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Acts 22
Hindi 2017 (नया नियम)
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1
“हे भाइयों और पितरो, मेरा प्रत्युत्तर सुनो, जो मैं अब तुम्हारे सामने कहता हूँ।”
2
वे यह सुनकर कि वह हमसे इब्रानी भाषा में बोलता है, और भी चुप रहे। तब उसने कहा:
3
“मैं तो यहूदी शिक्षा पाएहूँ, जो किलिकिया के तरसुस में जन्मा; परन्तु इस नगर में गमलीएल के पाँवों के पास बैठकर शिक्षा प्राप्त की, और बापदादों की व्यवस्था भी ठीक रीति पर सिखाया गया; और परमेश्वर के लिये ऐसी धुन लगाए था, जैसे तुम सब आज लगाए हो।
4
मैंने पुरूष और स्त्री दोनों को बाँध-कर, और बन्दीगृह में-डालकर, इस पंथ को यहाँ तक सताया, कि उन्हें मरवा भी डाला।
5
स्वयं महायाजक और सब पुरनिये गवाह हैं; कि उनमें से मैं भाइयों के नाम पर चिट्ठियाँ लेकर दमिश्क को चला जा रहा था, कि जो वहाँ हों उन्हें दण्ड दिलाने के लिये बाँधकर यरूशलेम में लाऊँ।
6
“जब मैं चलते-चलते दमिश्क के निकट पहुँचा, तो ऐसा हुआ कि दो पहर के लगभग अचानक एक बड़ी ज्योति आकाश से मेरे चारों ओर चमकी।
7
और मैं भूमि पर गिर पड़ा: और यह वाणी सुना, ‘हे शाऊल, हे शाऊल, तू मुझे क्यों सताता है?’
8
मैंने उत्तर दिया, ‘हे प्रभु, तू कौन है?’ उसने मुझ से कहा, ‘मैं यीशु नासरी हूँ, जिसे तू सताता है।’
9
और मेरे साथियों ने ज्योति तो देखी, परन्तु जो मुझ से बोलता था उसकी वाणी न सुनी।
10
तब मैने कहा, ‘हे प्रभु मैं क्या करूँ?’ प्रभु ने मुझ से कहा, ‘उठकर दमिश्क में जा, और जो कुछ तेरे करने के लिये ठहराया गया है वहाँ तुझ से सब बता दिया जाएगा।’
11
जब उस ज्योति के तेज के कारण मुझे कुछ दिखाई न दिया, तो मैं अपने साथियों के हाथ पकड़े हुए दमिश्क में आया।
12
“तब हनन्याह नाम का व्यवस्था के अनुसार एक भक्त मनुष्य, जो वहाँ के रहनेवाले सब यहूदियों में सुनाम था, मेरे पास आया,
13
और खड़ा होकर मुझ से कहा, ‘हे भाई शाऊल, फिर देखने लग।’ उसी घड़ी मेरी आँखे खुल गई और मैंने उसे देखा।
14
तब उसने कहा, ‘हमारे बापदादों के परमेश्वर ने तुझे इसलिये ठहराया है कि तू उसकी इच्छा को जाने, और उस धर्मी को देखे, और उसके मुँह से बातें सुने।
15
क्योंकि तू उसकी ओर से सब मनुष्यों के सामने उन बातों का गवाह होगा, जो तू ने देखी और सुनी हैं।
16
अब क्यों देर करता है? उठ, बपतिस्मा ले, और उसका नाम लेकर अपने पापों को धो डाल।’
17
“जब मैं फिर यरूशलेम में आकर मन्दिर में प्रार्थना कर रहा था, तो बेसुध हो गया।
18
और उसको देखा कि मुझ से कहता है, ‘जल्दी करके यरूशलेम से झट निकल जा; क्योंकि वे मेरे विषय में तेरी गवाही न मानेंगे।’
19
मैंने कहा, ‘हे प्रभु वे तो आप जानते हैं, कि मैं तुझ पर विश्वास करनेवालों को बन्दीगृह में डालता और जगह-जगह आराधनालय में पिटवाता था।
20
और जब तेरे गवाह स्तिफनुस का लहू बहाया जा रहा था तब भी मैंवहाँ खड़ा था, और इस बात में सहमत था, और उसके घातकों के कपड़ों की रखवाली करता था।’
21
और उसने मुझ से कहा, ‘चला जा: क्योंकि मैं तुझे अन्यजातियों के पास दूर-दूर भेजूँगा’।”
22
वे इस बात तक उसकी सुनते रहे; तब ऊँचे शब्द से चिल्लाए, “ऐसे मनुष्य का अन्त करो; उसका जीवित रहना उचित नहीं!”
23
जब वे चिल्लाते और कपड़े फेंकते और आकाश में धूल उड़ाते थे;
24
तो पलटन के सूबेदार ने कहा, “इसे गढ़ में ले जाओ; और कोड़े मारकर जाँचो, कि मैं जानूँ कि लोग किस कारण उसके विरोध में ऐसा चिल्ला रहे हैं।”
25
जब उन्होंने उसे तसमों से बाँधा तो पौलुस ने उस सूबेदार से जो उसके पास खड़ा था कहा, “क्या यह उचित है, कि तुम एक रोमी मनुष्य को, और वह भी बिना दोषी ठहराए हुए कोड़े मारो?”
26
सूबेदार ने यह सुनकर पलटन के सरदार के पास जाकर कहा, “तू यह क्या करता है? यह तो रोमी मनुष्य है।”
27
तब पलटन के सरदार ने उसके पास आकर कहा, “मुझे बता, क्या तू रोमी है?” उसने कहा, “हाँ।”
28
यह सुनकर पलटन के सरदार ने कहा, “मैंने रोमी होने का पद बहुत रूपये देकर पाया है।” पौलुस ने कहा, “मैं तो जन्म से रोमी हूँ।”
29
तब जो लोग उसे जाँचने पर थे, वे तुरन्त उसके पास से हट गए; और पलटन का सरदार भी यह जानकर कि यह रोमी है, और मैंने उसे बाँधा है, डर गया।
30
दूसरे दिन वह ठीक-ठीक जानने की इच्छा से कि यहूदी उस पर क्यों दोष लगाते हैं, इसलिए उसके बन्धन खोल दिए; और महायाजकों और सारी महासभा को इकट्ठे होने की आज्ञा दी, और पौलुस को नीचे ले जाकर उनके सामने खड़ा कर दिया।
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