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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Matthew 23
Matthew 23
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
तकरबाद यीशु जमा भेल लोकक भीड़ केँ आ अपना शिष्य सभ केँ कहलथिन,
2
“मूसाक धर्म-नियमक बात सिखयबाक अधिकार धर्मशिक्षक आ फरिसी सभक हाथ मे छनि।
3
तेँ ओ सभ जे किछु कहैत छथि, तकरा मानू आ करू, मुदा जे ओ सभ करैत छथि से नहि करू, कारण ओ सभ लोक सभ केँ जे सिखबैत छथि से अपने नहि करैत छथि।
4
ओ सभ भारी बोझ बान्हि कऽ लोकक कान्ह पर लादि दैत छथि मुदा तकरा उठयबाक लेल ओ सभ स्वयं अपन आङुरो नहि भिड़बऽ चाहैत छथि।
5
ओ लोकनि सभ काज मात्र लोकक ध्यान आकर्षित करबाक लेल करैत छथि। अपन तावीज सभ नमहर आकारक बनबबैत छथि आ पहिरऽ वला वस्त्र सभ मे लम्बा-लम्बा झालैर सभ लगबबैत छथि।
6
भोज-काज मे सम्मानित स्थान आ सभाघर सभ मे प्रमुख आसन पसन्द करैत छथि।
7
हाट-बजार मे लोक सभ हुनका सभ केँ प्रणाम-पात करैत रहनि आ ‘गुरुजी’ कहि कऽ सम्बोधन करैत रहनि, से बात सभ हुनका सभ केँ बहुत नीक लगैत छनि।
8
“मुदा अहाँ सभ ‘गुरु’ नहि कहाउ, कारण अहाँ सभक गुरु एकेटा छथि आ अहाँ सभ आपस मे भाइ-भाइ छी।
9
पृथ्वी पर किनको अपन धर्म-पिता नहि मानू, कारण अहाँ सभक एकेटा पिता छथि जे स्वर्ग मे रहैत छथि।
10
आ अहाँ सभ ‘आचार्य’ नहि कहाउ, कारण अहाँ सभक आचार्य सेहो एके गोटे छथि, अर्थात् उद्धारकर्ता-मसीह।
11
अहाँ सभ मे जे सभ सँ पैघ होइ से सभक सेवक बनू।
12
कारण, जे केओ अपना केँ पैघ बुझत से छोट बनाओल जायत, मुदा जे केओ अपना केँ छोट बुझत से पैघ बनाओल जायत।
13
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ स्वर्गक राज्यक द्वारि लोक सभक लेल बन्द कऽ दैत छी। ने अपने ओहि मे प्रवेश करैत छी आ ने तकरा सभ केँ प्रवेश करऽ दैत छिऐक जे सभ प्रवेश करऽ चाहैत अछि।
14
[“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ विधवा सभक घर-द्वारि सभ हड़पि लैत छिऐक। लोक सभ केँ देखयबाक लेल लम्बा-लम्बा प्रार्थना करैत छी। तेँ अहाँ सभ केँ बेसी दण्ड भेटत।]
15
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ एक गोटे केँ अपना धर्म मे अनबाक लेल पृथ्वी आ आकाश एकटार कऽ दैत छी, मुदा जखन ओ आबि जाइत अछि तँ ओकरा अपनो सँ दोबर नरक जयबाक जोगरक बना दैत छिऐक।
16
“यौ आन्हर पथ-प्रदर्शक सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ लोक सभ केँ सिखबैत छी जे, ‘जँ केओ मन्दिरक नाम लऽ कऽ सपत खायत, तँ तकर कोनो महत्व नहि अछि, मुदा जँ मन्दिर मे लगाओल सोनक नाम लऽ कऽ सपत खायत, तँ ओकरा अपन सपत केँ पूरा करऽ पड़तैक।’
17
अहाँ सभ आन्हर छी! मूर्ख छी! कोन बात पैघ अछि, लगाओल सोन वा ओ मन्दिर, जकरा सँ ओ सोन पवित्र भेल अछि?
18
अहाँ सभ सिखबैत छी जे, ‘जँ केओ बलि-वेदीक नाम लऽ कऽ सपत खयलक तँ से कोनो बात नहि, मुदा वेदी पर चढ़ाओल चढ़ौनाक नाम लऽ कऽ सपत खयलक तँ से पकिया बात भेल।’
19
यौ आन्हर सभ! कोन बात पैघ अछि, चढ़ौना वा ओ वेदी, जाहि पर अर्पण कयला सँ ओ चढ़ौना पवित्र भेल अछि?
