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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1 Corinthians 10
1 Corinthians 10
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
तेँ, यौ भाइ लोकनि, हम चाहैत छी जे अहाँ सभ अपना सभक प्राचीन समयक पुरखा लोकनिक बारे मे बुझी जे, जे सभ मूसाक संग मिस्र देश सँ निकललाह ओ सभ गोटे ओहि मेघक छाया मे चललाह जे रस्ता देखबैत संग-संग चलैत छलनि, आ ओ सभ केओ लाल सागरक बीच बाटे पार भेलाह।
2
एहि तरहेँ बुझल जा सकैत अछि जे ओ सभ केओ ओहि मेघक छाया मे चलि कऽ आ मूसाक पाछाँ समुद्र मे जा कऽ एहि रूप मे “बपतिस्मा” स्वीकार करैत मूसा मे सहभागी बनलाह।
3
सभ केओ एके प्रकारक आत्मिक भोजन कयलनि,
4
आ एके प्रकारक आत्मिक जल पिलनि, किएक तँ ओ सभ ओहि आत्मिक चट्टान सँ बहऽ वला जल पिबैत छलाह जे हुनका सभक संग-संग चलैत छलनि, और ओ चट्टान छलाह मसीह।
5
ई सभ बात होइतो हुनका सभ मे सँ अधिकांश लोक सँ परमेश्वर अप्रसन्न भेलाह और ओ सभ निर्जन क्षेत्र मे नष्ट भऽ गेल।
6
ई घटना सभ अपना सभक लेल उदाहरणक रूप मे चेतावनी भेल जाहि सँ अपना सभ हुनका सभ जकाँ अधलाह बात सभक लालसा नहि करी।
7
हुनका सभ मे सँ किछु लोक जकाँ अहाँ सभ मूर्तिक पूजा कयनिहार नहि बनू, जिनका सभक विषय मे धर्मशास्त्र मे लिखल अछि जे, “लोक सभ खयबाक-पिबाक लेल बैसल आ मौज-मजा करबाक लेल उठल।”
8
अपना सभ अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध नहि राखी, जेना कि हुनका सभ मे सँ किछु लोक कयलनि आ एके दिन मे तेइस हजार मरि गेलाह।
9
अपना सभ प्रभुक परीक्षा नहि करियनि, जेना कि हुनका सभ मे सँ किछु लोक कयलनि आ साँप सभक कटनाइ सँ मारल गेलाह।
10
अहाँ सभ कुड़बुड़ाउ नहि, जेना कि हुनका सभ मे सँ किछु लोक कयलनि आ विनाशक दूत द्वारा मारल गेलाह।
11
ई सभ घटना उदाहरणक लेल हुनका सभ पर बितलनि, आ अपना सभ केँ चेतावनी देबाक लेल लिखल गेल अछि जे सभ संसारक अन्त होमऽ-होमऽ वला समय मे जीबि रहल छी।
12
तेँ जे केओ अपना केँ मजगूत बुझैत अछि से सावधान रहओ जे कहीं खसि ने पड़य।
13
अहाँ सभ कहियो कोनो एहन परीक्षा मे नहि पड़लहुँ जे मनुष्य सभ केँ नहि होइत रहैत अछि। परमेश्वर विश्वासयोग्य छथि। ओ अहाँ सभ केँ एहन परीक्षा मे नहि पड़ऽ देताह जे अहाँ सभक सहनशक्ति सँ बाहर होअय। ओ परीक्षाक समय मे तकरा सहबाक साहस दैत अहाँ सभ केँ पार कऽ निकलबाक उपाय सेहो उपलब्ध करौताह।
14
तेँ, यौ हमर प्रिय भाइ लोकनि, अहाँ सभ मूर्तिक पूजा कयनाइ सँ दूर रहू।
15
हम अहाँ सभ केँ समझदार बुझि ई बात कहि रहल छी। हम जे कहैत छी तकर अहाँ सभ स्वयं जाँच करू जे ओ सही अछि वा नहि।
16
प्रभु-भोजक ओ आशिषक बाटी, जकरा लेल अपना सभ प्रभु केँ धन्यवाद दैत छी, की ताहि मे सँ पिबैत अपना सभ मसीहक बहाओल खून मे सहभागी नहि छी? आ ओ रोटी, जकरा अपना सभ तोड़ैत छी, की ताहि मे सँ खा कऽ अपना सभ मसीहक देह मे सहभागी नहि छी?
