bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
/
John 12
John 12
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 13 →
1
ईद-ए-फ़सह से छः दिन पहले, हुज़ूर ईसा बैतअन्नियाह में तशरीफ़ लाये जहां लाज़र रहता था, जिसे हुज़ूर ईसा ने मुर्दों में से ज़िन्दा किया था।
2
यहां हुज़ूर ईसा के लिये एक ज़ियाफ़त तरतीब दी गई। मर्था ख़िदमत कर रही थी, जब के लाज़र उन मेहमानों में शामिल था जो हुज़ूर ईसा के साथ दस्तरख़्वान पर खाना खाने बैठे थे।
3
उस वक़्त मरियम ने तक़रीबन निस्फ़ लीटर ख़ालिस और बड़ा क़ीमती इत्र ईसा के पांव पर डाल कर, अपने बालों से आप के पांव को पोंछना शुरू कर दिया। और सारा घर इत्र की ख़ुश्बू से महक उठा।
4
हुज़ूर ईसा के शागिर्दों में से एक, यहूदाह इस्करियोती, जिस ने आप को बाद में पकड़वाया था, शिकायत करने लगा,
5
“ये इत्र अगर फ़रोख़त किया जाता तो तीन सौ दीनार वसूल होते जो ग़रीबों में तक़्सीम किये जा सकते थे।”
6
उस ने ये इसलिये नहीं कहा था के उसे ग़रीबों का ख़्याल था बल्के इसलिये के वह चोर था; और चूंके उस के पास पैसों की थैली रहती थी, जिस में लोग रक़म डालते थे। वह उस में से अपने इस्तिमाल के लिये कुछ न कुछ निकाल लिया करता था।
7
हुज़ूर ईसा ने फ़रमाया, “उसे परेशान न करो उसे ऐसा करने दो, उस ने ये इत्र मेरी तद्फ़ीन के लिये संभाल कर रखा हुआ है।
8
ग़रीब ग़ुरबा तो हमेशा तुम्हारे साथ रहेंगे, लेकिन मैं यहां हमेशा तुम्हारे पास न रहूंगा।”
9
इस दौरान यहूदी अवाम को मालूम हुआ के हुज़ूर ईसा बैतअन्नियाह में हैं, लिहाज़ा वह भी वहां आ गये। वह सिर्फ़ हुज़ूर ईसा को ही नहीं बल्के लाज़र को भी देखना चाहते थे जिसे आप ने मुर्दों में से ज़िन्दा किया था।
10
तब अहम-काहिनों ने लाज़र को भी क़त्ल करने का मन्सूबा बनाया,
11
क्यूंके उस वक़्त बहुत से यहूदी हुज़ूर ईसा की तरफ़ माइल होकर आप पर ईमान ले आये थे।
12
अगले दिन अवाम जो ईद के लिये आये हुए थे, ये सुन कर के हुज़ूर ईसा भी यरूशलेम आ रहे हैं,
13
खजूर की डालियां ले कर आप के इस्तिक़्बाल को निकले और नारे लगाने लगे, “होशाना!” “मुबारक हैं वह जो ख़ुदावन्द के नाम से आते हैं!” “इस्राईल का बादशाह मुबारक है!”
