bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Maithili
/
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
/
Romans 7
Romans 7
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
← Chapter 6
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 8 →
1
यौ भाइ लोकनि, अहाँ सभ तँ नियम-कानून केँ जननिहार लोक छी—की अहाँ सभ नहि जनैत छी जे तहिए तक कोनो मनुष्य पर कानूनक अधिकार रहैत छैक जहिया तक ओ मनुष्य जीवित अछि?
2
उदाहरणक लेल, विवाहित स्त्री तहिया धरि कानून द्वारा अपन पुरुषक बन्हन मे रहैत अछि जहिया धरि ओकर पुरुष जीवित छैक। जँ पुरुष मरि जाइत छैक तँ ओ विवाह-कानूनक बन्हन सँ मुक्त भऽ जाइत अछि।
3
एहि लेल, जँ ओ पतिक जीवन काल मे कोनो दोसर पुरुष सँ विवाह करैत अछि तँ ओ परपुरुषगमन करऽ वाली कहबैत अछि, मुदा जँ ओकर पति मरि जाइत छैक तँ ओ ओहि विवाह सम्बन्ध सँ मुक्त भऽ जाइत अछि और कोनो दोसर पुरुषक स्त्री बनिओ कऽ परपुरुषगमन करऽ वाली नहि होइत अछि।
4
एहि लेल, यौ हमर भाइ लोकनि, अहूँ सभ मसीहक शारीरिक मृत्यु मे सहभागी भऽ धर्म-नियमक दृष्टिकोण सँ मरि गेल छी, जाहि सँ कोनो दोसराक, अर्थात् यीशु मसीहक, जे मृत्यु मे सँ जिआओल गेलाह, तिनकर भऽ जाइ आ परमेश्वरक लेल फलदायक सेवा करी।
5
जखन अपना सभ अपन पापी स्वभावक अनुसार आचरण करैत छलहुँ, तँ पापमय लालसा सभ धर्म-नियम द्वारा प्रेरणा पाबि कऽ अपना सभक शरीरक अंग सभ मे काज करैत छल, जाहि सँ तेहन जीवन बितबैत छलहुँ जकर परिणाम मृत्यु अछि।
6
मुदा आब तकरा लेखेँ मरि कऽ जे एक समय मे अपना सभ केँ अपना वश मे बान्हि कऽ रखने छल, अर्थात् धर्म-नियम, अपना सभ ओहि सँ मुक्त भऽ गेल छी। आब पुरान तरीका सँ लिखित नियमक दास भऽ कऽ नहि, बल्कि नव तरीका सँ, जे पवित्र आत्माक तरीका छनि, परमेश्वरक सेवा करबाक लेल स्वतन्त्र भऽ गेल छी।
7
तखन, जँ पापमय लालसा सभ धर्म-नियम द्वारा प्रेरणा पबैत अछि, तँ की अपना सभ ई कही जे धर्म-नियम आ पाप दूनू एके चीज अछि? एकदम नहि! बात ई अछि जे, धर्म-नियमक अभाव मे हम पाप केँ चिन्हने नहि रहितहुँ। जँ धर्म-नियम नहि कहने रहैत जे, “लोभ नहि करह” तँ हम ई नहि जनितहुँ जे, लोभ अछि की।
8
एहि आज्ञा सँ मौका पाबि पाप हमरा मे सभ प्रकारक लोभ उत्पन्न कऽ देलक, कारण, नियमक अभाव मे पाप निर्जीव अछि।
9
एक समय छल जहिया धर्म-नियम नहि छल आ हम जीवित छलहुँ, मुदा जखन आज्ञा आबि गेल तँ पाप जीवित भऽ गेल आ हम मरि गेलहुँ।
10
और एहि तरहेँ जाहि आज्ञाक उद्देश्य छल जीवन देनाइ, से आज्ञा हमरा लेल मृत्युक कारण बनि गेल।
