bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Awadhi
/
Awadhi
/
Isaiah 29
Isaiah 29
Awadhi
← Chapter 28
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 43
Chapter 44
Chapter 45
Chapter 46
Chapter 47
Chapter 48
Chapter 49
Chapter 50
Chapter 51
Chapter 52
Chapter 53
Chapter 54
Chapter 55
Chapter 56
Chapter 57
Chapter 58
Chapter 59
Chapter 60
Chapter 61
Chapter 62
Chapter 63
Chapter 64
Chapter 65
Chapter 66
Chapter 30 →
1
परमेस्सर कहत ह, “हे अरीएल, अरीएल! तू उ सहर अहइ जहाँ दाऊद छावनी डाए रहा। लोग इ सहर क बरिस दर बरिस पवित्तर भोज बरे जात्र किहेस।
2
किन्तु जब मइँ अरीएल क अन्त करब्या, तउ हुवाँ सोक अउ विलाप होइ। किन्तु उ तब भी मोर अरीएल होइ!
3
“तब मइँ तोहका फउजन क सिबिर स घेरउब। मइँ तोहार विरोध मँ जुद्ध क बुर्ज अउर ढलवान बनाउब।
4
तू पचे धरती पइ गिरि जाब। धूल स तोहार कमज़ोर धीमा फुसफुसाहत क आवाज़ अइसा होइ जइसे धरती प कउनो भूत होइ।”
5
तोहार दुस्मन धूर क कण क भाँति अनगिनत होइहीं। तोहार क्रूर अत्याचार अनगिनत होइहीं जइसे भूसे आँधी मँ उड़त भए अहा।
6
सर्वसक्तिमान यहोवा बादरन क गर्जन स, धरती क काँपे स, अउर जहा ध्वनियन स तोहरे लगे आइ। यहोवा दण्डित करी। यहोवा तूफान, तेज आँधी अउर आगी क प्रयोग करी जउन बारिके सबहिं क नस्ट कइ देइ।
7
तउ रात क सपना क नाईं जउन कि जागते ही गाइब होइ जात ह अइसा ही अरीएल क चारिहुँ कइँती स घेरा भवा फउज अउर ओनके जुद्ध यंत्र जउन कि ओकर खिलाफ घूमत रहत ह, गाइब होइ जात हीं।
8
मुला ओन फउजन क एक सपना जइसा होइ। उ सबइ फउजन उ सब चिजियन न पइहीं जेनका उ पचे चाहत हीं। इ वइसा ही होइ जइसा भूखा मनई भोजन क सपन लखइ अउर जागइ पइ उ आपन क वइसा ही भूखा पावइ। इ वइसा ही होइ जइसे कउनो पिआसा पानी क सपन लखइ अउर जब जागइ तब आपन क पियासा पावइ। सिय्योन क विरोध मँ लड़त भए सबहिं देस फुरइ अइसे ही होइहीं। इ बात ओन पइ खरी उतरी। देसन क उ सबइ चिजियन नाहीं मिलिहीं जेनका ओनका चाह अहइ।
9
आस्चर्य चकित होइ जा अउर अचरज स भरि जा। तू पचे सबहिं धुत्त होब्या किन्तु दाखरस स नाहीं। लखा अउर अचरज करा। तू लड़खड़ाब्या अउर भहराइ जाब्या किन्तु सराबे स नाहीं।
10
यहोवा तोहका सबन्क सोवाएस ह। यहोवा तोहार आँखिन मूँदि दिहस ह। (तोहार आँखिन नाहीं अहइँ)
11
मइँ तू पचन्क बतावत हउँ कि इ सबइ बातन घटिहीं। किन्तु तू पचे मोका नाहीं समुझ रह्या। मोर सब्द उ किताबे क समान अहइँ, जउन बन्द अहइँ अउर जेह पइ एक मोहर लगी बाटइ।
12
तू पचे उ किताबे क एक अइसे मनई क दइ सकत ह जउन पढ़ सकत ह अउर उ मनई स कहि सकत ह कि उ उ किताबे क पढ़इ। मुला उ मनई कही, “मइँ किताबे क बाँच नाहीं सकत काहेकि इ बन्द अहइ अउर मइँ एका खोल नाहीं सकत।” या तू उ किताबे क कउनो भी अइसे मनई क दइ सकत ह जउन बाँच नाहीं सकत, अउर उ मनई स कहि सकत ह कि उ उ किताबे क पढ़इ। तब उ मनई कही, “मइँ इ किताबे क नाहीं बाँचि सकत काहेकि मइँ पढ़ब नाहीं जानत।”
13
