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Romans 8
Romans 8
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
एहि लेल, आब जे सभ मसीह यीशु मे अछि, तकरा सभक लेल कोनो दण्डक आज्ञा नहि अछि।
2
किएक तँ परमेश्वरक जीवनदायक आत्माक नियम मसीह यीशु द्वारा पाप आ मृत्युक नियम सँ हमरा स्वतन्त्र कऽ देने अछि।
3
धर्म-नियम मानवीय पाप-स्वभावक कारणेँ कमजोर भऽ कऽ जे काज करऽ मे असमर्थ छल, से काज परमेश्वर कऽ देलनि। ओ पापक प्रायश्चित्तक लेल अपने पुत्र केँ पठौलनि, जे पापी मनुष्यक समान मानव शरीर धारण कयलनि। एहि तरहेँ परमेश्वर मानव शरीर मे पाप केँ दण्डित कयलनि,
4
जाहि सँ अपना सभ मे, जे सभ मानवीय पाप-स्वभावक अनुसार नहि, बल्कि पवित्र आत्माक इच्छाक अनुसार आचरण करैत छी, धर्म-नियमक उचित माँग पूरा भऽ जाय।
5
कारण, मानवीय पाप-स्वभावक अनुसार चलनिहार लोक सभ ताहि बात सभ पर मोन लगबैत अछि जाहि बातक लेल पाप-स्वभाव इच्छा रखैत अछि, मुदा पवित्र आत्माक अनुसार चलनिहार लोक सभ ताहि बात सभ पर जे पवित्र आत्मा चाहैत छथि।
6
मानवीय पाप-स्वभावक इच्छा सभ पर मोन लगौनाइक परिणाम अछि मृत्यु, मुदा पवित्र आत्माक इच्छा पर मोन लगौनाइक परिणाम अछि जीवन आ शान्ति,
7
किएक तँ मानवीय पाप-स्वभावक सोच-विचार परमेश्वरक विरोधी अछि। मानवीय स्वभाव तँ परमेश्वरक नियमक अधीन नहि अछि आ ने ओकर अधीन भऽ सकैत अछि।
8
जे केओ मानवीय स्वभावक इच्छाक अनुसार आचरण करैत अछि, से परमेश्वर केँ प्रसन्न नहि कऽ सकैत अछि।
9
मुदा अहाँ सभ मानवीय स्वभावक अनुसार नहि, बल्कि परमेश्वरक आत्माक अनुसार जीबैत छी, किएक तँ अहाँ सभ मे परमेश्वरक आत्मा वास करैत छथि। और जँ ककरो मे मसीहक आत्मा वास नहि करैत छथि तँ ओ मसीहक नहि अछि।
10
मुदा जँ मसीह अहाँ सभ मे वास करैत छथि, तँ पापक कारणेँ अहाँ सभक शरीर मृत्युक अधीन मे होइतो, अहाँ सभ केँ धार्मिक ठहराओल जयबाक कारणेँ अहाँ सभक आत्मा जीवित अछि।
11
और जँ तिनकर आत्मा जे यीशु मसीह केँ मुइल सभ मे सँ जीवित कयलथिन, अहाँ सभ मे वास करैत छथि, तँ जे मसीह केँ मुइल सभ मे सँ जीवित कयलथिन से अपना आत्मा द्वारा, जिनकर वास अहाँ सभ मे अछि, अहाँ सभक नश्वर शरीर केँ सेहो जीवन प्रदान करताह।
12
एहि लेल यौ भाइ लोकनि, अपना सभ ऋणी छी, मुदा मानवीय पाप-स्वभावक नहि, जे ओकर इच्छाक अनुसार जीबी।
13
कारण, जँ अहाँ सभ मानवीय स्वभावक अनुरूप जीब तँ अवश्य मरब, मुदा जँ पवित्र आत्माक शक्ति द्वारा ताहि अधलाह काज सभक अन्त करब जे शरीर सँ कयल जाइत अछि तँ जीवन प्राप्त करब,
14
किएक तँ जे सभ परमेश्वरक आत्मा द्वारा संचालित कयल जाइत अछि, सैह सभ परमेश्वरक सन्तान अछि।
15
अहाँ सभ केँ जे आत्मा देल गेल छथि, से अहाँ सभ केँ फेर डेराय वला गुलाम नहि बनबैत छथि, बल्कि परमेश्वरक पुत्र बनौने छथि। ओहि आत्माक द्वारा अपना सभ हुनका पुकारि उठैत छियनि जे, “हे बाबूजी! हे पिता!”