20
तेँ, जे केओ वेदीक सपत खाइत अछि से ओहि वेदी आ ओहि पर जे किछु अछि, सभक सपत खाइत अछि।
21
तहिना, जे केओ मन्दिरक सपत खाइत अछि से मन्दिर आ ओहि मे जे वास करैत छथि, दूनूक सपत खाइत अछि,
22
और जे केओ स्वर्गक सपत खाइत अछि, से परमेश्वरक सिंहासन आ ओहि पर जे विराजमान छथि तिनको सपत खाइत अछि।
23
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी! अहाँ सभ पुदीना, सोंफ आ जीरक दसम भाग तँ परमेश्वर केँ अर्पण करैत छी, मुदा धर्म-नियमक मुख्य बात सभ, जेना न्याय, करुणा आ विश्वसनियता सँ कोनो मतलब नहि रखैत छी। होयबाक तँ ई चाहैत छल जे अहाँ सभ बिनु ओ बात सभ छोड़ने इहो बात सभ करितहुँ।
24
यौ आन्हर पथ-प्रदर्शक सभ, अहाँ सभ तँ मच्छर केँ छानि कऽ फेकि दैत छी, मुदा ऊँट केँ घोँटि लैत छी।
25
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ थारी-बाटी सभ केँ बाहर सँ तँ मँजैत छी, मुदा ओहि मे लूट-पाट आ स्वार्थ द्वारा प्राप्त कयल वस्तु सभ रखैत छी।
26
यौ आन्हर फरिसी, थारी-बाटी केँ पहिने भीतर सँ साफ करू, तखन ओ बाहर सँ सेहो साफ रहत।
27
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ चून सँ पोतल कबरक चबुतरा जकाँ छी, जे बाहर सँ तँ सुन्दर देखाइ दैत रहैत अछि, मुदा ओकरा भीतर मे लासक हाड़ आ सभ तरहक सड़ल वस्तु भरल रहैत छैक।
28
तहिना अहूँ सभ बाहर सँ लोक सभ केँ धार्मिक बुझाइत छिऐक, मुदा भीतर मे पाखण्ड आ अधर्म सँ भरल छी।
29
“यौ धर्मशिक्षक आ फरिसी सभ, धिक्कार अछि अहाँ सभ केँ! अहाँ सभ पाखण्डी छी। अहाँ सभ परमेश्वरक प्रवक्ता सभक कबर पर चबुतराक निर्माण करैत छी, धर्मी लोकक स्मारक केँ सजबैत छी,
30
और कहैत छी जे, ‘हम सभ जँ अपना पुरखा सभक समय मे रहल रहितहुँ तँ हम सभ परमेश्वरक प्रवक्ता सभक हत्या मे ओकरा सभ केँ साथ नहि देने रहितहुँ।’
31
एहि तरहेँ अहाँ सभ अपने साक्षी दऽ रहल छी जे अहाँ सभ परमेश्वरक प्रवक्ता सभक हत्या कयनिहारक सन्तान छी।
32
तँ पूरा करू अपन पुरखाक काज! पापक घैल केँ भरि दिअ!
33
“है साँप सभ! है बिषधर साँपक सन्तान सभ! अहाँ सभ नरकक दण्ड सँ कोना बाँचब?
34
एहि कारणेँ, सुनू अहाँ सभ, हम अहाँ सभ लग अपन प्रवक्ता, बुद्धिमान लोकनि आ शिक्षक सभ केँ पठा रहल छी। अहाँ सभ ओहि मे सँ कतेक गोटे केँ जान सँ मारि देबनि, क्रूस पर लटका देबनि, कतेक गोटे केँ अपन सभाघर सभ मे कोड़ा सँ मारबनि आ एक नगर सँ दोसर नगर तक खिहारैत रहबनि।
35
एहि तरहेँ पृथ्वी पर धर्मी लोकक जतेक खून बहाओल गेल—धर्मी हाबिलक खून सँ लऽ कऽ बिरिकयाहक पुत्र जकरयाहक खून धरि, जिनका अहाँ सभ मन्दिरक ‘पवित्र स्थान’ आ बलि-वेदीक बीच हत्या कऽ देलियनि, तकर भार अहाँ सभक मूड़ी पर पड़त।
36
हम अहाँ सभ केँ सत्य कहैत छी, ई सभ बातक लेखा-जोखा एही पीढ़ीक लोक सभ सँ लेल जायत।
37
“हे यरूशलेम! हे यरूशलेम! तोँ परमेश्वरक प्रवक्ता सभक हत्या करैत छह आ जिनका परमेश्वर तोरा लग पठबैत छथुन, तिनका सभ केँ तोँ पथरबाहि कऽ कऽ मारि दैत छहुन। हम कतेको बेर चाहलिअह जे जहिना मुर्गी अपना बच्चा सभ केँ अपन पाँखिक तर मे नुकबैत अछि, तहिना हमहूँ तोहर सन्तान सभ केँ जमा कऽ लिअह। मुदा तोँ ई नहि चाहलह!
38
देखह, आब तोहर घर उजड़ल पड़ल छह।
39
हम तोरा कहैत छिअह, तोँ हमरा फेर ताबत तक नहि देखबह जाबत तक ओ समय नहि आओत जहिया तोँ ई कहबह जे, ‘धन्य छथि ओ जे प्रभुक नाम सँ अबैत छथि!’ ”
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