bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
/
Matthew 12
Matthew 12
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 13 →
1
उस समय यीशु सब्त के दिन खेतों में से होकर जा रहा था; उसके शिष्यों को भूख लगी और वे अनाज की बालें तोड़ तोड़कर खाने लगे।
2
यह देखकर फरीसियों ने उससे कहा, “देख, तेरे शिष्य वही कर रहे हैं जिसे सब्त के दिन करना उचित नहीं।”
3
परंतु यीशु ने उनसे कहा, “क्या तुमने नहीं पढ़ा कि जब दाऊद अपने साथियों के साथ था और उसे भूख लगी, तो उसने क्या किया?
4
वह किस प्रकार परमेश्वर के भवन में गया, और उन्होंने भेंट की रोटियाँ खाईं, जिन्हें खाना न तो उसके लिए और न ही उसके साथियों के लिए, पर केवल याजकों के लिए उचित था?
5
या क्या तुमने व्यवस्था में नहीं पढ़ा कि सब्त के दिनों में याजक मंदिर में सब्त के दिन की विधि को तोड़ने पर भी निर्दोष रहते हैं?
6
परंतु मैं तुमसे कहता हूँ कि यहाँ वह है जो मंदिर से भी बड़ा है।
7
यदि तुमने इसका अर्थ जाना होता, ‘मैं बलिदान नहीं परंतु दया चाहता हूँ,’ तो तुम निर्दोषों पर दोष न लगाते।
8
क्योंकि मनुष्य का पुत्र सब्त के दिन का भी प्रभु है।”
9
वहाँ से निकलकर वह उनके आराधनालय में आया;
10
और देखो, एक सूखे हाथवाला मनुष्य था। उन्होंने यीशु पर दोष लगाने के लिए उससे पूछा, “क्या सब्त के दिन स्वस्थ करना उचित है?”
11
उसने उनसे कहा, “तुममें से कौन ऐसा मनुष्य होगा जिसके पास एक ही भेड़ हो, और वही सब्त के दिन गड्ढे में गिर जाए, और उसे पकड़कर न निकाले?
12
फिर मनुष्य तो भेड़ से कितना अधिक मूल्यवान है। इसलिए सब्त के दिन भलाई करना उचित है।”
13
तब यीशु ने उस मनुष्य से कहा, “अपना हाथ बढ़ा।” और उसने बढ़ाया और वह हाथ दूसरे हाथ के समान फिर से ठीक हो गया।
14
तब फरीसियों ने बाहर जाकर यीशु के विरुद्ध सम्मति की कि उसे किस प्रकार नाश करें।
15
यह जानकर यीशु वहाँ से चला गया। बहुत लोग उसके पीछे चल दिए और उसने उन सब को स्वस्थ किया,
16
और उन्हें चेतावनी दी कि वे उसे प्रकट न करें;
17
ताकि वह वचन जो यशायाह भविष्यवक्ता के द्वारा कहा गया था, पूरा हो:
18
मेरे सेवक को देख, जिसे मैंने चुना है, यह मेरा प्रिय है जिससे मेरा मन अति प्रसन्न है; मैं अपना आत्मा उस पर डालूँगा और वह गैरयहूदियों को न्याय का समाचार देगा।
19
वह न तो झगड़ा करेगा और न ही चिल्लाएगा, और न सड़कों पर कोई उसकी आवाज़ सुनेगा।
20
जब तक वह न्याय को विजय न दिला दे, वह न तो कुचले हुए सरकंडे को तोड़ेगा और न ही धुआँ देती हुई बत्ती को बुझाएगा।
21
गैरयहूदी उसके नाम पर आशा रखेंगे।
22
तब यीशु के पास एक दुष्टात्माग्रस्त व्यक्ति को लाया गया जो अंधा और गूँगा था; उसने उसे अच्छा कर दिया और वह गूँगा व्यक्ति बोलने और देखने लगा।
23
इस पर सब लोग चकित होकर कहने लगे, “क्या यही दाऊद का पुत्र है?”
24
यह सुनकर फरीसियों ने कहा, “यह दुष्टात्माओं के प्रधान बालज़बूल के द्वारा ही दुष्टात्माओं को निकालता है।”
25
यीशु ने उनके विचारों को जानकर उनसे कहा: “जिस राज्य में फूट पड़ी हो, वह उजड़ जाता है; और जिस नगर या घर में फूट पड़ी हो, वह स्थिर नहीं रहेगा।
26
यदि शैतान ही शैतान को निकालता है तो वह स्वयं अपना विरोधी हो जाता है; फिर उसका राज्य कैसे स्थिर रहेगा?