11
किएक तँ पाप आज्ञाक उपस्थिति सँ अवसर पाबि हमरा धोखा देलक आ ओही आज्ञा सँ हमरा मारि देलक।
12
एहि तरहेँ अपना सभ देखैत छी जे धर्म-नियम अपने पवित्र अछि और आज्ञा सेहो पवित्र, उचित आ कल्याणकारी अछि।
13
तखन की, जे बात कल्याणकारी छल, सैह हमरा लेल मृत्युक कारण बनि गेल? कदापि नहि! बल्कि जे वस्तु कल्याणकारी छल, तकरा प्रयोग कऽ कऽ पाप हमरा लेल मृत्युक कारण बनि गेल। एहि तरहेँ पापक वास्तविक स्वरूप प्रगट भऽ गेल आ आज्ञाक माध्यम सँ पाप आओर अधिक पापमय प्रमाणित भेल।
14
अपना सभ जनैत छी जे धर्म-नियम आत्मा सँ सम्बन्ध रखैत अछि, मुदा हम मानवीय स्वभावक प्रभाव मे छी आ पापक हाथेँ बिका गेल छी।
15
हम की करैत छी, से नहि बुझि पबैत छी, किएक तँ हम जे करऽ चाहैत छी से नहि करैत छी, बल्कि जाहि बात सँ हम घृणा करैत छी सैह करैत छी।
16
आब हम जे करैत छी, जँ से करबाक इच्छा हमरा नहि अछि, तँ एहि सँ स्पष्ट होइत अछि जे हम वास्तव मे मानैत छी जे धर्म-नियम उचित अछि।
17
तखन एहन अवस्था मे करऽ वला हम नहि रहलहुँ, बल्कि करऽ वला ओ पाप अछि जे हमरा मे वास कऽ रहल अछि।
18
किएक तँ हम जनैत छी जे हमरा मे कोनो नीक वस्तुक वास नहि अछि, अर्थात् हमर मानवीय स्वभाव मे। नीक काज करबाक इच्छा तँ हमरा होइत अछि, मुदा हम ओकरा कऽ नहि पबैत छी।
19
कारण, जाहि नीक काज केँ हम करऽ चाहैत छी तकरा नहि करैत छी, आ जाहि अधलाह काज केँ करऽ नहि चाहैत छी तकरे करैत रहैत छी।
20
जँ हम जे नहि करऽ चाहैत छी सैह करैत छी, तँ ओ करऽ वला हम नहि, बल्कि पाप अछि, जे हमरा मे वास करैत अछि।
21
एहि तरहेँ हम अपना मे ई नियम पबैत छी जे, जखन हम नीक काज करबाक इच्छा करैत छी तँ अधलाहे काज हमरा सँ होइत अछि।
22
हम अपना अन्तरात्मा मे परमेश्वरक धर्म-नियम केँ तँ सहर्ष स्वीकार करैत छी,
23
मुदा हमरा अपना शरीर मे एक दोसरे नियम काज करैत देखाइ दैत अछि, जे ताहि नियम सँ संघर्ष करैत अछि जे हमर बुद्धि स्वीकार करैत अछि। हमरा शरीरक अंग मे क्रियाशील ओ नियम पाप-नियम अछि और ओ हमरा अपन बन्दी बना लैत अछि।
24
हम कतेक अभागल मनुष्य छी! एहि मृत्युक अधीन रहऽ वला शरीर सँ हमरा के छुटकारा दियाओत?
25
परमेश्वरक धन्यवाद होनि! वैह अपना सभक प्रभु यीशु मसीहक द्वारा हमरा छुटकारा दिऔताह। अतः एक दिस तँ हम अपना बुद्धि सँ परमेश्वरक नियमक दास छी, मुदा दोसर दिस अपना मानवीय पाप-स्वभाव सँ पाप-नियमक दास छी।
← Chapter 6
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 8 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16