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Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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Romans 14
Romans 14
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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1
यदि कोई विश्वास में दुर्बल है, तो आप उसकी पापशंकाओं पर विवाद किये बिना उसका स्वागत करें।
2
कोई व्यक्ति मानता है कि उसे हर प्रकार का भोजन करने की अनुमति है, जब कि जिसका विश्वास दुर्बल है, वह साग-सब्जी ही खाता है।
3
खाने वाले व्यक्ति शाकाहारी को तुच्छ न समझे और शाकाहारी खाने वाले व्यक्ति को दोषी नहीं माने,क्योंकि परमेश्वर ने उसे अपनाया है।
4
दूसरे के सेवक पर दोष लगाने वाले तुम कौन हो? उसका दृढ़ बना रहना या पतित हो जाना उसके अपने स्वामी से सम्बन्ध रखता है और वह अवश्य दृढ़ बना रहेगा; क्योंकि उसका प्रभु उसे दृढ़ बनाये रखने में समर्थ है।
5
कोई एक दिन को दूसरे दिन से श्रेष्ठ मानता है, जब कि कोई सब दिनों को बराबर समझता है। हर व्यक्ति इसके सम्बन्ध में अपनी-अपनी धारणा बना ले।
6
जो किसी दिन को शुभ मानता है, वह उसे प्रभु के नाम पर शुभ मानता है और जो खाता है, वह प्रभु के नाम पर खाता है; क्योंकि वह परमेश्वर को धन्यवाद देता है। जो परहेज़ करता है, वह प्रभु के नाम पर परहेज़ करता है, और वह भी परमेश्वर को धन्यवाद देता है।
7
कारण, हम में कोई न तो अपने लिए जीता है और न अपने लिए मरता है।
8
यदि हम जीते रहते हैं, तो प्रभु के लिए जीते हैं और यदि मरते हैं, तो प्रभु के लिए मरते हैं। इस प्रकार हम चाहे जीते रहें या मर जायें, हम प्रभु के ही हैं।
9
मसीह इसलिए मर गये और जी उठे कि वह मृतकों तथा जीवितों, दोनों के प्रभु हो जायें।
10
तो तुम क्यों अपने भाई अथवा बहिन का न्याय करते हो? तुम क्यों अपने भाई अथवा बहिन को तुच्छ समझते हो? हम-सब परमेश्वर के न्यायासन के सामने खड़े होंगे,
11
क्योंकि धर्मग्रन्थ में लिखा है— “प्रभु यह कहता है: मैं स्वयं अपने जीवन की शपथ लेता हूँ; हर एक मनुष्य मेरे सम्मुख घुटना टेकेगा। प्रत्येक जीभ मुझ-परमेश्वर की स्तुति करेगी ।”
12
इस से स्पष्ट है कि हम में हर एक को अपने-अपने कर्मों का लेखा परमेश्वर को देना पड़ेगा।
13
इसलिए अब से हम एक-दूसरे पर दोष लगाना छोड़ दें; हम यह निश्चय कर लें कि अपने भाई अथवा बहिन के मार्ग में न तो रोड़ा अटकायेंगे और न जाल बिछाएँगे।
14
मैं जानता हूँ और प्रभु येशु का शिष्य होने के नाते मेरा विश्वास है कि कोई भी वस्तु अपने में अशुद्ध नहीं है; किन्तु यदि कोई यह समझता है कि अमुक वस्तु अशुद्ध है, तो वह उसके लिए अशुद्ध हो जाती है।
15
यदि तुम अपने भोजन के कारण अपने भाई अथवा बहिन को दु:ख देते हो, तो तुम प्रेम-मार्ग पर नहीं चलते। जिस मनुष्य के लिए मसीह मर गये हैं, तुम अपने भोजन के कारण उसके विनाश का कारण न बनो।
16
हमारी दृष्टि में जो भला है, वह निन्दा का विषय न बने;
17
क्योंकि परमेश्वर का राज्य खाने-पीने का नहीं, बल्कि वह धार्मिकता, शान्ति और आनन्द का विषय है, जो पवित्र आत्मा से प्राप्त होते हैं।
18
जो इन बातों द्वारा मसीह की सेवा करता है, वह परमेश्वर को प्रिय और मनुष्यों द्वारा सम्मानित है।
19
हम ऐसी बातों में लगे रहें, जिन से शान्ति को बढ़ावा मिलता है और जिनके द्वारा हम एक-दूसरे का निर्माण कर सकें।
20
भोजन के कारण परमेश्वर की कृति का विनाश मत करो। यह सच है कि सब कुछ अपने में शुद्ध है, किन्तु भोजन द्वारा दूसरे के मार्ग में रोड़े अटकाना बुरा है।
21
उत्तम तो यह है कि मांस-मदिरा का सेवन न किया जाए, और न अन्य कोई ऐसा कार्य किया जाए जिससे तुम्हारा भाई अथवा बहिन पथभ्रष्ट हो।
22
तुम परमेश्वर के सामने अपनी धारणा अपने तक सीमित रखो। धन्य है वह, जिसका अन्त:करण उसे दोषी नहीं मानता, जब वह अपनी धारणा के अनुसार आचरण करता है!
23
किन्तु जो खाने के विषय में सन्देह करता है और तब भी खाता है, वह दोषी है; क्योंकि उसका यह कार्य विश्वास के अनुसार नहीं है, और जो कार्य विश्वास के अनुसार नहीं है, वह पाप है।
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