bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
/
Matthew 15
Matthew 15
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
← Chapter 14
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 16 →
1
यरूशलेम के कुछ फरीसी और शास्त्री येशु के पास आए
2
और यह बोले, “आपके शिष्य धर्मवृद्धों की परम्परा क्यों तोड़ते हैं? वे बिना हाथ धोये भोजन करते हैं।”
3
येशु ने उन्हें उत्तर दिया, “और तुम लोग अपनी ही परम्परा के नाम पर परमेश्वर की आज्ञा क्यों भंग करते हो?
4
परमेश्वर ने कहा: ‘अपने पिता और अपनी माता का आदर करो, और जो अपने पिता या अपनी माता को बुरा कहे, उसे प्राण-दण्ड दिया जाए।’
5
परन्तु तुम लोग कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या अपनी माता से कहे, ‘आप को मुझ से जो लाभ हो सकता था, वह परमेश्वर को अर्पित है,’
6
तो उसके लिए माता-पिता का आदर करना आवश्यक नहीं है। इस प्रकार तुम अपनी परम्परा का पालन कर परमेश्वर का वचन रद्द कर देते हो।
7
ढोंगियो! नबी यशायाह ने यह कह कर तुम्हारे विषय में ठीक ही नबूवत की है:
8
‘ये लोग मुख से मेरा आदर करते हैं, परन्तु इनका हृदय मुझ से दूर है।
9
ये व्यर्थ ही मेरी उपासना करते हैं; क्योंकि ये मनुष्यों के बनाए हुए नियमों को ऐसे सिखाते हैं, मानो वे धर्म-सिद्धान्त हों।’ ”
10
येशु ने लोगों को अपने पास बुला कर कहा, “तुम लोग मेरी बात सुनो और समझो।
11
जो मुँह में जाता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता; बल्कि जो मुँह से बाहर निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।”
12
तब शिष्य येशु के पास आ कर उन से बोले, “क्या आप जानते हैं कि आपके इस कथन से फरीसियों को बुरा लगा है?”
13
येशु ने उत्तर दिया, “जो पौधा मेरे स्वर्गिक पिता ने नहीं रोपा है, वह उखाड़ा जाएगा।
14
उन्हें रहने दो; वे अन्धों के अन्धे पथप्रदर्शक हैं। यदि अन्धा अन्धे को मार्ग दिखाए तो दोनों ही गड्ढे में गिरेंगे।”
15
इस पर पतरस ने कहा, “यह दृष्टान्त हमें समझा दीजिए।”
16
येशु ने उत्तर दिया, “क्या तुम लोग भी अब तक नासमझ हो?
17
क्या तुम यह नहीं समझते कि जो मुँह में जाता है, वह पेट से होकर शौच में निकल जाता है?
18
परन्तु जो मुँह से बाहर निकलता है, वह मन से आता है और वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।
19
क्योंकि बुरे विचार, हत्या, परस्त्री-गमन, व्यभिचार, चोरी, झूठी गवाही और निन्दा − ये सब मन से निकलते हैं।
20
ये ही बातें मनुष्य को अशुद्ध करती हैं; बिना हाथ धोये भोजन करना मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता।”
21
येशु ने वहाँ से विदा हो कर सोर और सदोम प्रदेशों के लिए प्रस्थान किया।
22
उस क्षेत्र की एक कनानी स्त्री आयी और पुकार-पुकार कर कहने लगी, “प्रभु! दाऊद के वंशज! मुझ पर दया कीजिए। मेरी पुत्री बुरी तरह भूत से जकड़ी हुई है।”
23
येशु ने उसे उत्तर नहीं दिया। उनके शिष्यों ने पास आ कर उन से यह निवेदन किया, “उसकी बात मान कर उसे विदा कर दीजिए, क्योंकि वह हमारे पीछे-पीछे चिल्लाती आ रही है।”
24
येशु ने उत्तर दिया, “मैं केवल इस्राएल के घराने की खोयी हुई भेड़ों के पास भेजा गया हूँ।”
25
परन्तु वह स्त्री येशु के सामने आयी और उनके चरणों पर गिर पड़ी। उसने कहा, “प्रभु! मेरी सहायता कीजिए।”
26
येशु ने उत्तर दिया, “बच्चों की रोटी ले कर कुत्तों के सामने डालना ठीक नहीं है।”
27
उसने कहा, “जी हाँ प्रभु! फिर भी कुत्ते स्वामी की मेज से गिरा हुआ चूर-चार खाते ही हैं।”
28
इस पर येशु ने उत्तर दिया, “नारी! तुम्हारा विश्वास महान है। जैसा तुम चाहती हो, वैसा ही तुम्हारे लिए हो।” और उसी क्षण उसकी पुत्री स्वस्थ हो गयी।
29
येशु वहाँ से चले गये और गलील की झील के तट पर पहुँचे। वह एक पहाड़ी पर चढ़े और वहाँ बैठ गये।
30
भीड़-की-भीड़ उनके पास आने लगी। वे लंगड़े, अन्धे, लूले, गूँगे और बहुत-से दूसरे रोगियों को अपने साथ लाये थे। उन्होंने उनको येशु के चरणों में रख दिया और येशु ने उन्हें स्वस्थ कर दिया।
31
जनसमूह ने देखा कि गूँगे बोल रहे हैं, लूले भले-चंगे हो रहे हैं, लंगड़े चल रहे हैं और अन्धे देखने लगे हैं। वे बड़े अचम्भे में पड़ गये और उन्होंने इस्राएल के परमेश्वर की स्तुति की।
32
येशु ने अपने शिष्यों को अपने पास बुला कर कहा, “मुझे इन लोगों पर तरस आता है। ये तीन दिनों से मेरे साथ रह रहे हैं और इनके पास खाने को कुछ भी नहीं है। मैं इन्हें भूखा ही विदा करना नहीं चाहता। कहीं ऐसा न हो कि ये रास्ते में मूच्छिर्त हो जाएँ।”
33
शिष्यों ने उनसे कहा, “इस निर्जन स्थान में हमें इतनी रोटियाँ कहाँ से मिलेंगी कि हम इतनी बड़ी भीड़ को खिला सकें?”
34
येशु ने उन से पूछा, “तुम्हारे पास कितनी रोटियाँ हैं?” उन्होंने कहा, “सात, और थोड़ी-सी छोटी मछलियाँ।”
35
येशु ने लोगों को भूमि पर बैठ जाने का आदेश दिया।
36
येशु ने वे सात रोटियाँ और मछलियाँ लीं; परमेश्वर को धन्यवाद दिया, उनको तोड़ा और अपने शिष्यों को दिया और फिर शिष्यों ने लोगों को दिया।
37
सब ने खाया और वे खा कर तृप्त हो गये और शिष्यों ने बचे हुए टुकड़ों से भरे सात टोकरे उठाये।
38
भोजन करने वालों में स्त्रियों और बच्चों के अतिरिक्त चार हजार पुरुष थे।
39
येशु ने लोगों को विदा किया और वह नाव पर चढ़ कर मगदान नगर के क्षेत्र में आए।
← Chapter 14
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 16 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28