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Matthew 12
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
करीब ओही समय मे यीशु विश्राम-दिन कऽ अपन शिष्य सभक संग खेत दऽ कऽ जा रहल छलाह। हुनका शिष्य सभ केँ भूख लगलनि तँ ओ सभ अन्नक बालि तोड़ि-तोड़ि कऽ खाय लगलाह।
2
ई देखि फरिसी सभ यीशु केँ कहलथिन, “देखू, अहाँक शिष्य सभ ओ काज कऽ रहल अछि जे विश्राम-दिन मे करब धर्म-नियमक अनुसार मना अछि।”
3
यीशु हुनका सभ केँ उत्तर देलथिन, “की अहाँ सभ नहि पढ़ने छी जे दाऊद आ हुनकर संगी सभ जखन भुखायल छलाह तँ ओ की कयलनि?
4
ओ परमेश्वरक भवन मे प्रवेश कयलनि आ अपना संगी सभक संग परमेश्वर केँ चढ़ाओल रोटी खयलनि, जकरा खायब हुनका सभक लेल मना छल, कारण खयबाक अधिकार मात्र पुरोहिते केँ छलनि।
5
अथवा की अहाँ सभ धर्म-नियम मे नहि पढ़ने छी जे पुरोहित मन्दिर मे विश्राम-दिन कऽ मन्दिरक काज सभ कऽ कऽ विश्राम-दिनक आज्ञा केँ तोड़ैत छथि आ तैयो निर्दोष रहैत छथि?
6
हम अहाँ सभ केँ कहैत छी जे एतऽ केओ एहन अछि जे मन्दिरो सँ पैघ अछि।
7
की अहाँ सभ धर्मशास्त्र मे लिखल परमेश्वरक बात नहि बुझैत छी जतऽ कहैत छथि जे, ‘हम अहाँ सभक द्वारा अर्पित चढ़ौना वा बलि-प्रदान नहि चाहैत छी, बल्कि अहाँ सभ दयालु बनू, से चाहैत छी।’? ई जँ बुझितहुँ तँ निर्दोष केँ दोषी नहि कहने रहितहुँ।
8
किएक तँ मनुष्य-पुत्र विश्रामो-दिनक मालिक छथि।”
9
ओतऽ सँ आगाँ बढ़ि यीशु हुनका सभक सभाघर मे गेलाह।
10
ओहिठाम एक व्यक्ति छल, जकर एकटा हाथ सुखायल छलैक। फरिसी सभ यीशु पर दोष लगयबाक उद्देश्य राखि हुनका सँ प्रश्न कयलनि जे, “की विश्राम-दिन मे रोगी केँ स्वस्थ करब धर्म-नियमक अनुसार उचित अछि?”
11
यीशु हुनका सभ केँ उत्तर देलथिन, “अहाँ सभ मे एहन के छी, जकरा लग एकटा भेँड़ा होइक आ ओ विश्राम-दिन कऽ जँ खधिया मे खसि पड़ैक तँ ओकरा पकड़ि कऽ बाहर नहि निकालब?
12
आ भेँड़ा सँ मनुष्य कतेक मूल्यवान अछि! तेँ विश्राम-दिन मे भलाइक काज करब उचित अछि।”
13
तकरबाद यीशु ओहि व्यक्ति केँ कहलथिन, “अपन हाथ बढ़ाबह।” ओ हाथ बढ़ौलक आ ओकर हाथ दोसर हाथ जकाँ एकदम ठीक भऽ गेलैक।
14
एहि पर फरिसी सभ बाहर चल गेलाह आ यीशु केँ कोना मारल जाय, तकर षड्यन्त्र रचऽ लगलाह।
15
मुदा यीशु से बात बुझि ओतऽ सँ चल गेलाह। बहुतो लोक हुनका पाछाँ भऽ गेलनि आ यीशु सभ रोगी केँ स्वस्थ कऽ देलथिन।
16
ओ ओकरा सभ केँ कड़गर आदेश देलथिन जे, “हमरा बारे मे प्रचार नहि करिहह।”
17
ई एहि लेल भेल जे परमेश्वरक ई वचन पूर्ण होअय जे ओ अपन प्रवक्ता यशायाहक माध्यम सँ कहने छलाह—
18
“हमर सेवक केँ देखू, जिनका हम चुनने छी, हमरा लेल अति प्रिय, जिनका सँ हमर मोन प्रसन्न अछि। हम हुनका अपन आत्मा देबनि, आ ओ सभ जातिक लोकक लेल न्यायसंगत फैसला सुनौताह।
19
ने ओ कोनो तरहक विवाद करताह आ ने चिचिअयताह, आ ने हुनकर जोर सँ बजबाक आवाज रस्ता पर ककरो सुनाइ देतैक।
20
ओ थुरायल खड़ही केँ नहि तोड़ताह, आ ने झपलाइत दीप केँ मिझौताह, जाबत तक न्याय केँ विजयी नहि कऽ देताह।
21
पृथ्वीक सभ जातिक लोक हुनके पर आशा राखत।”
22
तखन लोक सभ दुष्टात्मा सँ ग्रसित एक आदमी केँ, जे आन्हर आ बौक छल, तकरा यीशु लग अनलकनि। यीशु ओकरा स्वस्थ कऽ देलथिन और ओ तखने बाजऽ आ देखऽ लागल।
23
एहि पर ओतऽ जमा भेल लोकक भीड़ आश्चर्यित भऽ कहऽ लागल जे, “कतौ ई दाऊदक पुत्र तँ नहि छथि?!”
