bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Maithili
/
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
/
1 Corinthians 14
1 Corinthians 14
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
← Chapter 13
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 15 →
1
अहाँ सभ प्रेमक प्रेरणाक अनुसार चलबाक लेल प्रयत्नशील रहू आ आत्मिक वरदान सभक प्राप्तिक लेल उत्सुक रहू, विशेष रूप सँ परमेश्वर सँ सम्बाद पयबाक आ सुनयबाक वरदानक लेल।
2
किएक तँ जे अनजान भाषा मे बजैत अछि से मनुष्य सभ सँ नहि, बल्कि परमेश्वर सँ बजैत अछि। वास्तव मे ओकर बात केओ नहि बुझैत अछि। ओ परमेश्वरक आत्मा द्वारा रहस्यक बात सभ कहैत अछि।
3
मुदा जे परमेश्वर सँ सम्बाद पाबि सुनबैत अछि से लोकक आत्मिक वृद्धिक लेल आ ओकरा सभ केँ प्रोत्साहन आ सान्त्वना देबाक लेल बजैत अछि।
4
अनजान भाषा बजनिहार अपनहि आत्मिक वृद्धि करैत अछि मुदा परमेश्वर सँ पाओल सम्बाद सुनौनिहार मण्डलीक आत्मिक वृद्धि करैत अछि।
5
हम चाहितहुँ जे अहाँ सभ मे सँ सभ केँ अनजान भाषा सभ बजबाक वरदान भेटय, मुदा ताहि सँ बेसी ई चाहितहुँ जे अहाँ सभ मे सँ सभ केँ परमेश्वर सँ सम्बाद पयबाक आ सुनयबाक वरदान भेटय। जँ अनजान भाषा बाजऽ वला स्वयं अपन कहल बातक अर्थ नहि बुझा सकैत अछि तँ ओकरा सँ श्रेष्ठ ओ व्यक्ति अछि जे परमेश्वर सँ भेटल सम्बाद सुनबैत अछि, जाहि सँ मण्डलीक आत्मिक वृद्धि होअय।
6
यौ भाइ लोकनि, जँ हम अहाँ सभक ओतऽ आबि कऽ अनजान भाषा मे बाजी तँ जा धरि अहाँ सभ केँ हम अपना पर प्रगट कयल कोनो सत्य नहि सुनाबी, आ ने कोनो ज्ञानक बात, वा परमेश्वर सँ पाओल कोनो सम्बाद वा कोनो शिक्षाक बात कही, तँ ओहि सँ अहाँ सभ केँ की लाभ होयत?
7
तहिना बाँसुरी वा वीणा सनक निर्जीवो बाजा सँ जँ स्पष्ट धुनि नहि निकलत तँ के कहि सकत जे ओहि सँ की बजाओल जा रहल अछि?
8
फेर जँ सेनाक बिगुल सँ स्पष्ट आवाज नहि निकलत तँ कोन सैनिक अपना केँ लड़ाइक लेल तैयार करत?
