हुए हैं अपने बातिन में कराहते हैं यानी उस वक़्त का इन्तिज़ार कर रहे हैं जब ख़ुदा हमें अपने फ़र्ज़न्द बना कर हमारे बदन को मुख़्लिसी बख़्शेगा।
24
चुनांचे इसी उम्मीद के वसीले से हमें नजात मिली। मगर जब उम्मीद की हुई चीज़ नज़र आ जाये तो उम्मीद का कोई मतलब नहीं। क्यूंके पहले से मौजूद किसी चीज़ की कोई उम्मीद क्यूं करेगा?
25
लेकिन अगर हम उस चीज़ की उम्मीद करते हैं जो अभी हमारे पास मौजूद नहीं तो सब्र से उस की राह देखते हैं।
26
इसी तरह रूह हमारी कमज़ोरी में हमारी मदद करता है। हम तो ये भी नहीं जानते के किस चीज़ के लिये दुआ करें लेकिन पाक रूह ख़ुद ऐसी आहें भर-भर कर हमारी शफ़ाअत करता है के लफ़्ज़ों में उन का बयान नहीं हो सकता।
27
और वह जो हमारे दिलों को परखता है पाक रूह की ग़रज़ को जानता है क्यूंके पाक रूह ख़ुदा की मर्ज़ी के मुताबिक़ मुक़द्दसीन की शफ़ाअत करता है।
28
और हम जानते हैं के जो लोग ख़ुदा से महब्बत रखते हैं और उस के इरादे के मुताबिक़ बुलाए गये हैं, ख़ुदा हर हालत में उन की भलाई चाहता है।
29
क्यूंके जिन्हें ख़ुदा पहले से जानता था उन्हें उस ने पहले से मुक़र्रर भी किया के वह उस के बेटे की मानिन्द बनें ताके उस का बेटा बहुत सारे मेरे भाईयों और बहनों में पहलोठा शुमार किया जाये।
30
और जिन्हें उस ने पहले से मुक़र्रर किया, उन्हें बुलाया भी; और जिन्हें बुलाया, उन्हें रास्तबाज़ भी ठहराया; और जिन्हें रास्तबाज़ ठहराया, उन्हें अपने जलाल में शरीक भी किया।
31
पस हम इन बातों के बारे में और क्या कहें? अगर ख़ुदा हमारी तरफ़ है तो कौन हमारा मुख़ालिफ़ हो सकता है?
32
जिस ने अपने बेटे को बचाए रखने की बजाय उसे हम सब के लिये क़ुर्बान कर दिया तो किया वह उस के साथ हमें और सब चीज़ें भी फ़ज़ल से अता न करेगा?
33
कौन ख़ुदा के चुने हुए लोगों पर इल्ज़ाम लगा सकता है? कोई नहीं। इसलिये के ख़ुदा ख़ुद उन्हें रास्तबाज़ ठहराता है।
34
कौन उन्हें मुजरिम क़रार दे सकता है? कोई नहीं। इसलिये के अलमसीह ईसा ही वह हैं जो मर गये और मुर्दों में से जी उठे और जो ख़ुदा की दाहिनी तरफ़ मौजूद हैं। वोही हमारी शफ़ाअत भी करते हैं।
35
कौन हमें अलमसीह की महब्बत से जुदा करेगा? क्या मुसीबत या तंगी? ज़ुल्म या क़हत, उर्यानी या ख़तरा या तलवार?
36
चुनांचे किताब-ए-मुक़द्दस में लिख्खा है: “हम तो तेरी ख़ातिर सारा दिन मौत का सामना करते रहते हैं; हम तो ज़ब्ह होने वाली भेड़ों की मानिन्द समझे जाते हैं।”
37
फिर भी इन सब हालतों में हमें अपने महब्बत करने वाले के वसीले से बड़ी शानदार फ़त्ह हासिल होती है।
38
क्यूंके मुझे यक़ीन है के न मौत न ज़िन्दगी, न फ़रिश्ते न शैतान के लश्कर, न हाल की चीज़ें न मुस्तक़बिल की और न कोई क़ुदरतें,
39
न बुलन्दी न पस्ती न कोई और काइनात की चीज़ें हमें ख़ुदा की उस महब्बत से जुदा न कर सकेगी जो हमारे अलमसीह ईसा में है।
← Chapter 7
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 9 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16