bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Awadhi
/
Awadhi
/
Job 27
Job 27
Awadhi
← Chapter 26
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 28 →
1
फुन अय्यूब कहइ क जारी राखेस। उ कहेस,
2
“फुरइ परमेस्सर जिअत ह अउर इ जेतँना सच अहइ कि परमेस्सर जिअत ह फुरइ उ वइसेन ही मोरे बोर अनिआउ स भरा रहा अहइ। हाँ! सर्वसक्तीसाली परमेस्सर मोरे जीवन मँ कड़वाहट भरेस ह।
3
मुला जब तलक मोहमाँ प्राण अहइ अउर परमेस्सर क साँस मोहे मँ अहइ।
4
तब तलक मोरे होंठ झूठी बातन नाहीं बोलिहीं, अउर मोर जिभिया कबहुँ झूठ नाहीं बोली।
5
मइँ कबहुँ न मानब कि तू लोग सही अहा। जब तलक मइँ मरब उ दिन तलक कहत रहब कि मइँ निर्दोख हउँ।
6
मइँ आपन धार्मिक भाव क मजबूती क थामे रहब। मइँ कबहुँ उचित करम करब मोर चेतना मोका तंग नाहीं करी जब तलक मइँ जिअत हउँ।
7
मोरे दुस्मनन क दुस्ट जइसा बनइ दया, अउर ओनका सजा पावइ द्या जइसे दुस्ट लोग दण्डित होत हीं।
8
अइसे उ मनई बरे मरत वक्त कउनो आसा नाहीं अहइ जउन परमेस्सर क परवाह नाहीं करत ह। जब परमेस्सर ओकर प्राण लेइ तब भी ओकरे बरे कउनो आसा नाहीं अहइ।
9
जब उ बुरा मनई बुरा दुःखी पड़ी अउर ओका पुकारी, परमेस्सर नाहीं सुनी।
10
ओका चाही कि उ उ आनन्द क चाहइ जेका सिरिफ सर्वसाक्तीमान परमेस्सर देत ह। ओका चाही कि उ हर समइ परमेस्सर स पराथना करत रहा।
11
“मइँ तोहका परमेस्सर क सक्ती सिखाउब। मइँ सर्वसक्तीसाली परमेस्सर क योजनन क नाहीं छिपाउब।
12
खुद तू आपन अँखिन स परमेस्सर क सक्ती लख्या ह, तउ काहे तू बेकार क बातन बोलत ह?
13
“दुस्ट लोगन बरे अइसी जोजना बनाया ह। दुस्ट लोगन क सर्वसक्तीसाली परमेस्सर स अइसा ही मिली।
14
दुस्ट क चाहे केतँनी ही सन्तानन होइँ, मुला ओकर संतानन जुद्ध मँ मारी जइहीं। दुस्टन क सन्तानन कबहुँ भरपेट खाना नाहीं पइहीं।
15
अउर अगर दुस्टन क सन्तानन ओकरी मउत क पाछे भी जिअत रहइँ तउ महामारी ओनका मारि डाई। ओकर राँड़ ओनके बरे दुःखी नाहीं होइहीं।
16
दुस्ट जन चाहे चाँदी क ढेर बटोरइँ, एतना बड़का ढेर जेतँना माटी क ढूहा होत ह, माटी क ढूहन जइसे ओढ़ना होइँ ओकरे लगे।
17
जउने ओढ़नन क दुस्ट मनई जुटावत रहा ओन ओढ़नन क सज्जन पहिरी, दुस्ट क चाँदी निर्दोखन मँ बँटी।
18
दुस्ट क बनावा घर जियादा दिनन नाहीं टिकत ह, उ मकड़ी जाल जइसा या कउनो चौकीदार क झोपड़ी जइसा कमजोर होत ह।
19
दुस्ट लोग आपन खुद क दौलत क संग आपन बिछउना पइ सोवइ जात ह, मुला एक अइसा दिन आइ जब उ फुन बिस्तरे मँ वइसे ही नाहीं जाइ पाई। जब उ आँखी खोली तउ ओकर सम्पत्ति जाइ चुकी होइ।
20
दुःख ओका बाढ़ क जइसा ढाँक लेइहीं, रातउ रात तूफान ओका उड़ाइ लइ जाइ।
21
पुर वइया हवा ओका दूर उड़ाइ देइ, तुफान ओका ओकरे घरे क बाहेर खींचली।
22
तूफान ओह पइ बगैर दाया किए भए पइ आइ अउर उ ओमँ स दुर भागइ क जतन करी। मुला लपेटके मारि।
23
जब दुस्ट मनई पराई, लोग ओह पइ तालियन बजाइहीं, दुस्ट जन जब निकरिके पराइ, अपने घरे स तउ लोग ओह पइ सीटियन बजइहीं।”
← Chapter 26
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 28 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28
29
30
31
32
33
34
35
36
37
38
39
40
41
42