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Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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Romans 2
Romans 2
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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1
इसलिए, हे दूसरों पर दोष लगाने वाले! तुम चाहे जो भी हो, अक्षम्य हो। तुम दूसरों पर दोष लगाने के कारण अपने को दोषी ठहराते हो; क्योंकि तुम, जो दूसरों पर दोष लगाते हो, ये ही कुकर्म स्वयं करते हो।
2
हम जानते हैं कि परमेश्वर ऐसे कुकर्म करने वालों को न्यायानुसार दण्डाज्ञा देता है।
3
हे मनुष्य! तुम ऐसे कुकर्म करने वालों पर दोष लगाते हो और स्वयं ये ही कार्य करते हो, तो क्या तुम समझते हो कि परमेश्वर की दण्डाज्ञा से बच जाओगे?
4
अथवा क्या तुम परमेश्वर की असीम दयालुता, सहनशीलता और धैर्य का तिरस्कार करते और यह नहीं समझते कि परमेश्वर की दयालुता तुम्हें पश्चात्ताप की ओर ले जाना चाहती है?
5
किन्तु तुम अपने इस हठ और अपने हृदय के अपश्चात्ताप के कारण कोप के दिन के लिए अपने विरुद्ध कोप का संचय कर रहे हो, जब परमेश्वर का निष्पक्ष न्याय प्रकट होगा।
6
वह प्रत्येक मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देगा।
7
जो लोग धैर्यपूर्वक भलाई करते हुए महिमा, सम्मान और अमरत्व की खोज में लगे रहते हैं, परमेश्वर उन्हें शाश्वत जीवन प्रदान करेगा;
8
और जो लोग स्वार्थी हैं और सत्य से विद्रोह करते हुए अधर्म पर चलते हैं, ये परमेश्वर के क्रोध और प्रकोप के पात्र होंगे।
9
बुराई करने वाले प्रत्येक मनुष्य को—पहले यहूदी और फिर यूनानी को—कष्ट और संकट सहना पड़ेगा
10
और भलाई करने वाले प्रत्येक मनुष्य को—पहले यहूदी और फिर यूनानी को—महिमा, सम्मान और शान्ति मिलेगी;
11
क्योंकि परमेश्वर किसी के साथ पक्षपात नहीं करता।
12
जो मूसा की व्यवस्था के अधीन नहीं थे, यदि उन्होंने पाप किया होगा, तो वे बिना व्यवस्था के नष्ट हो जायेंगे; और जिन्होंने व्यवस्था के अधीन रह कर पाप किया होगा, उनका व्यवस्था के अनुसार न्याय किया जायेगा।
13
क्योंकि व्यवस्था के सुनने वाले लोग परमेश्वर की दृष्टि में धार्मिक नहीं हैं, वरन् व्यवस्था का पालन करने वाले धार्मिक ठहराए जायेंगे।
14
जब गैर-यहूदी, जिन्हें मूसा की व्यवस्था नहीं मिली, अपने आप उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, तो वे व्यवस्था-विहीन होते हुए भी स्वयं अपने लिए व्यवस्था हैं;
15
क्योंकि वे अपने आचरण से इसका प्रमाण देते हैं कि व्यवस्था की आज्ञाएँ उनके हृदय पर अंकित हैं। उनका अन्त:करण भी इसके सम्बन्ध में साक्षी देता है। उनके विचार उन्हें कभी दोषी, तो कभी निर्दोष ठहराते हैं।
16
यह सब उस दिन प्रकट किया जायेगा, जब परमेश्वर, मेरे शुभ समाचार के अनुसार, येशु मसीह द्वारा मनुष्यों के गुप्त विचारों का न्याय करेगा।
17
और तुम, जो यहूदी कहलाते हो! तुम व्यवस्था पर निर्भर रहते हुए परमेश्वर पर गर्व करते हो,
18
उसकी इच्छा जानते हो और व्यवस्था द्वारा शििक्षत होने के कारण भले-बुरे को पहचान सकते हो।
19
तुम्हें व्यवस्था द्वारा ज्ञान और सत्य का आदर्श स्वरूप प्राप्त हो गया है, इसलिए तुम अपने को अन्धों का पथप्रदर्शक, अन्धकार में रहने वालों का प्रकाश, अज्ञानियों का शिक्षक और भोले-भाले लोगों का गुरु समझते हो।
21
पर तुम, जो दूसरों को शिक्षा देते हो, अपने को शिक्षा नहीं देते! तुम प्रचार करते हो, “चोरी मत करो”, और स्वयं चोरी करते हो!
22
तुम कहते हो, “व्यभिचार मत करो”, और स्वयं व्यभिचार करते हो! तुम मूर्तियों से घृणा करते हो और मन्दिरों को लूटते हो!
23
तुम व्यवस्था पर गर्व करते हो और व्यवस्था के उल्लंघन द्वारा परमेश्वर का अनादर करते हो!
24
क्योंकि जैसा कि धर्मग्रन्थ में लिखा है, “तुम लोगों के कारण गैर-यहूदियों में परमेश्वर के नाम की निन्दा हो रही है।”
25
खतना कराने से अवश्य लाभ होता है, यदि तुम व्यवस्था का पालन करते हो; किन्तु यदि तुम व्यवस्था का उल्लंघन करते हो, तो तुम्हारा खतना निरर्थक है।
26
इसी प्रकार, यदि कोई बेखतना व्यक्ति व्यवस्था के आदेशों का पालन करता है, तो क्या उसका बेखतनापन खतना नहीं माना जायेगा?
27
जो शरीर का खतना कराये बिना व्यवस्था का पूर्ण पालन करता है, वह तुम्हारा न्याय करेगा; क्योंकि तुम लिखित व्यवस्था और खतने से सम्पन्न होते हुए भी व्यवस्था का उल्लंघन करते हो।
28
क्योंकि यहूदी वह नहीं, जो बाह्य रूप से यहूदी है; और खतना वह नहीं, जो बाह्य और शारीरिक है।
29
किन्तु यहूदी वह है, जो अपने अभ्यन्तर में यहूदी है और खतना वह है, जो हृदय का है और लिखित व्यवस्था के अनुसार नहीं, बल्कि आत्मा के अनुसार है। ऐसे व्यक्ति को मनुष्यों की नहीं, बल्कि परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त है।
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