bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
/
1 John 4
1 John 4
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
← Chapter 3
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 5 →
1
प्रियो! प्रत्येक आत्मा पर विश्वास मत करो। आत्माओं की परीक्षा कर देखो कि वे परमेश्वर की ओर से हैं या नहीं; क्योंकि बहुत-से झूठे नबी संसार में आये हैं।
2
परमेश्वर के आत्मा को तुम इस प्रकार जान सकते हो: प्रत्येक आत्मा, जो यह स्वीकार करती है कि येशु मसीह देहधारण कर आये, वह परमेश्वर की ओर से है
3
और प्रत्येक आत्मा, जो इस प्रकार येशु को स्वीकार नहीं करती, वह परमेश्वर की ओर से नहीं है और वह मसीह-विरोधी की आत्मा है। तुमने सुना है कि वह संसार में आने वाला है और अब तो वह संसार में आ चुका है।
4
बच्चो! तुम परमेश्वर के हो और तुम ने उन लोगों पर विजय पायी है; क्योंकि जो तुम में है, वह उस से महान् है, जो संसार में है।
5
वे संसार के हैं और इसलिए वे संसार की बातें करते हैं और संसार उनकी सुनता है।
6
किन्तु हम परमेश्वर के हैं और जो परमेश्वर को जानता है, वह हमारी सुनता है। जो परमेश्वर का नहीं है, वह हमारी बात सुनना नहीं चाहता। हम इस प्रकार सत्य की आत्मा और भ्रान्ति की आत्मा को जान सकते हैं।
7
प्रियो! हम एक दूसरे से प्रेम करें, क्योंकि प्रेम परमेश्वर से उत्पन्न होता है। जो प्रेम करता है, वह परमेश्वर की सन्तान है और परमेश्वर को जानता है।
8
जो प्रेम नहीं करता, वह परमेश्वर को नहीं जानता; क्योंकि परमेश्वर प्रेम है।
9
परमेश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में इसलिए भेजा कि हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।
10
प्रेम इसमें नहीं है कि हमने परमेश्वर से प्रेम किया, बल्कि परमेश्वर ने हम से प्रेम किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।
11
प्रियो! यदि परमेश्वर ने हमसे इतना प्रेम किया, तो हम को भी एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए।
12
परमेश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे से प्रेम करते हैं, तो परमेश्वर हम में निवास करता है और हम में उसका प्रेम परिपूर्णता तक पहुंच जाता है।
13
परमेश्वर ने हमें अपना आत्मा प्रदान किया है, इसलिए हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।
14
पिता ने अपने पुत्र को संसार के उद्धारकर्ता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसकी साक्षी देते हैं।
15
जो यह स्वीकार करता है कि येशु परमेश्वर के पुत्र हैं, परमेश्वर उस में निवास करता है और वह परमेश्वर में।
16
इस प्रकार हम अपने प्रति परमेश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। परमेश्वर प्रेम है और जो प्रेम में बना रहता है, वह परमेश्वर में और परमेश्वर उस में निवास करता है।
17
इस प्रकार प्रेम हम में अपनी परिपूर्णता तक पहुँच जाता है, जिससे हम न्याय के दिन पूरा भरोसा रख सकें; क्योंकि जैसे मसीह हैं वैसे हम भी इस संसार में हैं।
18
प्रेम में भय नहीं होता। पूर्ण प्रेम भय को दूर कर देता है, क्योंकि भय में दण्ड की आशंका रहती है और जो डरता है, उसका प्रेम पूर्णता तक नहीं पहुँचा है।
19
हम प्रेम करते हैं, क्योंकि परमेश्वर ने पहले हमसे प्रेम किया।
20
यदि कोई यह कहे कि मैं परमेश्वर से प्रेम करता हूँ और वह अपने भाई अथवा बहिन से बैर करे, तो वह झूठा है। यदि वह अपने भाई अथवा बहिन से, जिसे वह देखता है, प्रेम नहीं करता, तो वह परमेश्वर से जिसे उसने कभी नहीं देखा, प्रेम नहीं कर सकता।
21
इसलिए हमें मसीह से यह आदेश मिला है कि जो परमेश्वर से प्रेम करता है, उसे अपने भाई-बहिनों से भी प्रेम करना चाहिए।
← Chapter 3
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 5 →
All chapters:
1
2
3
4
5