9
एही तरहेँ अहूँ सभ, जँ बुझऽ वला भाषा मे नहि बाजब तँ जे बात बाजि रहल छी तकर अर्थ के बुझत? एना कऽ कऽ अहाँ सभ तँ हवा मे बात कयनिहार बनि जायब।
10
एहि संसार मे नहि जानि कतेक प्रकारक भाषा अछि, आ ओहि मे सँ एकोटा बिनु अर्थक नहि अछि।
11
जँ हम ककरो बाजल शब्दक अर्थ नहि बुझि पबैत छी तँ हम बजनिहारक लेल परदेशी छी आ बजनिहार हमरा लेल परदेशी अछि।
12
एहि तरहेँ अहूँ सभ, जे पवित्र आत्माक वरदान सभ पयबाक लेल उत्सुक छी, एही बातक लेल विशेष रूप सँ प्रयत्नशील रहू जे अहाँ सभक वरदानक उपयोगिता सँ मण्डलीक आत्मिक वृद्धि होअय।
13
एहि कारणेँ अनजान भाषा बजनिहार अपन कहल बातक अर्थ सेहो बुझा सकय, तकरा लेल ओ प्रभु सँ विनती करओ।
14
किएक तँ जँ हम अनजान भाषा मे प्रार्थना करैत छी तँ हमर आत्मा तँ प्रार्थना करैत अछि मुदा हमर बुद्धि कोनो काजक नहि होइत अछि।
15
तखन हम की करी? हम अपन आत्मा सँ प्रार्थना तँ करब मुदा अपन बुद्धि सँ सेहो प्रार्थना करब। हम अपन आत्मा सँ स्तुति गायब मुदा अपन बुद्धि सँ सेहो स्तुति गायब।
16
जँ अहाँ मात्र आत्मे सँ, ⌞अर्थात् अनजान भाषा मे,⌟ परमेश्वरक स्तुति कऽ रहल छी तँ ओतऽ उपस्थित लोक सभ मे सँ, जे केओ बुझऽ वला नहि अछि, से अहाँक धन्यवादक प्रार्थनाक बाद कोना कहत जे “हँ, एहिना होअय” किएक तँ ओ नहि जनैत अछि जे अहाँ की कहि रहल छी।
17
अहाँ तँ धन्यवाद बहुत बढ़ियाँ सँ दैत छी मुदा ओहि सँ दोसर व्यक्तिक आत्मिक वृद्धि नहि भऽ रहल अछि।
18
हम परमेश्वर केँ धन्यवाद दैत छियनि जे हम अहाँ सभ गोटे सँ बढ़ि कऽ अनजान भाषा मे बजैत छी।
19
तैयो मण्डली मे अनजान भाषा मे दस हजार शब्द बजबाक अपेक्षा दोसर लोक सभ केँ शिक्षा देबाक लेल पाँचेटा बुझऽ वला शब्द बाजब नीक बुझैत छी।
20
यौ भाइ लोकनि, बच्चा जकाँ सोच-विचार कयनाइ छोड़ि दिअ। हँ, अधलाह बात मे छोट बच्चा बनल रहू, मुदा सोचऽ-विचारऽ मे सेयान बनू।
21
धर्म-नियम मे लिखल अछि, “प्रभुक कथन छनि जे, ‘हम दोसर-दोसर भाषा बाजऽ वला आन देशक लोक द्वारा एहि लोक सभ सँ बात करब। मुदा तखनो ई लोक सभ हमर बात पर ध्यान नहि देत।’ ”
22
तहिना अनजान भाषा सभ बजबाक वरदान विश्वासी सभक लेल नहि, बल्कि विश्वास केँ अस्वीकार कयनिहार सभक लेल चिन्ह स्वरूप अछि। मुदा परमेश्वर सँ पाओल सम्बाद सुनौनाइ अविश्वासी सभक लेल नहि, बल्कि विश्वासी सभक लेल चिन्ह स्वरूप अछि।
23
जँ समस्त मण्डली एक ठाम जमा भऽ जाय आ अहाँ सभ केओ अनजान भाषा सभ बाजऽ लागी, आ किछु लोक जे प्रभुक बात सँ अपरिचित अछि वा अविश्वासी अछि, भीतर आबि जाय तँ की ओ सभ अहाँ सभ केँ पागल नहि बुझत?