मोर सुआमी कहत ह, “इ सबइ लोग कहत हीं कि उ पचे मोहसे पिरेम करत हीं। आपन मुँहे क सब्दन स उ पचे मोरे बरे आदर परगट करत हीं। मुला ओनकर मन मोहसे दूर अहइँ। उ आदर जेका उ पचे मोरे बरे देखॉवत हीं, बस कोरे मानव नेम अहइँ जउन उ पचे रट डाए अहइँ।
14
तउ मइँ एन लोगन क सक्ति स पूर अउर अचरज भरी बातन करत भए आस्चर्य चकित करत रहब। ओनकर बुद्धिमान मनई समझइ मँ असमर्थ होइ जइहीं।”
15
धिक्कार अहइ ओन लोगन क जउन यहोवा स बातन छिपावइ क जतन करिहीं। उ पचे सोचत हीं कि यहोवा तउ समझी ही नाहीं। उ सबइ लोग आँधियारा मँ काम करत हीं। उ सबइ लोग आपन मन मँ कहा करत हीं, “हम पचन्क कउनो लख सकत नाहीं। हम पचे कौन अही, एका कउनो मनई नाहीं जानी।”
16
तू पचे भ्रम मँ पड़ा अहा। तू पचे सोचा करत अहा, कि माटी कोहार क बराबर अहइ। तू पचे सोचा करत अहा कि कृति आपन कर्त्ता स कह सकत ह, “तू मोर रचना नाहीं किहा ह।” इ वइसा ही अहइ, जइसे गगरी क आपन बनावइवाले कोहार स इ कहब, “तू समझत्या नाहीं तू का करत अहा।”
17
इ फुरइ अहइ: कि लबानोन थोड़े समय पाछे, आपन बिसाल ऊँच बृच्छन बरे सपाट जोते खेतन मँ बदल जाइ अउर सपाट खेत ऊँच-ऊँच बृच्छन वाले सघन जंगलन क रूप लइ लेई।
18
किताबे क सब्दन क बहिरे सुनिहीं, आँधर आँधियारे अउ कोहरे मँ स लखि सकिहीं।
19
यहोवा दीन जनन क खुस करी। दीन जन इस्राएल क उ पवित्तरतम मँ आनन्द मनइहीं।
20
अइसा तब होइ जब नीच अउ क्रूर मनई खत्म होइ जइहीं। अइसा तब होइ जब बुरा काम करइ मँ आनन्द लेइवाले लोग चले जइहीं।
21
(उ सबइ लोग दूसर लोगन क बारे मँ झूठ बोला करत हीं। उ पचे कचहरी मँ लोगन क फँसावइ क जतन करत हीं। उ पचे भोले भाले लोगन क नस्ट करइ मँ जुटे रहत हीं।)
22
तउ यहोवा याकूब क परिवार स कहेस। (इ उहइ यहोवा अहइ जउन इब्राहींम क अजाद किहे रहा।) यहोवा कहत ह, “अब याकूब (इस्राएल क लोग) क लज्जित नाहीं होब होइ। अब ओकर मुँह कबहुँ पिअर नाहीं होइ चाही।
23
उ आपन सबहिं संतानन क लखी अउर कही कि मोर नाउँ पवित्तर अहइ। एन संतानन क मइँ आपन हाथन स बनाएउँ ह अउर इ सबइ संतानन मनिहीं कि याकूब क पवित्तर परमेस्सर वास्तव मँ पवित्तर अहइ अउर इ सबइ संतानन इस्राएल क परमेस्सर क आदर देइहीं।
24
उ सबइ लोग जउन गलतियन करत हीं, अब समुझ जइहीं। उ सबइ लोग जउन सिकाइत करत रहत हीं अब निर्देसन क अंगीकार करिहीं।”
← Chapter 28
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 32
Chapter 33
Chapter 34
Chapter 35
Chapter 36
Chapter 37
Chapter 38
Chapter 39
Chapter 40
Chapter 41
Chapter 42
Chapter 43
Chapter 44
Chapter 45
Chapter 46
Chapter 47
Chapter 48
Chapter 49
Chapter 50
Chapter 51
Chapter 52
Chapter 53
Chapter 54
Chapter 55
Chapter 56
Chapter 57
Chapter 58
Chapter 59
Chapter 60
Chapter 61
Chapter 62
Chapter 63
Chapter 64
Chapter 65
Chapter 66
Chapter 30 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28
29
30
31
32
33
34
35
36
37
38
39
40
41
42
43
44
45
46
47
48
49
50
51
52
53
54
55
56
57
58
59
60
61
62
63
64
65
66