14
हुज़ूर ईसा एक कमसिन गधे को ले कर उस पर सवार हो गये, जैसा के किताब-ए-मुक़द्दस में लिख्खा है:
15
“ऐ सिय्यून की बेटी, तू मत डर; देख, तेरा बादशाह आ रहा है, वह गधे के बच्चे पर बैठा हुआ है।”
16
शुरू में तो हुज़ूर ईसा के शागिर्द कुछ न समझे के ये क्या हो रहा है। लेकिन बाद में जब हुज़ूर ईसा अपने जलाल को पहुंचे तो उन्हें याद आया के ये सब बातें आप के बारे में लिखी हुई थीं और ये के लोगों का ये सुलूक भी उन ही बातों के मुताबिक़ था।
17
जब हुज़ूर ईसा ने आवाज़ दे कर लाज़र को क़ब्र से बाहर बुलाया और उसे मुर्दों में से ज़िन्दा किया तो ये लोग भी आप के साथ थे और उन्होंने ये ख़बर हर तरफ़ फैला दी थी।
18
बहुत से और लोग, भी ये सुन कर के हुज़ूर ईसा ने एक बहुत बड़ा मोजिज़ा दिखाया है, आप के इस्तिक़्बाल को निकले।
19
फ़रीसी ये देखकर एक दूसरे से कहने लगे, “ज़रा सोचो तो आख़िर हमें क्या हासिल हुआ। देखो सारी दुनिया उस के पीछे कैसे चल रही है!”
20
जो लोग ईद के मौक़े पर इबादत करने के लिये आये थे उन में बाज़ यूनानी भी थे।
21
वह फ़िलिप्पुस के पास आये, जो गलील के शहर बैतसैदा का बाशिन्दा था, और इस से दरख़्वास्त करने लगे। “जनाब, हम हुज़ूर ईसा को देखना चाहते हैं।”
22
फ़िलिप्पुस ने अन्द्रियास को बताया; और फिर दोनों ने आकर हुज़ूर ईसा को ख़बर दी।
23
हुज़ूर ईसा ने उन्हें जवाब दिया, “इब्न-ए-आदम के जलाल पाने का वक़्त आ पहुंचा है।
24
मैं तुम से सच-सच कहता हूं के जब तक गेहूं का दान ख़ाक में मिल कर फ़ना नहीं हो जाता, वह एक ही दान रहता है। लेकिन अगर वह फ़ना हो जाता है, तो बहुत से दाने पैदा करता है।
25
जो आदमी अपनी जान को अज़ीज़ रखता है, उसे खोयेगा लेकिन जो दुनिया में अपनी जान से अदावत रखता है वह उसे अब्दी ज़िन्दगी के लिये महफ़ूज़ रखेगा।
26
जो कोई मेरी ख़िदमत करना चाहता है उसे लाज़िम है के मेरी पैरवी करे; ताके जहां में हूं, वहां मेरा ख़ादिम भी हो। जो मेरी ख़िदमत करता है मेरा आसमानी बाप उसे इज़्ज़त बख़्शेंगे।
27
“अब मेरा दिल घबराता है, तो क्या मैं ये कहूं? ‘ऐ बाप, मुझे इस घड़ी से बचाए रख’? हरगिज़ नहीं, क्यूंके इसीलिये तो मैं आया हूं के इस घड़ी तक पहुचूं।
28
ऐ बाप, अपने नाम को जलाल बख़्श!” तब आसमान से एक आवाज़ सुनाई दी, “मैंने जलाल बख़्शा है और फिर बख़्शूंगा।”
29
जब लोगों का हुजूम जो वहां जमा था ये सुना तो कहा के बादल गरजा है; दूसरों ने कहा के किसी फ़रिश्ते ने हुज़ूर ईसा से कलाम किया है।
30
हुज़ूर ईसा ने फ़रमाया, “ये आवाज़ तुम्हारे लिये आई है नाके मेरे लिये।
31
अब वह वक़्त आ गया है के दुनिया की अदालत की जाये। अब इस दुनिया का हुक्मरां बाहर निकाला जायेगा
32
लेकिन जिस वक़्त में, ज़मीन पर, ऊंचा उठाया जाऊंगा तो सब लोगों को अपने पास खींच लूंगा।”
33
हुज़ूर ईसा ने ये कह कर ज़ाहिर कर दिया के वह किस क़िस्म की मौत से मरने वाले हैं।
34
लोगों ने आप से कहा, “हम ने शरीअत में सुना है के अलमसीह हमेशा ज़िन्दा रहेंगे, फिर आप कैसे कहते हैं, ‘इब्न-ए-आदम का सलीब पर चढ़ाया जाना ज़रूरी है’? ये ‘इब्न-ए-आदम कौन है’?”
