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John 11
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
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1
मरियम और उसकी बहन मार्था के गाँव बैतनिय्याह का लाज़र नामक एक व्यक्ति बीमार था।
2
यह वही मरियम थी जिसने प्रभु पर इत्र डालकर उसके पैरों को अपने बालों से पोंछा था, इसी का भाई लाज़र बीमार था।
3
इसलिए इन बहनों ने उसके पास यह कहला भेजा, “प्रभु! देख, जिससे तू प्रीति रखता है, वह बीमार है।”
4
यह सुनकर यीशु ने कहा, “यह बीमारी मृत्यु की नहीं, बल्कि परमेश्वर की महिमा के लिए है, ताकि इसके द्वारा परमेश्वर के पुत्र की महिमा हो।”
5
यीशु, मार्था और उसकी बहन और लाज़र से प्रेम रखता था।
6
फिर जब उसने सुना कि वह बीमार है, तो जिस स्थान पर वह था, वहाँ दो दिन और रहा।
7
तब इसके बाद उसने अपने शिष्यों से कहा, “आओ, हम फिर यहूदिया को चलें।”
8
शिष्यों ने उससे कहा, “रब्बी, अभी तो यहूदी तुझ पर पथराव करना चाह रहे थे, और क्या तू फिर वहीं जा रहा है?”
9
यीशु ने उत्तर दिया, “क्या दिन के बारह घंटे नहीं होते? यदि कोई दिन में चलता है तो ठोकर नहीं खाता, क्योंकि वह इस जगत की ज्योति को देखता है।
10
परंतु यदि कोई रात में चलता है तो ठोकर खाता है, क्योंकि उसमें ज्योति नहीं है।”
11
उसने ये बातें कहीं और इसके बाद उनसे कहा, “हमारा मित्र लाज़र सो गया है, और मैं उसे जगाने के लिए जा रहा हूँ।”
12
तब शिष्यों ने उससे कहा, “प्रभु, यदि वह सो गया है तो बच जाएगा।”
13
यीशु ने उसकी मृत्यु के विषय में कहा था। परंतु उन्होंने समझा कि वह विश्राम की नींद के विषय में कह रहा है।
14
तब यीशु ने उनसे स्पष्ट कहा, “लाज़र मर गया,
15
और मैं तुम्हारे कारण आनंदित हूँ कि मैं वहाँ नहीं था, जिससे कि तुम विश्वास करो। आओ हम उसके पास चलें।”
16
इस पर थोमा ने, जो दिदुमुस भी कहलाता है, अपने साथी शिष्यों से कहा, “आओ, हम भी उसके साथ मरने चलें।”
17
जब यीशु वहाँ पहुँचा तो उसे पता चला कि लाज़र को कब्र में रखे चार दिन हो गए हैं।
18
बैतनिय्याह, यरूशलेम से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर था।
19
बहुत से यहूदी मार्था और मरियम के पास आए थे ताकि उन्हें उनके भाई के विषय में सांत्वना दें।
20
जब मार्था ने सुना कि यीशु आ रहा है तो वह उससे मिलने गई, परंतु मरियम घर में ही बैठी रही।
21
मार्था ने यीशु से कहा, “प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई नहीं मरता।
22
परंतु अब भी मैं जानती हूँ कि जो कुछ तू परमेश्वर से माँगेगा, परमेश्वर तुझे देगा।”
23
यीशु ने उससे कहा, “तेरा भाई फिर जी उठेगा।”
24
मार्था ने उससे कहा, “मैं जानती हूँ कि अंतिम दिन में पुनरुत्थान के समय वह फिर जी उठेगा।”
25
यीशु ने उससे कहा, “पुनरुत्थान और जीवन मैं ही हूँ। जो मुझ पर विश्वास करता है, चाहे वह मर भी जाए फिर भी जीएगा,
26
और जो जीवित है और मुझ पर विश्वास करता है, वह अनंत काल तक कभी नहीं मरेगा। क्या तू यह विश्वास करती है?”
