bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
/
2 Samuel 14
2 Samuel 14
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
← Chapter 13
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 15 →
1
सरूयाह का पुत्र योआब ताड़ गया कि राजा दाऊद का हृदय अबशालोम में लगा है।
2
अत: उसने तकोआह नगर में एक दूत भेजा, और वहाँ से एक बुद्धिमती स्त्री को बुलाया। योआब ने उससे यह कहा, ‘तुम मृतक के लिए शोक मनानेवाली स्त्री बनो और मातमी वस्त्र पहिन लो। तुम तेल लगाकर बनाव-श्रृंगार मत करना, वरन् ऐसी स्त्री का अभिनय करना जो कई दिन से मृतक के लिए शोक मना रही है।
3
तुम महाराज के पास जाना, और उनसे ये बातें कहना।’ योआब ने उसको सब बातें सिखा दीं।
4
तकोआह नगर की स्त्री राजा दाऊद के पास गई। उसने सिर झुकाकर अभिवादन किया। वह बोली, ‘महाराज की दुहाई!’
5
राजा ने उससे पूछा, ‘क्या बात है?’ स्त्री ने उत्तर दिया, ‘महाराज, मैं विधवा हूँ। मेरा पति मर गया है।
6
आपकी सेविका के दो पुत्र थे। एक दिन वे खेत में परस्पर लड़ने लगे। वहाँ उन्हें छुड़ानेवाला कोई न था। मेरे एक पुत्र ने दूसरे पुत्र पर वार किया, और उसको मार डाला।
7
अब सारा गोत्र आपकी सेविका के विरुद्ध खड़ा हो गया है। मेरे गोत्र के लोग मुझसे यह कह रहे हैं, “अपने भाई पर वार करने वाले को हमारे सुपुर्द करो। जिस भाई की उसने हत्या की है, उसके प्राण के बदले में हम उसकी हत्या करेंगे।” महाराज, यों वे उत्तराधिकारी को भी समाप्त कर देंगे। महाराज, मेरे बचे हुए एकमात्र दीपक को भी वे बुझाना चाहते हैं, जिससे मेरे पति का नाम और उसका वंश धरती पर से मिट जाए।’
8
राजा दाऊद ने स्त्री से कहा, ‘तुम अपने घर जाओ। मैं स्वयं तुम्हारे मामले के सम्बन्ध में आदेश दूँगा।’
9
तकोआह नगर की स्त्री ने राजा से कहा, ‘महाराज, हे स्वामी! इस अधर्म का दोष मुझ पर, और मेरे पैतृक कुल पर ही लगे। महाराज और उनका सिंहासन निर्दोष माना जाए।’
10
राजा दाऊद ने उससे कहा, ‘जो तुम्हें धमकाएगा, उसको मेरे पास लाना। तब वह तुम्हें कभी स्पर्श भी नहीं करेगा।’
11
स्त्री बोली, ‘महाराज अपने प्रभु परमेश्वर के नाम की शपथ खाएँ कि रक्त-प्रतिशोधी बदला नहीं लेगा, और मेरा पुत्र धरती पर से नहीं मिटेगा।’ दाऊद ने कहा, ‘जीवन्त प्रभु की सौगन्ध! तुम्हारे पुत्र के सिर का बाल भी भूमि पर नहीं गिरेगा।’
12
तब स्त्री ने कहा, ‘महाराज, अपनी सेविका को अनुमति दीजिए कि वह आपसे, अपने स्वामी से एक बात कह सके।’ दाऊद ने कहा, ‘बोलो।’
13
स्त्री ने कहा, ‘महाराज, आपने परमेश्वर के निज लोगों के विरुद्ध षड्यन्त्र क्यों रचा? यदि महाराज देश से निकाले गए व्यक्ति को वापस नहीं लाते हैं, तो आप अपने इस निर्णय से स्वयं को दोषी सिद्ध करते हैं।
14
हम सबको एक न एक दिन मरना ही है। हम भूमि पर उण्डेले गए जल के समान हैं जिसको फिर एकत्र नहीं किया जा सकता है; और न परमेश्वर शव को खड़ा करता है। अब महाराज ऐसी योजना बनाएँ कि निर्वासित व्यक्ति उनसे दूर न रहे, वह देश-निकाला हुआ न रहे।
15
मैं महाराज से ये ही बातें कहने के लिए आई थी; क्योंकि लोगों ने मुझे डरा दिया था। आपकी सेविका ने यह सोचा था कि मैं महाराज से ये बातें कहूँगी। कदाचित महाराज अपनी सेविका के कथन के अनुसार कार्य करें।
16
मुझे निश्चय था कि महाराज अपनी सेविका की प्रार्थना सुनेंगे और मुझे उस व्यक्ति के हाथ से मुक्त करेंगे जो मुझे और मेरे पुत्र को धरती से मिटाकर परमेश्वर की मीरास से, इस्राएली राष्ट्र से वंचित करना चाहता है;
17
मैंने यह भी सोचा था कि महाराज के, मेरे स्वामी के वचन से मुझे शान्ति मिलेगी, क्योंकि महाराज भले और बुरे में भेद करने वाले परमेश्वर के दूत के सदृश हैं। प्रभु परमेश्वर आपके साथ हो!’
