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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Romans 13
Romans 13
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
प्रत्येक व्यक्ति शासन कयनिहार अधिकारी सभक अधीन रहओ। किएक तँ कोनो अधिकार एहन नहि अछि जे परमेश्वर द्वारा स्थापित नहि कयल गेल होअय—जे सभ शासन कऽ रहल छथि, तिनकर सभक अधिकार परमेश्वर सँ भेटल छनि।
2
एहि लेल, जे केओ शासनक विरोध करैत अछि से तकर विरोध करैत अछि जे परमेश्वर स्थापित कयने छथि, आ अपना पर दण्डक आज्ञा केँ बजबैत अछि।
3
कारण, अधिकारी सभ उचित काज कयनिहार सभक लेल नहि, बल्कि गलत काज कयनिहार सभक लेल भय उत्पन्न करैत छथि। की अहाँ अधिकारी सँ निर्भय रहऽ चाहैत छी? तखन उचित काज करैत रहू आ ओ अहाँक प्रशंसा करताह।
4
किएक तँ ओ अहाँक कल्याण करबाक लेल परमेश्वरक सेवक छथि। मुदा जँ अहाँ गलत काज करैत छी तँ हुनका सँ अवश्य भयभीत होउ, कारण, दण्ड देबाक अधिकार हुनका व्यर्थे नहि छनि। ओ परमेश्वरक सेवक छथि आ गलत काज कयनिहार लोक केँ परमेश्वरक इच्छाक अनुसार दण्ड दैत छथि।
5
तेँ अधिकारी सभक अधीन रहनाइ आवश्यक अछि—मात्र दण्ड सँ बचबाक लेल नहि, बल्कि अपना विवेकक समक्ष निर्दोष रहबाक लेल सेहो।
6
एही कारण सँ अहाँ सभ राजकर सेहो चुकबैत छी, किएक तँ अधिकारी सभ परमेश्वरक सेवक छथि आ अपन कर्तव्य पूरा करऽ मे लागल रहैत छथि।
7
अहाँ सभ सेहो सभक प्रति अपन कर्तव्य पूरा करू—जिनका राजकर देबाक अछि, तिनका राजकर दिऔन; जिनका सीमा-कर देबाक अछि, तिनका सीमा-कर दिऔन; जिनकर भय मानबाक अछि तिनकर भय मानू आ जिनकर आदर करबाक अछि तिनकर आदर करू।
8
एक-दोसराक लेल प्रेमक ऋण केँ छोड़ि अन्य कोनो बात मे ककरो ऋणी बनल नहि रहू, किएक तँ जे अपन पड़ोसी सँ प्रेम करैत अछि से पूरा धर्म-नियमक पालन कयने अछि।
9
कारण, “परस्त्रीगमन नहि करह, हत्या नहि करह, चोरी नहि करह, लोभ नहि करह,” आ एकर बादो आओर जे कोनो आज्ञा सभ अछि, तकर सभक सारांश एहि कथन मे पाओल जाइत अछि जे, “अपना पड़ोसी सँ अपने जकाँ प्रेम करह।”
10
प्रेम पड़ोसीक संग अन्याय नहि करैत अछि, तेँ प्रेम कयनाइ भेल धर्म-नियमक सम्पूर्ण बातक पालन कयनाइ।
11
अपना सभ कतेक महत्वपूर्ण समय मे रहि रहल छी, से बुझि, एहि बात सभ पर ध्यान दिअ। निन्न सँ जागि कऽ उठबाक समय आबि गेल अछि, कारण, अपना सभ जाहि समय मे विश्वास मे अयलहुँ, तकर अपेक्षा आब अपना सभक उद्धार पूर्ण होयबाक समय बेसी लग अछि।
12
राति समाप्त होमऽ-होमऽ पर अछि आ दिन होमऽ वला अछि। तेँ अपना सभ अन्हारक दुष्कर्म केँ त्यागि कऽ प्रकाशक अस्त्र केँ धारण करी।
13
अपना सभ उचित आचरण करी, जे दिनक समय मे शोभनीय होइत अछि। अपना सभ भोग-विलास आ नशेबाजी सँ, गलत शारीरिक सम्बन्ध आ निर्लज्जता सँ, झगड़ा आ ईर्ष्याक बात सभ सँ दूरे रही।
14
प्रभु यीशु मसीह केँ धारण करू, आ अपन पापी स्वभावक इच्छा सभ केँ तृप्त करबाक विचार छोड़ि दिअ।
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