27
उसने उससे कहा, “हाँ प्रभु, मैं तो विश्वास कर चुकी हूँ कि तू परमेश्वर का पुत्र मसीह है जो जगत में आनेवाला था।”
28
यह कहकर वह चली गई और अपनी बहन मरियम को यह कहकर चुपके से बुलाया, “गुरु यहीं है और तुझे बुला रहा है।”
29
जब उसने यह सुना तो वह शीघ्र उठी और उसके पास जाने लगी।
30
यीशु अभी गाँव में नहीं पहुँचा था, बल्कि वह अब तक उसी स्थान पर था जहाँ मार्था उससे मिली थी।
31
तब जो यहूदी मरियम के साथ घर में थे और उसे सांत्वना दे रहे थे, यह देखकर कि मरियम शीघ्र उठकर बाहर चली गई, उसके पीछे चल दिए; क्योंकि उन्होंने सोचा कि वह कब्र पर रोने के लिए जा रही है।
32
जब मरियम वहाँ पहुँची जहाँ यीशु था तो उसे देखकर उसके पैरों पर गिर पड़ी और उससे कहने लगी, “प्रभु, यदि तू यहाँ होता तो मेरा भाई नहीं मरता।”
33
यीशु ने जब उसको और उसके साथ आए हुए यहूदियों को रोते हुए देखा, तो वह आत्मा में अत्यंत व्यथित और व्याकुल हो गया,
34
और कहा, “तुमने उसे कहाँ रखा है?” उन्होंने उससे कहा, “प्रभु, आ और देख ले।”
35
यीशु रो पड़ा।
36
तब यहूदी कहने लगे, “देखो! वह उससे कितनी प्रीति रखता था।”
37
परंतु उनमें से कुछ लोगों ने कहा, “जिसने अंधे व्यक्ति की आँखें खोलीं, क्या वह यह नहीं कर सका कि यह मनुष्य न मरता?”
38
तब यीशु फिर से मन ही मन में अत्यंत व्यथित होकर कब्र पर आया। वह एक गुफा थी, और उस पर एक पत्थर रखा हुआ था।
39
यीशु ने कहा, “पत्थर को हटाओ।” मृतक की बहन, मार्था ने उससे कहा, “प्रभु, अब तो उसमें से दुर्गंध आती है, क्योंकि यह चौथा दिन है।”
40
यीशु ने उससे कहा, “क्या मैंने तुझसे नहीं कहा कि यदि तू विश्वास करेगी तो परमेश्वर की महिमा देखेगी?”
41
तब उन्होंने उस पत्थर को हटाया । फिर यीशु ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं और कहा, “हे पिता, मैं तेरा धन्यवाद करता हूँ कि तूने मेरी सुन ली।
42
मैं जानता था कि तू सदैव मेरी सुनता है; फिर भी चारों ओर खड़े इन लोगों के कारण मैंने यह कहा, ताकि ये विश्वास करें कि तूने मुझे भेजा है।”
43
और यह कहकर उसने ऊँची आवाज़ से पुकारा, “हे लाज़र, बाहर आ।”
44
जो मर गया था, वह कफ़न से हाथ और पैर बँधे हुए निकल आया, और उसका चेहरा अंगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, “उसे खोल दो और जाने दो।”
45
तब जो यहूदी मरियम के पास आए थे और जिन्होंने यीशु के इस कार्य को देखा था, उनमें से बहुतों ने उस पर विश्वास किया।
46
परंतु उनमें से कुछ ने फरीसियों के पास जाकर उन्हें जो कुछ यीशु ने किया था, बता दिया।
47
तब मुख्य याजकों और फरीसियों ने महासभा बुलाई और कहने लगे, “हम क्या कर रहे हैं? यह मनुष्य तो बहुत चिह्न दिखा रहा है।
48
यदि हम उसे ऐसे ही छोड़ दें तो सब उस पर विश्वास करेंगे, तब रोमी आएँगे और हमारा स्थान और जाति दोनों को छीन लेंगे।”
49
परंतु उनमें से काइफा नामक एक व्यक्ति ने, जो उस वर्ष महायाजक था, उनसे कहा, “तुम कुछ भी नहीं जानते,
50
और न ही तुम समझते हो कि तुम्हारे लिए यही भला है कि हमारे लोगों के लिए एक मनुष्य मरे और संपूर्ण जाति नाश न हो।”
51
परंतु उसने यह अपनी ओर से नहीं कहा, बल्कि उस वर्ष महायाजक होते हुए उसने भविष्यवाणी की कि उस जाति के लिए यीशु मरने वाला है,
52
और न केवल उस जाति के लिए बल्कि इसलिए भी कि परमेश्वर की तितर-बितर हुई संतानों को एक कर दे।
53
अतः उसी दिन से वे उसे मार डालने के लिए योजना बनाने लगे।
54
इसलिए यीशु अब यहूदियों के बीच में खुलकर नहीं फिरा, बल्कि वहाँ से जंगल के निकटवर्ती क्षेत्र के इफ्राईम नामक नगर में चला गया और अपने शिष्यों के साथ वहीं रहा।
55
अब यहूदियों के फसह का पर्व निकट था, और फसह से पहले बहुत से लोग ग्रामीण क्षेत्र से यरूशलेम को गए ताकि अपने आपको शुद्ध करें।
56
अतः वे यीशु को ढूँढ़ने लगे और मंदिर-परिसर में खड़े होकर आपस में कहने लगे, “तुम क्या सोचते हो? क्या वह पर्व में नहीं आएगा?”
57
मुख्य याजकों और फरीसियों ने यह आदेश दे रखा था कि यदि कोई जानता है कि वह कहाँ है तो बताए, ताकि वे उसे पकड़ सकें।
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