18
तब राजा दाऊद ने स्त्री से यह कहा, ‘मैं तुमसे एक बात पूछ रहा हूँ। तुम उसको मुझसे मत छिपाना।’ स्त्री ने कहा, ‘महाराज, मेरे स्वामी, बोलिए।’
19
राजा ने पूछा, ‘क्या तुम्हारी इन सब बातों में योआब का हाथ है?’ स्त्री ने उत्तर दिया, ‘मेरे स्वामी, महाराज की सौगन्ध! जो कुछ महाराज ने कहा, उसके एक अक्षर को भी मैं अस्वीकार नहीं कर सकती। महाराज का कथन अक्षरश: सच है। आपके सेवक योआब ने मुझे यह कार्य करने का आदेश दिया था। उन्होंने मुझे ये सब बातें सिखाई थीं।
20
आपके सेवक योआब ने बात छिपाने के लिए इस ढंग से कार्य किया है। परन्तु महाराज में परमेश्वर के दूत की बुद्धि के सदृश बुद्धि है। देश में घटने वाली सब बातों को महाराज जानते हैं।’
21
तब राजा दाऊद ने योआब से कहा, ‘सुनो, मैं तुम्हारी बात स्वीकार करता हूँ। जाओ! युवक अबशालोम को वापस लाओ।’
22
योआब भूमि पर मुँह के बल गिरा। उसने राजा का अभिवादन किया। उसे धन्य! धन्य! कहा। योआब ने कहा, ‘हे मेरे स्वामी, महाराज! आज आपके सेवक को ज्ञात हुआ कि मैंने आपकी कृपा-दृष्टि प्राप्त की है। महाराज ने अपने सेवक की विनती स्वीकार की।’
23
तत्पश्चात् योआब तैयार हुआ। वह गशूर नगर को गया, और वहाँ से अबशालोम को यरूशलेम नगर में ले आया।
24
परन्तु राजा दाऊद ने कहा, ‘वह अपने महल में चला जाए, और मुझे अपना मुँह न दिखाए।’ अत: अबशालोम अपने महल में अलग रहने लगा। वह राजा के दर्शन न कर सका।
25
समस्त इस्राएली राष्ट्र में अबशालोम अपनी सुन्दरता के लिए अत्यन्त प्रसिद्ध था। उसके समान और कोई सुन्दर न था। उसमें नख से शिख तक कुछ दोष न था।
26
वह वर्ष के अन्त में अपने सिर के बाल कटवाता था। जब सिर पर बाल का भार बढ़ने लगता था तब वह उसको कटवाता था। उसने अपने सिर के बाल कटवाए। उसने उनको तौला। वे राजा की तौल के अनुसार लगभग सवा दो किलो निकले!
27
अबशालोम को तीन पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुई। पुत्री का नाम तामार था। वह देखने में सुन्दर थी।
28
अबशालोम दो वर्ष तक यरूशलेम नगर में रहा। किन्तु वह राजा के दर्शन नहीं कर सका।
29
तब अबशालोम ने योआब के पास सन्देश भेजा और उसे बुलाया। वह योआब को राजा के पास भेजना चाहता था। पर योआब उसके पास नहीं आया। अबशालोम ने दूसरी बार सन्देश भेजा। तब भी वह आने को तैयार नहीं हुआ।
30
अत: अबशालोम ने अपने सेवकों को आदेश दिया, ‘देखो, मेरे खेत के पास ही योआब का एक खेत है। उसमें जौ की फसल खड़ी है। जाओ, और उसमें आग लगा दो।’ अत: अबशालोम के सेवकों ने योआब के खेत में आग लगा दी।
31
तब योआब उठा। वह अबशालोम के पास उसके महल में आया। उसने अबशालोम से पूछा, ‘तुम्हारे सेवकों ने मेरे खेत में आग क्यों लगाई?’
32
अबशालोम ने योआब को उत्तर दिया, ‘देखिए, मैंने आपके पास यह सन्देश भेजा था: “आप यहाँ आइए। मैं आपको राजा के पास भेजना चाहता हूँ कि आप राजा से यह बात कहें: मैं गशूर नगर से यहाँ क्यों आया हूँ? मेरा वहीं रहना अधिक अच्छा होता।” अब मुझे राजा के दर्शन करने दीजिए। यदि मैंने अपराध किया है, तो वह मुझे मार डालें।’
33
योआब राजा के पास गया। उसने राजा को यह बात बताई। अत: राजा ने अबशालोम को बुलाया। अबशालोम राजा के पास आया। वह उसके सम्मुख भूमि पर मुँह के बल गिरा, और उसका अभिवादन किया। राजा ने अबशालोम को चूमा।
← Chapter 13
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 15 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24