24
मुदा जँ सभ केओ परमेश्वर सँ पाओल सम्बाद सुनबैत रही आ तखन कोनो अविश्वासी वा प्रभुक बात सँ अपरिचित व्यक्ति भीतर प्रवेश करय तँ ओकरा परमेश्वरक सम्बाद सुनौनिहार सभक बात द्वारा अपना पापक अनुभव होयतैक आ ओहि सभ बात द्वारा ओ अपना केँ दोषी बुझत।
25
एहि तरहेँ ओकरा हृदयक गुप्त बात सभ प्रकाश मे आबि जयतैक आ ओ दण्डवत कऽ परमेश्वरक आराधना करैत ई स्वीकार करत जे, “परमेश्वर वास्तव मे अहाँ सभक बीच उपस्थित छथि।”
26
यौ भाइ लोकनि, फेर एकर निष्कर्ष की अछि? जहिया-कहियो अहाँ सभ जमा होइत छी तँ केओ भजन सुनबैत छी, केओ शिक्षा दैत छी, केओ अपना पर प्रगट कयल कोनो सत्य बतबैत छी, केओ अनजान भाषा मे बजैत छी आ केओ तकर अर्थ बुझबैत छी। मुदा ई सभ मण्डलीक आत्मिक वृद्धिक लेल कयल जाय।
27
जँ केओ अनजान भाषा मे बाजय तँ दू वा बेसी सँ बेसी तीन गोटे बेरा-बेरी बाजओ, और केओ ओकर अर्थ बुझाबओ।
28
जँ कोनो अर्थ बुझौनिहार नहि होअय तँ अनजान भाषा बाजऽ वला मण्डली मे चुप रहओ। ओ अपने सँ आ परमेश्वर सँ बाजओ।
29
परमेश्वरक प्रवक्ता सभ मे सँ दू वा तीन गोटे बाजथि आ बाँकी लोक हुनकर सभक बात सभक जाँच करथि।
30
मुदा जँ ओतऽ बैसल लोक सभ मे सँ किनको पर परमेश्वर सँ कोनो सत्य प्रगट भऽ जाय तँ पहिने सँ बाजऽ वला व्यक्ति चुप भऽ जाथि।
31
अहाँ सभ बेरा-बेरी सभ केओ परमेश्वर सँ पाओल सम्बाद सुना सकैत छी जाहि सँ सभ केँ शिक्षा आ प्रोत्साहन भेटय।
32
परमेश्वरक प्रवक्ता सभ केँ अपन आत्मा पर नियन्त्रण छनि,
33
किएक तँ परमेश्वर द्वारा अव्यवस्था नहि उत्पन्न होइत अछि, बल्कि शान्ति। जहिना प्रभुक लोकक सभ मण्डली मे होइत अछि,
34
तहिना अहूँ सभक सभा सभ मे स्त्रीगण सभ केँ चुप रहबाक चाहियनि। हुनका सभ केँ बजबाक अनुमति नहि अछि, बल्कि धर्म-नियमक कथनानुसार ओ सभ अधीनता मे रहथु।
35
जँ ओ सभ कोनो बातक बारे मे बुझऽ चाहैत होथि तँ घर पर अपन-अपन पति सँ पुछथु, किएक तँ मण्डलीक सभा मे स्त्रीगण सभ केँ बजनाइ लाजक बात अछि।
36
आब कहू, की परमेश्वरक वचन अहीं सभ सँ शुरू भेल? वा की ओ अहीं सभ तक पहुँचल अछि?
37
जँ केओ अपना केँ परमेश्वरक प्रवक्ता वा आत्मिक वरदान सँ सम्पन्न बुझैत होअय तँ ओ ई स्वीकार कऽ लओ जे हम जे किछु अहाँ सभ केँ लिखि रहल छी से प्रभुक आदेश अछि।
38
मुदा जँ केओ एहि पर ध्यान नहि देत तँ ओकरो पर ध्यान नहि देल जयतैक।
39
एहि लेल, यौ भाइ लोकनि, परमेश्वर सँ सम्बाद पयबाक और सुनयबाक लेल उत्सुक रहू मुदा अनजान भाषा सभ मे बाजऽ वला सभ केँ रोकू नहि।
40
सभ किछु उचित आ व्यवस्थित ढंग सँ कयल जाय।
← Chapter 13
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 15 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16