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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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John 15
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
“वास्तविक अंगूर-लत्ती हमहीं छी, और हमर पिता किसान छथि।
2
प्रत्येक ठाढ़ि जे हमरा मे अछि और फड़ैत नहि अछि, तकरा ओ काटि दैत छथिन, और प्रत्येक ठाढ़ि जे फड़ैत अछि तकरा ओ छँटैत छथिन, जाहि सँ ओ शुद्ध भऽ कऽ आओर फड़त।
3
अहाँ सभ तँ हमर ओहि वचन द्वारा, जे हम अहाँ सभ केँ कहने छी, शुद्ध छीहे।
4
हमरा मे रहैत रहू, जेना हम अहाँ सभ मे। जहिना ठाढ़ि अपने सँ नहि फड़ि सकैत अछि, बल्कि तखने जखन लत्ती मे रहैत अछि, तहिना अहूँ सभ तखने फड़ि सकैत छी जँ हमरा मे रहैत रहब।
5
“हम अंगूर-लत्ती छी। अहाँ सभ ठाढ़ि छी। जे हमरा मे रहैत अछि और हम ओकरा मे, सैह बहुत फड़ैत अछि, कारण हमरा बिनु अहाँ सभ किछु नहि कऽ सकैत छी।
6
जँ केओ हमरा मे नहि रहैत अछि, तँ ओ काटल ठाढ़ि जकाँ होइत अछि जे फेकल जाइत अछि और सुखि जाइत अछि। एहन ठाढ़ि जमा कयल जाइत अछि, तखन आगि मे फेकल और जराओल जाइत अछि।
7
जँ हमरा मे रहब और हमर वचन अहाँ मे रहत तँ, जे किछु चाहैत छी से माँगू, और अहाँक लेल भऽ जायत।
8
हमर पिताक महिमा एहि मे प्रगट होयत जे अहाँ सभ हमर शिष्य भऽ कऽ बहुत फड़ैत रहब। अहाँ सभ बहुत फड़ब आ एहि तरहेँ हमर शिष्य ठहरब।
9
“जहिना पिता हमरा सँ प्रेम कयने छथि, तहिना अहाँ सभ सँ हम प्रेम कयने छी। आब हमरा प्रेम मे रहू।
10
अहाँ सभ जँ हमर आदेश केँ मानब तँ हमरा प्रेम मे रहब, जेना हम पिताक आदेश केँ मानने छी और हुनकर प्रेम मे रहैत छी।
11
ई बात हम एहि लेल कहैत छी जे हमर आनन्द अहाँ सभ मे रहय और अहाँ सभक आनन्द पूर्ण होअय।
12
हमर आदेश ई अछि जे, जेना हम अहाँ सभ सँ प्रेम कयने छी, तेना अहाँ सभ एक-दोसर सँ प्रेम करू।
13
एहि सँ बड़का प्रेम कोनो नहि अछि जे, केओ अपन मित्रक लेल अपन प्राण देअय।
14
जँ अहाँ सभ हमर आदेश केँ पालन करैत छी तँ अहाँ सभ हमर मित्रे छी।
15
आब हम अहाँ सभ केँ ‘दास’ नहि कहब, कारण दास नहि जनैत अछि जे ओकर मालिक की करैत छथि। मुदा अहाँ सभ केँ हम ‘मित्र’ कहने छी, किएक तँ जे किछु हम अपना पिता सँ सुनने छी, से सभ अहाँ सभ केँ कहि देने छी।
16
अहाँ सभ हमरा नहि चुनलहुँ। हमहीं अहाँ सभ केँ चुनलहुँ, और नियुक्त कयलहुँ जे अहाँ सभ जा कऽ फड़ैत रही, तथा अहाँ सभक फल स्थायी रहय, जाहि सँ जे किछु अहाँ सभ हमरा नाम सँ पिता सँ माँगब, से ओ पूरा करताह।
17
हम अहाँ सभ केँ ई आदेश दैत छी, जे एक-दोसर सँ प्रेम करू।
18
“जँ संसार अहाँ सभ सँ घृणा करैत अछि तँ मोन राखू जे अहाँ सभ सँ पहिनहि हमरा सँ घृणा कयने अछि।
19
अहाँ सभ जँ संसारक रहितहुँ तँ ओ अहाँ सभ सँ अपन लोक जकाँ प्रेम करैत। मुदा अहाँ सभ संसारक नहि छी। हम अहाँ सभ केँ संसार मे सँ चुनि लेने छी, और तेँ संसार अहाँ सभ सँ घृणा करैत अछि।
20
जे बात हम अहाँ सभ केँ कहलहुँ, तकरा मोन राखू, जे ‘दास अपना मालिक सँ पैघ नहि होइत अछि।’ जँ ओ सभ हमरा सतौने अछि तँ अहूँ सभ केँ सताओत। जँ हमर बात मानने अछि तँ अहूँ सभक मानत।
21
ओ सभ अहाँ सभक संग एहन व्यवहार हमरा नामक कारणेँ करत, किएक तँ ओ सभ तिनका नहि चिन्हैत छनि जे हमरा पठौलनि।
22
जँ हम ओकरा सभ लग नहि आयल रहितहुँ आ ने बात कयने रहितिऐक तँ ओ सभ पापक दोषी नहि होइत। मुदा आब अपना पाप सँ बचबाक लेल ओकरा सभ केँ कोनो बहाना नहि छैक।
23
जे हमरा सँ घृणा करैत अछि, से हमरा पितो सँ घृणा करैत अछि।
24
जँ ओकरा सभक बीच हम ओ काज नहि कयने रहितहुँ जे आओर केओ नहि कयलक, तँ ओ सभ पापक दोषी नहि होइत, मुदा आब ओ सभ हमरा और हमरा पिता दूनू केँ देखनो अछि आ घृणो कयने अछि।
25
मुदा ई एहि लेल भेल जे ओकरा सभक धर्म-नियम मे लिखल ई कथन पूरा होअय जे, ‘ओ सभ हमरा सँ बिनु कारणेँ घृणा कयलक।’
26
“जखन सहायक औताह, जिनका हम पिताक ओहिठाम सँ अहाँ सभ लग पठा देब, अर्थात् सत्यक आत्मा, जे पिता मे सँ निकलैत छथि, तखन ओ हमरा बारे मे गवाही देताह,
27
और अहूँ सभ हमरा बारे मे गवाही देब, किएक तँ अहाँ सभ शुरुए सँ हमरा संग छी।
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