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Matthew 14
Hindi HSB 2023 (नवीन हिंदी बाइबल)
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1
उस समय चौथाई देश के राजा हेरोदेस ने यीशु की चर्चा सुनकर
2
अपने सेवकों से कहा, “यह यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला है; वह मृतकों में से जी उठा है, इसलिए उसके द्वारा सामर्थ्य के ये कार्य प्रकट होते हैं।”
3
हेरोदेस ने अपने भाई फिलिप्पुस की पत्नी हेरोदियास के कारण यूहन्ना को पकड़कर बाँधा और बंदीगृह में डाल दिया था;
4
क्योंकि यूहन्ना उससे कहता था, “उसे रखना तेरे लिए उचित नहीं।”
5
वह उसे मार डालना चाहता था, परंतु लोगों से डरता था, क्योंकि वे उसे भविष्यवक्ता मानते थे।
6
जब हेरोदेस के जन्मदिन का उत्सव हुआ तो हेरोदियास की बेटी ने अतिथियों के सामने नाचकर हेरोदेस को प्रसन्न किया,
7
इसलिए उसने शपथ खाकर उसे वचन दिया कि जो कुछ तू माँगेगी, मैं तुझे दूँगा।
8
तब अपनी माँ के द्वारा उकसाए जाने पर उसने कहा, “मुझे यहीं यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाले का सिर एक थाल में मँगवा दे।”
9
राजा दुःखी हुआ परंतु अपनी शपथ और साथ बैठे लोगों के कारण उसने आज्ञा दी कि दे दिया जाए।
10
उसने सिपाही भेजकर बंदीगृह में यूहन्ना का सिर कटवा दिया;
11
और उसका सिर एक थाल में लाकर उस लड़की को दे दिया गया, और वह उसे अपनी माँ के पास ले गई।
12
तब यूहन्ना के शिष्य आकर शव को ले गए और उसे गाड़ दिया, और जाकर यह समाचार यीशु को दिया।
13
यह सुनकर यीशु वहाँ से नाव में अकेला ही किसी निर्जन स्थान की ओर चला गया; जब लोगों ने यह सुना तो नगरों से पैदल ही उसके पीछे चल दिए।
14
जब यीशु नाव से उतरा तो उसने एक बड़ी भीड़ को देखा और उसे लोगों पर तरस आया, और उसने उनके बीमारों को स्वस्थ किया।
15
संध्या होने पर शिष्य उसके पास आकर कहने लगे, “यह स्थान निर्जन है और समय भी बीत चुका है; भीड़ को विदा कर, ताकि वे गाँवों में जाकर अपने लिए भोजन खरीद लें।”
16
परंतु यीशु ने उनसे कहा, “उन्हें जाने की आवश्यकता नहीं; तुम ही उन्हें खाने को दो।”
17
उन्होंने उससे कहा, “हमारे पास यहाँ पाँच रोटियों और दो मछलियों को छोड़ और कुछ भी नहीं है।”
18
उसने कहा, “उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ।”
19
तब उसने लोगों को घास पर बैठाने की आज्ञा देकर पाँच रोटियों और दो मछलियों को लिया और स्वर्ग की ओर देखकर आशिष माँगी, और रोटियाँ तोड़कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने लोगों को।
20
सब ने खाया और तृप्त हो गए। फिर शिष्यों ने बचे हुए टुकड़ों से भरी बारह टोकरियाँ उठाईं।
21
खानेवालों में स्त्रियों और बच्चों को छोड़ लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे।
22
फिर यीशु ने तुरंत शिष्यों को नाव पर चढ़ने और उससे पहले उस पार चले जाने के लिए विवश किया, जबकि वह लोगों को विदा करता रहा।
23
लोगों को विदा करके वह एकांत में प्रार्थना करने के लिए पहाड़ पर चढ़ गया। संध्या होने पर वह वहाँ अकेला था।
24
परंतु उस समय नाव किनारे से कई मील दूर लहरों के थपेड़े खा रही थी, क्योंकि हवा विपरीत थी।
25
रात के लगभग तीन बजे यीशु झील पर चलते हुए उनके पास आया।
26
परंतु जब शिष्यों ने उसे झील पर चलते हुए देखा तो घबरा गए और कहने लगे, “यह तो कोई भूत है।” और डर के मारे चिल्ला उठे।
27
यीशु ने तुरंत उनसे बातें कीं और कहा, “साहस रखो, मैं हूँ, डरो मत।”
28
इस पर पतरस ने उससे कहा, “हे प्रभु, यदि यह तू ही है, तो मुझे पानी पर चलकर अपने पास आने की आज्ञा दे।”
29
उसने कहा, “आ जा।” तब पतरस नाव से उतरा और पानी पर चलकर यीशु की ओर आया।
30
परंतु तेज़ हवा को देखकर वह डर गया, और जब डूबने लगा तो चिल्लाकर कहा, “प्रभु, मुझे बचा!”
31
यीशु ने तुरंत अपना हाथ बढ़ाकर उसे थाम लिया और उससे कहा, “हे अल्पविश्वासी, तूने क्यों संदेह किया?”
32
जब वे नाव पर चढ़ गए, तो हवा थम गई;
33
और जो नाव में थे, उन्होंने उसे दंडवत् करके कहा, “सचमुच, तू परमेश्वर का पुत्र है।”
34
फिर वे पार होकर गन्नेसरत के प्रदेश में आए।
35
उस स्थान के लोगों ने उसे पहचानकर आस-पास के सारे क्षेत्र में संदेश भेजा, और सब बीमारों को उसके पास लाए,
36
और उससे विनती करने लगे कि वह उन्हें अपने वस्त्र का किनारा ही छूने दे; और जितनों ने छुआ, वे स्वस्थ हो गए।
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