bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
/
John 15
John 15
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
← Chapter 14
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 16 →
1
“मैं अंगूर की हक़ीक़ी बेल हूं, और मेरा बाप बाग़बान है।
2
मेरी जो शाख़ फल नहीं लाती वह उसे काट डालता है, और जो फल लाती है उसे तराशता है ताके वह ज़्यादा फल लाये।
3
तुम इस कलाम के बाइस जो मैंने तुम से किया है पहले ही पाक साफ़ हो चुके हो।
4
तुम मुझ में क़ाइम रहो तो में भी तुम में क़ाइम रहूंगा। कोई शाख़ अपने आप फल नहीं लाती; उस शाख़ का अंगूर की बेल से पैवस्ता रहना लाज़िम है। तुम भी मुझ में क़ाइम रहे बग़ैर फल नहीं ला सकते।
5
“अंगूर की बेल में हूं और तुम मेरी शाख़ें हो। जो मुझ में क़ाइम रहता है और में उस में वह ख़ूब फल लाता है; मुझ से जुदा होकर तुम कुछ नहीं कर सकते।
6
अगर तुम मुझ में क़ाइम नहीं रहते हो, तो उस शाख़ की तरह हो जो दूर फेंक दी जाती और सूख जाती है; ऐसी शाख़ें जमा कर के, आग में झोंकी और जिला दी जाती हैं।
7
अगर तुम मुझ में क़ाइम रहोगे और मेरा कलाम तुम्हारे दिल में क़ाइम रहेगा, तो जो चाहो मांगो, वह तुम्हें दिया जायेगा।
8
मेरे बाप का जलाल इस में है, के जिस तरह तुम बहुत सा फल लाते हो, और ऐसा करना तुम्हारे शागिर्द होने की दलील है।
9
“जैसे बाप ने मुझ से महब्बत की है वैसे ही मैंने तुम से की है। अब मेरी महब्बत में क़ाइम रहो।
10
जिस तरह मैंने अपने बाप के हुक्मों पर अमल किया है, और उन की महब्बत में क़ाइम हूं, उसी तरह अगर तुम भी मेरे अहकाम बजा लाओगे तो मेरी महब्बत में क़ाइम रहोगे।
11
मैंने ये बातें तुम्हें इसलिये बताई हैं के मेरी ख़ुशी तुम में हो और तुम्हारी ख़ुशी पूरी हो जाये।
12
मेरा हुक्म ये है के जैसे मैंने तुम से महब्बत रख्खी तुम भी एक दूसरे से महब्बत रखो।
13
इस से ज़्यादा महब्बत कोई नहीं करता: अपनी जान अपने दोस्तों के लिये क़ुर्बान कर दे।
14
तुम मेरे दोस्त हो बशर्ते के मेरे हुक्म पर अमल करते रहो।
15
अब से मैं तुम्हें ख़ादिम नहीं कहूंगा, क्यूंके ख़ादिम नहीं जानता के उस का मालिक क्या करता है। बल्के, मैंने तुम्हें दोस्त मान है क्यूंके सब कुछ जो मैंने बाप से सुना है तुम्हें बयान कर दिया है।
16
तुम ने मुझे नहीं चुन, बल्के मैंने तुम्हें चुन और मुक़र्रर किया है ताके तुम जा कर फल लाओ ऐसा फल जो क़ाइम रहे ताके जो कुछ तुम मेरा नाम ले कर बाप से मांगोगे वह तुम्हें अता करेगा।
17
मैं तुम्हें हुक्म देता हूं: आपस में महब्बत रखो।
18
“अगर दुनिया तुम से दुश्मनी रखती है तो याद रखो के उस ने पहले मुझ से भी दुश्मनी रख्खी है।
19
अगर तुम दुनिया के होते, तो ये दुनिया तुम्हें अपनों की तरह अज़ीज़ रखती। लेकिन अब तुम, दुनिया के नहीं हो क्यूंके मैंने तुम्हें चुन कर दुनिया से अलैहदा कर दिया है। यही वजह है के दुनिया तुम से दुश्मनी रखती है।
20
मेरी ये बात याद रखो: ‘कोई ख़ादिम अपने आक़ा से बड़ा नहीं होता। ’ अगर दुनिया वालों ने मुझे सताया है, तो वह तुम्हें भी सतायेंगे। अगर उन्होंने मेरी बात पर अमल किया, तो तुम्हारी बात पर भी अमल करेंगे।
21
वह मेरे नाम की वजह से तुम से इस तरह का सुलूक करेंगे, क्यूंके वह मेरे भेजने वाले को नहीं जानते।
22
अगर मैंने आकर उन से कलाम न क्या होता, तो वह गुनहगार न ठहराये जाते लेकिन अब उन के गुनाह का उन के पास कोई उज़्र बाक़ी नहीं रहा।
23
जो मुझ से दुश्मनी रखता है, मेरे बाप से भी दुश्मनी रखता है
24
अगर में उन के दरमियान वह काम न करता जो किसी दूसरे ने नहीं किये, तो वह गुनहगार नहीं ठहरते। लेकिन अब, उन्होंने मेरे कामों को देख लिया है, और उन्होंने मुझ से और मेरे बाप दोनों से दुश्मनी रख्खी है।
25
लेकिन ये इसलिये हुआ के इन की शरीअत में लिख्खा हुआ क़ौल पूरा हो जाये: ‘उन्होंने मुझ से बिला वजह दुश्मनी रख्खी।’
26
“जब वह मददगार यानी रूहे हक़ आयेगा जिसे मैं बाप की जानिब से भेजूंगा तो वह मेरे बारे में गवाही देगा।
27
और तुम भी मेरी बाबत गवाही दोगे क्यूंके तुम शुरू ही से मेरे साथ रहे हो।
← Chapter 14
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 16 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21