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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Romans 11
Romans 11
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
आब ई प्रश्न उठैत अछि जे, की परमेश्वर अपन प्रजा इस्राएली सभक परित्याग कऽ देने छथि? किन्नहुँ नहि! हम अपने इस्राएली छी, अब्राहमक वंशज आ बिन्यामीनक कुलक छी।
2
परमेश्वर अपन ओहि प्रजा केँ जकरा ओ शुरुए सँ चिन्हैत छलाह, परित्याग नहि कयने छथि। की अहाँ सभ नहि जनैत छी जे धर्मशास्त्रक ओहि भाग मे की लिखल अछि, जतऽ कहल गेल अछि जे एलियाह कोना परमेश्वर सँ इस्राएली सभक विरोध मे सिकायत कयलनि? ओ कहलनि,
3
“यौ प्रभु, ओ सभ अहाँक प्रवक्ता सभक हत्या कऽ देने अछि आ अहाँक बलि-वेदी सभ केँ नष्ट कऽ देने अछि। हम असगरे अहाँ केँ मानऽ वला बाँचि गेल छी आ ओ सभ हमरो प्राण लेबऽ चाहैत अछि।”
4
तँ परमेश्वर हुनका की उत्तर देलथिन? ई जे, “हम अपना लेल सात हजार लोक केँ बँचा कऽ रखने छी, जे सभ बाअल देवताक मुरुतक समक्ष दण्डवत नहि कयने अछि।”
5
ठीक एही प्रकारेँ वर्तमान समय मे सेहो परमेश्वर अपना प्रजा मे सँ अपना लेल एक छोट भाग बचा कऽ रखने छथि जकरा ओ अपना कृपा सँ चुनलनि।
6
और ई जँ परमेश्वरक कृपाक परिणाम अछि, तँ मनुष्यक कर्मक फल आब नहि भेल, नहि तँ परमेश्वरक कृपा कृपे नहि रहैत।
7
तँ एकर मतलब की भेल? ई जे, इस्राएली सभ जाहि बातक खोज मे छलाह, से हुनका सभ गोटे केँ नहि भेटलनि, मुदा तिनका सभ केँ भेटलनि जे सभ चुनल गेल छलाह। बाँकी लोक सभ जिद्दी बनि गेलैक,
8
जेना धर्मशास्त्र मे लिखलो अछि, “परमेश्वर ओकरा सभक मोन सुस्त बना देलथिन, एहन आँखि देलथिन जे देखि नहि सकैत छल आ एहन कान देलथिन जे सुनि नहि सकैत छल, और आइ धरि ओकरा सभक दशा एहने बनल छैक।”
9
तहिना दाऊद कहैत छथि जे, “ओकर सभक भोजन ओकरा सभक लेल जाल आ फाँस बनि जाइक, ओकरा सभक पतन आ दण्डक कारण बनैक।
10
ओकरा सभक आँखिक आगाँ अन्हार पसरि जाइक जाहि सँ ओ सभ देखि नहि सकय आ ओकरा सभक पीठ सभ दिनक लेल बोझ सँ झुकल रहैक।”
11
ई प्रश्न आब उठि सकैत अछि जे, की इस्राएली सभ एहन ठोकर खयलनि जे आब हुनका सभक लेल कोनो उपाये नहि अछि? किन्नहुँ नहि! बल्कि हुनका सभक अपराधक कारणेँ गैर-यहूदी लोक सभ केँ उद्धार भेटल अछि, जाहि सँ से देखि कऽ इस्राएलिओ सभ मे उद्धार पयबाक उत्सुकता जागि उठनि।
12
आब जखन इस्राएली सभक अपराध आ पतन सँ संसार केँ, अर्थात् आन जाति सभ केँ, एतेक लाभ भेलैक, तँ सोचू जे तखन कतेक लाभ होयत जखन ओ सभ इस्राएली, जतेक केँ परमेश्वर चुनने छथि, से अपन पूर्ण संख्या मे विश्वास कऽ कऽ मसीह लग आबि जयताह!
13
आब अहाँ सभ केँ, जे सभ गैर-यहूदी लोक छी, हम ई कहैत छी। हम तँ गैर-यहूदी लोक मे प्रचार करबाक लेल मसीह-दूतक रूप मे चुनल गेल छी, आ हम अपन एहि काज केँ विशेष महत्व दैत छी,
14
जाहि सँ अहाँ सभ केँ जे किछु भेटल अछि, से प्राप्त करबाक उत्सुकता हम अपन सजातिक लोक सभ मे उत्पन्न कऽ कोनो तरहेँ हुनका सभ मे सँ किछु लोक केँ बचा सकी।
15
किएक तँ जँ हुनका सभ केँ परित्यागक फलस्वरूप परमेश्वरक संग संसारक मेल-मिलाप भेल अछि तँ हुनका सभ केँ स्वीकारक परिणाम हुनका सभक लेल मरल स्थिति मे सँ जिआओल जयबाक बात छोड़ि आओर की होयत?