27
और यदि मैं बालज़बूल के द्वारा दुष्टात्माओं को निकालता हूँ, तो तुम्हारे पुत्र किसके द्वारा निकालते हैं? इस कारण वे ही तुम्हारे न्यायी होंगे।
28
परंतु यदि मैं परमेश्वर के आत्मा के द्वारा दुष्टात्माओं को निकालता हूँ तो परमेश्वर का राज्य तुम्हारे पास आ पहुँचा है।
29
किसी शक्तिशाली मनुष्य के घर में प्रवेश करके कोई उसका सामान कैसे लूट सकता है, जब तक कि पहले वह उस शक्तिशाली मनुष्य को बाँध न ले? वह तभी उसके घर को लूट सकता है।
30
जो मेरे साथ नहीं, वह मेरे विरुद्ध है, और जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है।
31
इसलिए मैं तुमसे कहता हूँ कि मनुष्यों का हर पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, परंतु आत्मा की निंदा क्षमा नहीं की जाएगी।
32
जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरुद्ध कोई बात कहेगा, उसका अपराध क्षमा किया जाएगा, परंतु जो कोई पवित्र आत्मा के विरुद्ध कहेगा, उसका अपराध न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में क्षमा किया जाएगा।
33
“यदि पेड़ को अच्छा मानो तो उसके फल को भी अच्छा मानो, या पेड़ को बेकार मानो तो उसके फल को भी बेकार मानो; क्योंकि पेड़ अपने फल से ही पहचाना जाता है।
34
हे साँप के बच्चो, तुम बुरे होकर अच्छी बातें कैसे कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है वही मुँह पर आता है।
35
भला मनुष्य अपने भले भंडार से भली बातें निकालता है, और बुरा मनुष्य अपने बुरे भंडार से बुरी बातें निकालता है।
36
परंतु मैं तुमसे कहता हूँ कि जो भी व्यर्थ बात मनुष्य कहेंगे, न्याय के दिन उसका लेखा उन्हें देना पड़ेगा;
37
क्योंकि तू अपने शब्दों से निर्दोष और अपने ही शब्दों से दोषी ठहराया जाएगा।”
38
तब कुछ शास्त्रियों और फरीसियों ने उससे कहा, “हे गुरु, हम तुझसे कोई चिह्न देखना चाहते हैं।”
39
इस पर उसने उनसे कहा, “बुरी और व्यभिचारी पीढ़ी चिह्न ढूँढ़ती है, परंतु योना भविष्यवक्ता के चिह्न को छोड़ उसे कोई चिह्न नहीं दिया जाएगा।
40
क्योंकि जिस प्रकार योना एक विशाल मछली के पेट में तीन दिन और तीन रात रहा, उसी प्रकार मनुष्य का पुत्र भी पृथ्वी के गर्भ में तीन दिन और तीन रात रहेगा।
41
न्याय के दिन नीनवे के लोग इस पीढ़ी के साथ उठ खड़े होंगे और इसे दोषी ठहराएँगे, क्योंकि उन्होंने योना का प्रचार सुनकर पश्चात्ताप किया, परंतु देखो, यहाँ वह है जो योना से भी बढ़कर है।
42
दक्षिण की रानी न्याय के दिन इस पीढ़ी के साथ उठकर इसे दोषी ठहराएगी; क्योंकि वह सुलैमान की बुद्धिमानी की बातें सुनने के लिए पृथ्वी के छोर से आई, परंतु देखो, यहाँ वह है जो सुलैमान से भी बढ़कर है।
43
“जब अशुद्ध आत्मा मनुष्य में से निकल जाती है, तो वह विश्राम की खोज में सूखे स्थानों में भटकती है, परंतु उसे नहीं मिलता।
44
तब वह कहती है, ‘जहाँ से मैं निकली थी अपने उसी घर में लौट जाऊँगी’ और आकर उसे खाली, झाड़ू लगा और सजा सजाया पाती है।
45
फिर वह जाकर अपने से भी बुरी सात और आत्माओं को अपने साथ ले आती है, और उसमें प्रवेश करके वहीं बस जाती है; तब उस मनुष्य की दशा पहले से भी बुरी हो जाती है। इस दुष्ट पीढ़ी के साथ भी ऐसा ही होगा।”
46
अभी वह भीड़ से बातें कर ही रहा था कि देखो, उसकी माता और भाई बाहर खड़े थे और उससे बात करना चाहते थे।
47
तब किसी ने यीशु से कहा, “देख, तेरी माता और तेरे भाई बाहर खड़े हैं और तुझसे बात करना चाहते हैं।”
48
इस पर उसने उस कहनेवाले से कहा, “कौन है मेरी माता, और कौन हैं मेरे भाई?”
49
और उसने अपने शिष्यों की ओर अपना हाथ बढ़ाकर कहा, “देखो, मेरी माता और मेरे भाई;
50
क्योंकि जो कोई मेरे स्वर्गिक पिता की इच्छा पर चलता है, वही मेरा भाई, मेरी बहन और मेरी माता है।”
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 13 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28