35
हुज़ूर ईसा ने उन्हें जवाब दिया, “नूर तुम्हारे दरमियान थोड़ी देर और मौजूद रहेगा। नूर जब तक तुम्हारे दरमियान है नूर में चले चलो, इस से पहले के तारीकी तुम्हें आ ले। जो कोई तारीकी में चलता है, नहीं जानता के वह किधर जा रहा है।
36
जब तक नूर तुम्हारे दरमियान है तुम नूर पर ईमान लाओ, ताके तुम नूर के फ़र्ज़न्द बन सको।” जब हुज़ूर ईसा ये बातें कह चुके, तो वहां से चले गये और उन की नज़रों से ओझल हो गये।
37
अगरचे हुज़ूर ईसा ने उन के दरमियान इतने मोजिज़े दिखाये थे फिर भी वह उन पर ईमान न लाये
38
ताके यसायाह नबी का क़ौल पूरा हो: “ऐ ख़ुदावन्द, हमारे पैग़ाम पर कौन ईमान लाया और ख़ुदावन्द के बाज़ू की क़ुव्वत किस पर ज़ाहिर हुई?”
39
यही वजह थी के वह ईमान न ला सके। यसायाह एक और जगह कहते हैं:
40
“ख़ुदा ने उन की आंखों को अन्धा और दिलों को सख़्त कर दिया है, ताके ऐसा न हो के अपनी आंखों से देख सकें, और अपने दिलों से समझ सकें, और तौबा करें के मैं उन्हें शिफ़ा बख़्शूं।”
41
यसायाह ने ये इसलिये कहा क्यूंके यसायाह ने ख़ुदावन्द का जलाल देखा था और उन के बारे में कलाम भी किया।
42
इस के बावुजूद भी यहूदियों के कई रहनुमा उन पर ईमान तो ले आये लेकिन वह फ़रीसियों की वजह से अपने ईमान का इक़रार न करते थे क्यूंके उन्हें ख़ौफ़ था के वह यहूदी इबादतगाह से ख़ारिज कर दिये जायेंगे;
43
दरअस्ल वह ख़ुदा की जानिब से इज़्ज़त पाने की बजाय इन्सानों की जानिब से इज़्ज़त पाने के ज़्यादा मुतलाशी थे।
44
तब हुज़ूर ईसा ने पुकार कर कहा, “जो कोई मुझ पर ईमान लाता है, वह न सिर्फ़ मुझ पर बल्के मेरे भेजने वाले पर भी ईमान लाता है।
45
और जब वह मुझ पर नज़र डालता है तो मेरे भेजने वाले को देखता है।
46
मैं दुनिया में नूर बन कर आया हूं ताके जो मुझ पर ईमान लाये वह तारीकी में न रहे।
47
“अगर कोई मेरी बातें सुनता है और उन पर अमल नहीं करता तो मैं उसे मुजरिम नहीं ठहराता क्यूंके मैं दुनिया को मुजरिम ठहराने नहीं आया बल्के नजात देने आया हूं।
48
जो मुझे रद्द करता है और मेरी बातें क़बूल नहीं करता उस का इन्साफ़ करने वाला एक है यानी मेरा कलाम जो आख़िरी दिन उसे मुजरिम ठहरायेगा।
49
क्यूंके मैंने अपनी जानिब से कुछ नहीं कहा बल्के आसमानी बाप जिस ने मुझे भेजा है उन ही ने मुझे सब कुछ कहने का हुक्म दिया है।
50
मैं जानता हूं के उन का हुक्म बजा लाना अब्दी ज़िन्दगी की तरफ़ ले जाता है। लिहाज़ा मैं वोही कहता हूं जिस के कहने का हुक्म मुझे बाप ने दिया है।”
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 13 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21