bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Urdu
/
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
/
Mark 3
Mark 3
Urdu UCVD (उर्दू हमअस्र तरजुमा)
← Chapter 2
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 4 →
1
फिर से हुज़ूर ईसा यहूदी इबादतगाह में दाख़िल हुए और वहां, एक आदमी था जिस का एक हाथ सूखा हुआ था।
2
और फ़रीसी हुज़ूर ईसा पर की ताक में थे इसलिये हुज़ूर को क़रीब से देखने लगे के अगर हुज़ूर सबत के दिन उस आदमी को शिफ़ा बख़्शते हैं तो वो हुज़ूर पर इल्ज़ाम लगा सकें।
3
हुज़ूर ईसा ने उस सूखे हाथ वाले आदमी से कहा, “उठो और आकर सब के बीच में खड़े हो जाओ।”
4
हुज़ूर ईसा ने उन से फ़रमाया, “सबत के दिन क्या करना रवा है: नेकी करना या बदी करना, जान बचाना या हलाक करना?” लेकिन वह ख़ामोश रहे।
5
वह उन की सख़्त-दिली पर निहायत ही ग़मगीन हुए और, उन पर ग़ुस्से से नज़र कर के, हुज़ूर ईसा ने उस आदमी से कहा, “अपना हाथ बढ़ा।” उस ने जैसे ही हाथ आगे बढ़ाया उस का हाथ बिलकुल ठीक हो गया था।
6
ये देखकर फ़रीसी फ़ौरन बाहर चले गये और हेरोदियों के साथ हुज़ूर ईसा को हलाक करने की साज़िश करने लगे।
7
हुज़ूर ईसा अपने शागिर्दों के साथ झील की तरफ़ तशरीफ़ ले गये, और सूबे गलील और यहूदिया से लोगों का एक बड़ा हुजूम भी आप के पीछे चल रहा था।
8
और यहूदिया, यरूशलेम, इदूमिया, दरया-ए-यरदन के पार और सूर और सैदा के इलाक़ों के लोग भी आ पहुंचे, क्यूंके उन्हें पता चला था के हुज़ूर ईसा बहुत बड़े-बड़े काम करते हैं।
9
हुजूम को देखकर हुज़ूर ईसा ने अपने शागिर्दों से कहा, मेरे लिये एक छोटी कश्ती तय्यार रखो लोग बहुत ही ज़्यादा हैं, कहीं ऐसा न हो के वह मुझे दबा दें।
10
हुज़ूर ईसा ने बहुत से लोगों को शिफ़ा बख़्शी थी, लिहाज़ा जितने लोग बीमार थे आप को छूने की कोशिश में उन पर गिरे पड़ते थे।
11
बदरूहें भी हुज़ूर ईसा को देखती थीं, उन के सामने गिरकर चलाने लगती थीं, “आप ख़ुदा के बेटे हैं।”
12
हुज़ूर ईसा उन्हें सख़्त ताकीद की के वह दूसरों को उन के बारे में न बतायें।
13
फिर हुज़ूर ईसा एक पहाड़ी पर चढ़ गये और वह जिन्हें चाहते थे, उन्हें अपने पास बुलाया और वह हुज़ूर के पास चले आये।
14
हुज़ूर ईसा ने बारह को बतौर रसूल मुक़र्रर किया ताके वह उन के साथ रहें और वह उन्हें मुनादी करने के लिये भेजें
15
और बदरूहों को निकालने का इख़्तियार हासिल हो।
16
चुनांचे हुज़ूर ईसा ने इन बारह को मुक़र्रर किया: शमऊन (जिसे हुज़ूर ईसा ने पतरस का नाम दिया),
17
याक़ूब उस का भाई यूहन्ना जो ज़ब्दी के बेटे थे (हुज़ूर ईसा ने उन का तख़ल्लुस बुआनिरगिस यानी “रअद का बेटा रखा”),
18
अन्द्रियास, फ़िलिप्पुस और बरतुल्माई, मत्ती, और तोमा, हलफ़ई का बेटा याक़ूब और तद्दी, और शमऊन क़नानी
19
और यहूदाह इस्करियोती जिस ने हुज़ूर ईसा से दग़ाबाज़ी भी की थी।
20
हुज़ूर ईसा एक घर में दाख़िल हुए, और वहां इस क़दर भेड़ लग गई के वह, और उन के शागिर्द खाना भी न खा सके।
21
जब उन के अहल-ए-ख़ाना को ख़बर हुई तो वह हुज़ूर ईसा को अपने साथ ले जाने के लिये आये क्यूंके उन का कहना था, “हुज़ूर अलमसीह अपना ज़हनी तवाज़ुन खो बैठे हैं।”
22
शरीअत के आलिम जो यरूशलेम से आये थे उन का कहना था, “हुज़ूर ईसा में बालज़बूल है! और ये भी के वह बदरूहों के रहनुमा की मदद से बदरूहों को निकालते हैं।”
23
हुज़ूर ईसा उन्हें अपने पास बुलाकर उन से तम्सीलों में कहने लगे: “शैतान को ख़ुद शैतान ही निकाले ये कैसे हो सकता है?
24
अगर किसी सल्तनत में फूट पड़ जाये, तो उस का वुजूद क़ाइम नहीं रह सकता।
25
अगर किसी घर में फूट पड़ जाये, तो वह क़ाइम नहीं रह सकता।
26
अगर शैतान अपने ही ख़िलाफ़ लड़ने लगे और उस के अपने अन्दर फूट पड़ जाये, तो वह भी क़ाइम नहीं रह सकता; बल्के उस का ख़ातिमा हो जायेगा।
27
दर-हक़ीक़त, कोई शख़्स किसी ज़ोरआवर के घर में घुस कर उस का सामान नहीं लूट सकता जब तक के वह पहले उस ज़ोरआवर को बांध न ले। तब ही वह उस घर को लूट सकेगा।
28
मैं तुम से सच कहता हूं, इन्सानों के सारे गुनाह और जितना कुफ़्र वह बकते हैं मुआफ़ किये जायेंगे,
29
लेकिन पाक रूह के ख़िलाफ़ कुफ़्र बकने वाला एक अब्दी गुनाह का मुर्तकिब होता है; इसलिये वह हरगिज़ न बख़्शा जायेगा।”
30
हुज़ूर ईसा का इशारा उन ही की तरफ़ था क्यूंके वह कहते थे, “हुज़ूर ईसा में एक बदरूह है।”
31
फिर हुज़ूर ईसा की मां और उन के भाई आ गये और उन्होंने हुज़ूर ईसा को बाहर बुलवा भेजा।
32
हुज़ूर के आस-पास बैठा था, लोगों ने हुज़ूर को ख़बर दी, “वह देखिये! आप की मां और आप के भाई और बहन बाहर खड़े हैं और आप से मुलाक़ात करना चाहते हैं।”
33
“मेरी मां और मेरे भाई कौन हैं?” हुज़ूर ईसा ने जवाब दिया।
34
हुज़ूर ईसा ने अपने इर्दगिर्द बैठे हुए लोगों पर नज़र डाली और फ़रमाया, “ये हैं मेरी मां और मेरे भाई और बहन!
35
क्यूंके जो कोई ख़ुदा की मर्ज़ी पर चलता है वोही मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी मां है।”
← Chapter 2
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 4 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16