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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Matthew 17
Matthew 17
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
छओ दिनक बाद यीशु अपना संग पत्रुस, याकूब आ हुनकर भाय यूहन्ना केँ लऽ कऽ एक ऊँच पहाड़ पर एकान्त मे गेलाह।
2
हुनका सभक सामने मे यीशुक रूप बदलि गेलनि। हुनकर मुँह सूर्य जकाँ चमकऽ लगलनि आ हुनकर वस्त्र इजोत सन उज्जर भऽ गेलनि।
3
एकाएक शिष्य सभ केँ मूसा आ एलियाह यीशु सँ बात-चीत करैत देखाइ देलथिन।
4
एहि पर पत्रुस यीशु केँ कहलथिन, “यौ प्रभु, हमरा सभक लेल ई कतेक नीक बात अछि जे हम सभ एतऽ छी! जँ अपनेक आज्ञा होअय तँ हम एहिठाम तीनटा मण्डप बनायब—एकटा अपनेक लेल, एकटा मूसाक लेल आ एकटा एलियाहक लेल।”
5
पत्रुस ई सभ बाजिए रहल छलाह, तखने एकटा चमकैत मेघ आबि हुनका सभ केँ झाँपि देलकनि आ मेघ मे सँ ई आवाज आयल जे, “ई हमर प्रिय पुत्र छथि। हिनका सँ हम अति प्रसन्न छी, हिनका बात पर ध्यान दिअ!”
6
ई सुनि शिष्य सभ अति भयभीत भऽ कऽ मुँहे भरेँ खसलाह।
7
तखन लग आबि यीशु हुनका सभ केँ छुबि कऽ कहलथिन, “उठू, नहि डेराउ।”
8
ओ सभ जखन अपन नजरि ऊपर उठौलनि तँ ओतऽ यीशु केँ छोड़ि आओर किनको नहि देखलनि।
9
पहाड़ पर सँ नीचाँ उतरैत समय मे यीशु शिष्य सभ केँ आज्ञा देलथिन जे, “जाबत तक मनुष्य-पुत्र मृत्यु सँ फेर जीबि कऽ नहि उठत ताबत तक जे बात अहाँ सभ देखलहुँ से ककरो नहि कहिऔक।”
10
एहि पर हुनकर शिष्य सभ हुनका सँ पुछलथिन, “धर्मशिक्षक सभ किएक कहैत छथि जे पहिने एलियाह केँ अयनाइ आवश्यक अछि?”
11
यीशु उत्तर देलथिन, “ई बात एकदम ठीक अछि। एलियाहक अयनाइ आवश्यक अछि, और ओ सभ बातक सुधार करताह।
12
मुदा हम अहाँ सभ केँ कहैत छी जे एलियाह तँ आबि गेल छथि। लोक सभ हुनका चिन्हि नहि सकलनि और ओकरा सभ केँ जे मोन भेलैक, से हुनका संग कयलकनि। एहि तरहेँ मनुष्य-पुत्र केँ सेहो ओकरा सभक हाथेँ कष्ट भोगऽ पड़तनि।”
13
तखन शिष्य सभ केँ बुझऽ मे अयलनि जे यीशु हमरा सभ केँ बपतिस्मा देनिहार यूहन्नाक सम्बन्ध मे कहि रहल छथि।
14
ओ सभ जखन लोकक भीड़ जतऽ जमा छल ततऽ पहुँचलाह तँ एक गोटे यीशु लग आबि ठेहुनिया दऽ कऽ कहऽ लगलनि,
15
“यौ प्रभु, हमरा बेटा पर दया कयल जाओ, एकरा मिर्गी अबैत छैक आ बहुत कष्ट होइत छैक। ई कखनो आगि मे खसि पड़ैत अछि तँ कखनो पानि मे।
16
हम एकरा अपनेक शिष्य सभ लग अनने छलहुँ, लेकिन ओ सभ एकरा ठीक नहि कऽ सकलथिन।”
17
यीशु उत्तर देलथिन, “है अविश्वासी आ भ्रष्ट पीढ़ीक लोक सभ, हम कहिया तक तोरा सभक संग रहिअह? हम कहिया तक तोरा सभ केँ सहैत रहिअह? आनह लड़का केँ हमरा लग।”
18
जे दुष्टात्मा ओकरा मे पैसि गेल छल, तकरा यीशु फटकारलथिन। दुष्टात्मा ओकरा मे सँ निकलि गेलैक, आ ओ तखने ठीक भऽ गेल।
19
बाद मे शिष्य सभ एकान्त मे यीशु लग आबि कऽ पुछलथिन, “हम सभ ओहि दुष्टात्मा केँ किएक नहि निकालि सकलहुँ?”
20
ओ उत्तर देलथिन, “अहाँ सभ मे विश्वासक कमी अछि, तेँ। हम अहाँ सभ केँ सत्य कहैत छी जे, जँ अहाँ सभ मे सरिसोक दानो बराबरि विश्वास रहत आ एहि पहाड़ केँ कहब जे, ‘एहिठाम सँ हटि कऽ ओतऽ जो’ तँ हटि जायत। एहन कोनो बात नहि अछि जे अहाँ सभक लेल असम्भव होयत।
21
[मुदा एहि तरहक दुष्टात्मा प्रार्थना आ उपास केँ छोड़ि आओर कोनो दोसर उपाय सँ नहि निकालल जा सकैत अछि।] ”
22
एक दिन यीशु आ शिष्य सभ जखन गलील मे एक संग छलाह, तखन यीशु हुनका सभ केँ कहलथिन, “मनुष्य-पुत्र पकड़बा कऽ लोकक हाथ मे सौंपल जायत।
23
ओ सभ ओकरा मारि देतैक, मुदा तेसर दिन ओ जिआओल जायत।” ई बात सुनि शिष्य सभ बहुत उदास भऽ गेलाह।
24
तकरबाद यीशु आ हुनकर शिष्य सभ जखन कफरनहूम नगर मे पहुँचलाह, तखन मन्दिरक कर असूल कयनिहार सभ पत्रुस लग आबि कऽ पुछलकनि, “की अहाँ सभक गुरुजी मन्दिरक कर नहि चुकबैत छथि?”
25
पत्रुस कहलथिन, “हँ, चुकबैत छथि।” तकरबाद पत्रुस जखन घर मे अयलाह तँ यीशुए हुनका सँ पुछलथिन, “यौ सिमोन, अहाँक की विचार अछि? संसारक राजा सभ सीमा-शुल्क वा व्यक्ति-कर ककरा सभ सँ लैत अछि? अपन पुत्र सभ सँ वा आन लोक सभ सँ?”
26
पत्रुस कहलथिन, “आन लोक सँ।” तखन यीशु कहलथिन, “एकर मतलब, पुत्र कर-मुक्त अछि।
27
मुदा एक बात, अपना सभ ओकरा सभ केँ सिकायत करबाक अवसर नहि दी, तेँ अहाँ झील पर जा कऽ बंसी थापू। जे माछ पहिने फँसत तकरा निकालू। ओकरा मुँह मे अहाँ केँ एकटा चानीक सिक्का भेटत। अहाँ ओ सिक्का लऽ कऽ अपना दूनू गोटेक कर ओकरा सभ केँ दऽ कऽ चुका दिऔक।”
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