24
मुदा फरिसी सभ जखन लोकक ई बात सुनलनि तँ ओ सभ कहऽ लगलाह, “ओ तँ मात्र दुष्टात्मा सभक मुखिया बालजबूलक शक्ति सँ दुष्टात्मा सभ केँ निकालैत अछि।”
25
यीशु हुनकर सभक मोनक विचार जानि कहलथिन, “जाहि राज्य मे फूट पड़ि जाय से नष्ट भऽ जायत, आ जाहि नगर वा घर मे फूट भऽ जाय से नहि टिकत।
26
जँ शैताने शैतान केँ निकालऽ लागत तँ मतलब भेल जे ओकरा मे फूट भऽ गेलैक, तखन ओकर राज्य कोना टिकल रहतैक?
27
ठीक अछि, जँ हम बालजबूलक शक्ति सँ दुष्टात्मा सभ केँ निकालैत छी तँ अहाँ सभक लोक ककरा शक्ति सँ निकालैत अछि? वैह सभ अहाँ सभक फैसला करत।
28
मुदा जँ हम परमेश्वरक आत्माक शक्ति सँ दुष्टात्मा सभ केँ निकालैत छी तँ परमेश्वरक राज्य अहाँ सभक बीच आबि गेल अछि, से जानि लिअ।
29
“वा कोनो डकैत, बलगर आदमीक घर मे पैसि कऽ जाबत तक ओ ओकरा बान्हि कऽ काबू मे नहि कऽ लेत, की ताबत तक ओकर सम्पत्ति लुटि कऽ लऽ जा सकत? बान्हि कऽ काबू मे कयलाक बादे ओकरा लुटि सकैत अछि।
30
“जे केओ हमरा संग नहि अछि, से हमरा विरोध मे अछि। आ जे केओ हमरा संग जमा नहि करैत अछि, से छिड़िअबैत अछि।
31
तेँ हम अहाँ सभ केँ कहि दैत छी जे मनुष्यक सभ तरहक पाप आ निन्दाक बात क्षमा कयल जयतैक मुदा पवित्र आत्माक विरोध मे कयल निन्दाक बात क्षमा नहि कयल जयतैक।
32
मनुष्य-पुत्रक विरोध मे जँ केओ किछु बाजत, तँ ओकरा क्षमा कयल जयतैक। मुदा जँ केओ पवित्र आत्माक विरोध मे बाजत, तँ ओकरा ने एहि युग मे आ ने आबऽ वला युग मे क्षमा भेटतैक।
33
“कोनो गाछ केँ नीक बुझैत छी तँ ओकर फल केँ सेहो नीक बुझू, अथवा ओकरा खराब बुझैत छी तँ ओकर फल केँ सेहो खराब बुझू, किएक तँ गाछ अपन फले सँ चिन्हल जाइत अछि।
34
“है साँपक सन्तान सभ, अहाँ सभ दुष्ट भऽ नीक बात बाजि कोना सकैत छी? कारण, जे किछु ककरो हृदय मे भरल अछि, सैह मुँह सँ बहराइत छैक।
35
नीक मनुष्यक मोन मे नीके बातक भण्डार रहैत छैक आ ओ अपन भण्डार मे सँ नीक वस्तु सभ बाहर करैत अछि। अधलाह मनुष्यक मोन मे अधलाहे बातक भण्डार रहैत छैक आ ओ अपन भण्डार मे सँ अधलाह वस्तु सभ बाहर करैत अछि।
36
हम अहाँ सभ केँ कहैत छी, मनुष्य जे कोनो व्यर्थक बात बाजत, न्यायक दिन मे ओकरा तकर हिसाब देबऽ पड़तैक,
37
किएक तँ अहाँ अपन कहल बातक द्वारा निर्दोष और अपन कहल बातक द्वारा दोषी ठहराओल जायब।”
38