16
जँ सानल आँटाक ओ भाग पवित्र अछि जे “प्रथम फलक” रूप मे अर्पण कयल गेल, तँ सम्पूर्ण सानल आँटा पवित्र अछि। जँ गाछक जड़ि पवित्र अछि तँ गाछक ठाढ़ि सेहो पवित्र अछि।
17
मुदा जँ गाछक किछु ठाढ़ि काटि कऽ अलग कयल गेल अछि आ अहाँ सभ, जे सभ जंगली जैतूनक ठाढ़ि छी, से सभ ओहि नीक जैतून मे कलम लगाओल गेलहुँ आ ओकर जड़ि आ रस-भण्डार मे सहभागी भेलहुँ,
18
तँ ओहि काटल ठाढ़ि सभक सम्मुख अहंकार नहि करू। जँ अहाँ सभ अहंकार करी तँ मोन राखू जे जड़ि अहाँ सभ पर नहि, बल्कि अहाँ सभ जड़ि पर आश्रित छी।
19
आब अहाँ सभ कहब जे, “ठाढ़ि सभ केँ एहि लेल काटल गेल जे हमरा सभ केँ कलम लगाओल जाय।”
20
मानलहुँ। मुदा हुनका सभ केँ अविश्वासेक कारणेँ काटि कऽ अलग कयल गेलनि, आ अहाँ सभ विश्वासक कारण अपन स्थान पर स्थिर छी। तेँ अहंकार नहि करू, बल्कि भय मानू।
21
किएक तँ जखन परमेश्वर मूल ठाढ़ि केँ नहि छोड़लनि तँ ओ अहूँ सभ केँ नहि छोड़ताह।
22
तेँ परमेश्वरक दया आ कठोरता, दूनू पर ध्यान राखू—कठोरता तकरा सभ पर अछि जकरा सभक पतन भऽ गेल छैक, मुदा अहाँ सभक लेल हुनकर दया अछि, लेकिन से तखने जखन अहाँ सभ हुनकर दयाक शरण मे रहब; नहि तँ अहूँ सभ काटि कऽ अलग कऽ देल जायब।
23
एही तरहेँ जँ ओहो सभ अपन अविश्वास मे जिद्दी बनल नहि रहताह तँ हुनको सभ केँ कलम लगाओल जयतनि। किएक तँ परमेश्वर सामर्थ्यवान छथि जे हुनका सभ केँ फेर कलम लगा लेथि।
24
कारण, जखन अहाँ सभ जंगली जैतूनक गाछ सँ काटल जा कऽ प्रकृतिक विपरीत एक नीक गाछ मे कलम लगाओल गेलहुँ, तँ जे नीक जैतूनक असली ठाढ़ि अछि से किएक नहि अपन गाछ मे आसानी सँ कलम लगाओल जायत?
25
यौ भाइ लोकनि, कतौ एहन नहि होअय जे अहाँ सभ अपना केँ बहुत बुद्धिमान बुझी। तेँ हम अहाँ सभ केँ ई सत्य, जे पहिने गुप्त छल, से बुझाबऽ चाहैत छी जे, इस्राएलक अधिकांश लोक जे जिद्दी बनल अछि, से बात सभ दिन तक नहि रहत, बल्कि तहिये तक जहिया तक परमेश्वरक चुनल गैर-यहूदी लोकक पूर्ण संख्याक प्रवेश नहि भऽ जाइत अछि।
26
और एहि तरहेँ सम्पूर्ण इस्राएलक उद्धार होयत, जेना कि धर्मशास्त्र मे लिखल अछि, “सियोन सँ मुक्तिदाता औताह। ओ याकूबक वंश सँ अधर्म हटौताह।
27
प्रभु-परमेश्वर कहैत छथि जे, हम जखन ओकरा सभक पाप हरि लेब, तँ हम ओकरा सभ केँ देल अपन एहि वचन केँ पूरा करब।”
28
शुभ समाचार केँ अस्वीकार करबाक कारणेँ यहूदी सभ परमेश्वरक शत्रु ठहरि गेल छथि, जे अहाँ सभक लेल हितक बात भेल, मुदा परमेश्वर हुनका सभक पूर्वज लोकनि केँ चुनने छलाह, आ तेँ पूर्वज सभ केँ देल वचनक कारणेँ ओ सभ परमेश्वरक प्रिय प्रजा छथि।
29
कारण, परमेश्वर जखन ककरो बजयबाक वा किछु देबाक निर्णय करैत छथि तँ ओ अपन निर्णय बदलैत नहि छथि।
30
जहिना पहिने अहाँ सभ परमेश्वरक अनाज्ञाकारी छलहुँ मुदा आब यहूदी सभ केँ अनाज्ञाकारी होयबाक कारणेँ अहाँ सभ पर दया कयल गेल अछि,
31
तहिना यहूदी सभ एखन अनाज्ञाकारी छथि जाहि सँ ओहि दयाक कारणेँ जे अहाँ सभ पर कयल गेल, हुनको सभ पर आब दया कयल जानि।
32
किएक तँ परमेश्वर सभ केँ अनाज्ञाकारिताक बन्हन मे बान्हि लेने छथि जाहि सँ सभ पर ओ कृपा करथि।
33
अहा! परमेश्वरक वैभव, बुद्धि आ ज्ञान केहन अपरम्पार छनि! हुनकर निर्णयक गहिंराइ आ हुनकर काज करबाक तरीका के बुझि सकैत अछि?
34
जेना कि धर्मशास्त्र मे लिखल अछि, “प्रभुक मोन के जनलक अछि? हुनकर सल्लाहकार के भऽ सकल अछि?”
35
“परमेश्वर केँ के कहियो किछु देने अछि जे ओ बदला मे किछु पयबाक दावा कऽ सकय?”
36
सभ किछु तँ हुनका सँ, हुनका द्वारा आ हुनका लेल अछि। हुनकर स्तुति युगानुयुग होइत रहनि! आमीन।
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