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Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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Matthew 14
Matthew 14
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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1
उस समय शासक हेरोदेस ने येशु की ख्याति सुनी।
2
उसने अपने दरबारियों से कहा, “यह योहन बपतिस्मादाता है। यह मृतकों में से जी उठा है। इस कारण इसमें ये चमत्कारिक शक्तियाँ क्रियाशील हैं।”
3
हेरोदेस ने अपने भाई फिलिप की पत्नी हेरोदियस के कारण योहन को गिरफ्तार किया और उन्हें बाँध कर बन्दीगृह में डाल दिया था;
4
क्योंकि योहन ने उससे कहा था, “भाई की पत्नी को रखना आपके लिए उचित नहीं है।”
5
हेरोदेस योहन को मार डालना चाहता था; किन्तु वह जनता से डरता था, जो योहन को नबी मानती थी।
6
हेरोदेस के जन्मदिवस के अवसर पर हेरोदियस की पुत्री ने अतिथियों के सामने नृत्य किया और हेरोदेस को मुग्ध कर दिया।
7
इसलिए उसने शपथ खा कर वचन दिया, “जो कुछ तुम माँगोगी, उसे मैं दे दूँगा।”
8
उसकी माँ ने उसे पहले से सिखा दिया था। इसलिए वह बोली, “मुझे इसी समय थाली में योहन बपतिस्मादाता का सिर दीजिए।”
9
हेरोदेस को धक्का लगा, परन्तु अपनी शपथ और अतिथियों के कारण उसने आदेश दिया, “योहन का सिर इसे दे दिया जाए।”
10
और सैनिकों को भेज कर उसने बन्दीगृह में योहन का सिर कटवा दिया।
11
उनका सिर थाली में लाया गया और लड़की को दे दिया गया और वह उसे अपनी माँ के पास ले गयी।
12
योहन के शिष्य आये, और वे उनका शव ले गये। उन्होंने उसे कबर में रखा और जाकर येशु को इसकी सूचना दी।
13
येशु यह समाचार सुन कर वहाँ से हट गये और नाव पर चढ़ कर एक निर्जन स्थान की ओर एकान्त में चले गए। जब लोगों को इसका पता चला, तब वे नगर-नगर से निकल कर पैदल ही उनकी खोज में चल पड़े।
14
नाव से उतर कर येशु ने एक विशाल जनसमूह को देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया और उन्होंने उनके रोगियों को स्वस्थ कर दिया।
15
सन्ध्या होने पर शिष्य उनके पास आ कर बोले, “यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। आप इन लोगों को विदा कीजिए, जिससे ये गाँवों में जाकर अपने लिए भोजन खरीद लें।”
16
येशु ने उत्तर दिया, “उन्हें जाने की जरूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें भोजन दो।”
17
इस पर शिष्यों ने कहा, “यहाँ हमारे पास केवल पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ हैं।”
18
येशु ने कहा, “उन्हें यहाँ मेरे पास लाओ।”
19
येशु ने लोगों को घास पर बैठा देने का आदेश दिया। तब उन्होंने वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ लीं, और आकाश की ओर आँखें उठाकर आशिष माँगी। तब उन्होंने रोटियाँ तोड़ कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने लोगों को।
20
सब ने खाया और वे खा कर तृप्त हो गये। शिष्यों ने बचे हुए टुकड़ों से भरी बारह टोकरियाँ उठाईं।
21
भोजन करने वालों में स्त्रियों और बच्चों के अतिरिक्त लगभग पाँच हजार पुरुष थे।
22
इसके तुरन्त बाद येशु ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उनसे पहले झील के उस पार चले जाएँ; इतने में वह स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।
23
येशु लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढ़े। सन्ध्या होने पर वह वहाँ अकेले थे।
24
नाव उस समय तट से एक-दो किलोमीटर दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।
25
रात के चौथे पहर येशु झील पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।
26
जब उन्होंने येशु को झील पर चलते हुए देखा, तब वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, “यह कोई प्रेत है”, डर के मारे चिल्ला उठे।
27
येशु ने तुरन्त उन से कहा, “धैर्य रखो। मैं हूँ। डरो मत।”
28
पतरस ने उत्तर दिया, “प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की आज्ञा दीजिए।”
29
येशु ने कहा, “आ जाओ।” पतरस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए येशु की ओर बढ़ा;
30
किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा, तो पुकार उठा, “प्रभु! मुझे बचाइए।”
31
येशु ने तुरन्त हाथ बढ़ा कर उसे थाम लिया और कहा, “अल्प-विश्वासी! तुम ने संदेह क्यों किया”
32
दोनों नाव पर चढ़े और वायु थम गयी।
33
जो शिष्य नाव में थे, वे येशु के चरणों पर गिर पड़े। वे बोले, “आप सचमुच परमेश्वर के पुत्र हैं।
34
वे पार उतर कर गिनेसरेत नगर के क्षेत्र में आए।
35
वहाँ के लोगों ने येशु को पहचान लिया और आसपास के सब गाँवों में इसकी खबर फैला दी। वे सब रोगियों को येशु के पास लाए
36
और उनसे निवेदन किया कि वह उन्हें अपने वस्त्र का सिरा ही स्पर्श करने दें। जितनों ने उनका स्पर्श किया, वे सब स्वस्थ हो गये।
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