एहि पर किछु धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ यीशु केँ कहलथिन, “यौ गुरुजी, हम सभ अहाँ सँ कोनो चमत्कार वला चिन्ह देखऽ चाहैत छी।”
39
यीशु उत्तर देलथिन, “एहि पीढ़ीक लोक सभ कतेक दुष्ट आ विश्वासघाती अछि जे चमत्कारपूर्ण चिन्ह मँगैत अछि! मुदा जे घटना परमेश्वरक प्रवक्ता योनाक संग भेल छलनि, से चिन्ह छोड़ि एकरा सभ केँ आओर कोनो चिन्ह नहि देखाओल जयतैक।
40
जाहि तरहेँ योना तीन दिन आ तीन राति विशाल माछक पेट मे रहलाह, तहिना मनुष्य-पुत्र तीन दिन आ तीन राति पृथ्वीक पेट मे रहत।
41
निनवे नगरक लोक सभ न्यायक दिन मे एहि पीढ़ीक लोकक संग ठाढ़ भऽ एकरा सभ केँ दोषी ठहराओत, किएक तँ निनवे नगरक लोक सभ योनाक प्रचारक बात सुनि अपना पापक लेल पश्चात्ताप कऽ कऽ हृदय-परिवर्तन कयलक, आ देखू, एतऽ एखन केओ एहन अछि जे योनो सँ महान् अछि।
42
न्यायक दिन मे दक्षिण देशक रानी एहि पीढ़ीक लोकक संग ठाढ़ भऽ एकरा सभ केँ दोषी ठहरौतीह, किएक तँ ओ सुलेमान राजाक बुद्धिक बात सुनबाक लेल पृथ्वीक दोसर कात सँ अयलीह, आ देखू, एतऽ एखन केओ अछि जे सुलेमानो सँ महान् अछि।
43
“दुष्टात्मा जखन कोनो मनुष्य मे सँ बहरा जाइत अछि तँ ओ निर्जन-स्थान मे आराम करबाक स्थानक खोज मे घुमैत रहैत अछि, मुदा ओकरा भेटैत नहि छैक।
44
तखन ओ कहैत अछि जे, ‘हम अपन पहिलुके घर मे, जतऽ सँ बहरा कऽ आयल छलहुँ, ततहि फेर जायब।’ तँ ओ जखन ओहिठाम पहुँचैत अछि तँ देखैत अछि जे ओहि घर मे केओ नहि अछि, घर झाड़ल-बहारल अछि, आ सभ वस्तु ढंग सँ राखल अछि।
45
तखन ओ जा कऽ अपनो सँ दुष्टाह सातटा आरो दुष्टात्मा केँ अपना संग लऽ अनैत अछि आ ओहि घर मे अपन डेरा खसा लैत अछि। एहि तरहेँ ओहि मनुष्यक ई दशा पहिलुको दशा सँ खराब भऽ जाइत छैक। एहि भ्रष्ट पीढ़ीक लोकक संग सेहो तहिना होयतैक।”
46
यीशु लोकक भीड़ सँ बात करिते छलाह कि हुनकर माय आ भाय सभ ओतऽ पहुँचलाह आ हुनका सँ गप्प करबाक लेल बाहर ठाढ़ रहलाह।
47
केओ यीशु केँ कहलकनि जे, “देखू, अहाँक माय आ भाय सभ बाहर ठाढ़ छथि आ अहाँ सँ बात करऽ चाहैत छथि।”
48
यीशु ओकरा उत्तर देलथिन, “के छथि हमर माय? के सभ छथि हमर भाय?”
49
तखन अपना शिष्य सभक दिस हाथ सँ इसारा करैत कहलनि, “देखू, यैह सभ हमर माय आ हमर भाय सभ छथि।
50
जे केओ हमर पिता, जे स्वर्ग मे छथि, तिनकर इच्छाक अनुसार चलैत छथि, वैह हमर भाय, हमर बहिन, हमर माय छथि।”
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