17
रोटी एकेटा अछि, एहि कारणेँ अपना सभ अनेक होइतो एक देह छी, किएक तँ अपना सभ ओहि एकेटा रोटी मे सँ खाइत छी।
18
इस्राएली समाजक बारे मे सोचू—की बलि-भोज खयनिहार लोक ओहि परमेश्वरक सेवा मे सहभागी नहि अछि जिनकर वेदी पर बलि चढ़ाओल गेल अछि?
19
तखन हम कहि की रहल छी? की ई जे मुरुत पर चढ़ाओल वस्तुक कोनो विशेषता अछि? वा की ई जे मुरुतक कोनो महत्व अछि?
20
नहि! हमर कहबाक अर्थ ई अछि जे, जे बलि मुरुत पर चढ़ाओल जाइत अछि से परमेश्वर केँ नहि, बल्कि दुष्टात्मा सभ केँ चढ़ाओल जाइत अछि, आ हम नहि चाहैत छी जे अहाँ सभ दुष्टात्मा सभक सहभागी बनू।
21
अहाँ सभ प्रभुक बाटी आ दुष्टात्मा सभक बाटी, दूनू मे सँ नहि पिबि सकैत छी। अहाँ सभ प्रभुक भोज आ दुष्टात्मा सभक भोज, दूनू मे सहभागी नहि बनि सकैत छी।
22
की अपना सभ प्रभुक मोन मे डाह उत्पन्न कराबऽ चाहैत छी? की अपना सभ हुनका सँ शक्तिशाली छी?
23
“सभ किछु करबाक स्वतन्त्रता अछि”—मुदा सभ किछु हितकर नहि अछि। “सभ किछु करबाक स्वतन्त्रता अछि”—मुदा सभ किछु लाभदायक नहि अछि।
24
सभ केँ अपन नहि, बल्कि दोसर लोकक हितक ध्यान रखबाक चाही।
25
बजार मे जे माँसु बिकाइत अछि तकरा अहाँ निश्चिन्ततापूर्बक खा सकैत छी। ओ माँसु चढ़ाओल अछि वा नहि तकर पूछ-ताछ नहि करऽ लागू,
26
किएक तँ धर्मशास्त्र मे लिखल अछि जे “पृथ्वी आ ओहि परक जे किछु अछि से सभ प्रभुक छनि।”
27
जँ अविश्वासी सभ मे सँ केओ अहाँ केँ निमन्त्रण दय आ अहाँ जाय चाही तँ जाउ आ ओतऽ जे किछु अहाँ केँ परसल जाइत अछि तकरा निश्चिन्ततापूर्बक बिनु कोनो प्रश्न कयने खाउ।
28
मुदा जँ केओ कहय जे, “ओ प्रसाद अछि,” तँ कहनिहारक हितक लेल आ जाहि सँ विवेक केँ हानि नहि पहुँचय ओ वस्तु नहि खाउ।
29
हमर कहबाक अर्थ अहाँक विवेक सँ नहि, बल्कि ओहि दोसर आदमीक विवेक सँ अछि। किएक तँ हमर स्वतन्त्रता दोसराक विवेकक अनुसार किएक दोषी ठहरय?
30
जँ हम धन्यवाद दऽ कऽ भोजन करैत छी तँ जाहि वस्तुक लेल हम परमेश्वर केँ धन्यवाद देने छी ताहि सँ हमर निन्दा किएक होअय?
31
अहाँ सभ खाइ वा पिबी वा जे किछु करी, सभ किछु एहि लेल करू जाहि सँ परमेश्वरक महिमा प्रगट होनि।
32
ककरो ठेस लगबाक कारण नहि बनू, ने यहूदी सभक लेल, ने आन जातिक लेल आ ने परमेश्वरक मण्डलीक लेल।
33
तहिना हमहूँ अपना हितक लेल नहि, बल्कि दोसर लोक सभक हित केँ ध्यान मे राखि कऽ सभ बात मे सभ लोक केँ प्रसन्न करबाक प्रयत्न करैत छी जाहि सँ ओ सभ उद्धार पाबि सकय।
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