16
पवित्र आत्मा स्वयं अपना सभक आत्मा केँ गवाही दैत छथि जे अपना सभ परमेश्वरक सन्तान छी।
17
जँ अपना सभ हुनकर सन्तान छी तँ उत्तराधिकारी सेहो छी—परमेश्वरक उत्तराधिकारी आ मसीहक संग सह-उत्तराधिकारी। कारण, जँ अपना सभ यीशु मसीहक संग दुःख सहब तँ हुनका संग महिमा मे सेहो सहभागी होयब।
18
हम ई मानैत छी जे, जे महिमा अपना सभ मे प्रगट होमऽ वला अछि तकरा तुलना मे वर्तमान समयक कष्ट किछु नहि अछि।
19
ई सृष्टि बहुत जिज्ञासाक संग ओहि समयक प्रतीक्षा कऽ रहल अछि जहिया परमेश्वरक सन्तान सभ केँ प्रगट कयल जायत।
20
ई सृष्टि तँ व्यर्थताक अधीन कऽ देल गेल, मुदा से अपन इच्छा सँ नहि, बल्कि हुनकर इच्छा सँ जे एकरा अधीन कऽ देलथिन, मुदा ई आशा बनल रहल जे,
21
एक दिन आओत जहिया सृष्टि सरनाइ आ मरनाइक बन्हन सँ मुक्त भऽ ओहि महिमामय स्वतन्त्रता मे सहभागी बनत जे परमेश्वरक सन्तान सभक होयतैक।
22
हम सभ जनैत छी जे सम्पूर्ण सृष्टि मिलि कऽ आइ तक ओहि प्रकारक कष्ट सँ कुहरैत आयल अछि जेना प्रसव-पीड़ाक कष्ट होइत अछि।
23
मात्र वैह नहि, बल्कि अपनो सभ, जकरा सभ केँ परमेश्वरक वचनक पूर्तिक पहिल भागक रूप मे पवित्र आत्मा भेटल छथि, भीतरे-भीतर कुहरैत छी और एहि बातक प्रतीक्षा करैत छी जे अपना सभ पूर्ण रूप सँ परमेश्वरक पोषपुत्र बनाओल जायब आ शरीर सरनाइ आ मरनाइक बन्हन सँ छुटकारा पाबि नव कयल जायत।
24
जहिया सँ अपना सभक उद्धार भेल, तहिया सँ अपना सभ मे ई आशा बनल रहल अछि। मुदा जँ अपना सभ ओहि वस्तु केँ प्राप्त कैए लेने छी जकर आशा रखैत छी, तँ ओकरा “आशा” नहि कहल जाइत अछि। जकरा कोनो वस्तु प्राप्त भऽ गेल छैक, से तकर आशा किएक करत?
25
मुदा अपना सभ ओहि वस्तुक आशा करैत छी जे देखैत नहि छी, आ तेँ धैर्यपूर्बक ओकर प्रतीक्षा करैत छी।
26
एही तरहेँ पवित्र आत्मा सेहो अपना सभक दुर्बलता मे सहायता करैत छथि, किएक तँ अपना सभ नहि जनैत छी जे अपना सभ केँ प्रार्थना कोन तरहेँ करबाक चाही, मुदा आत्मा अपने कुहरि-कुहरि कऽ अपना सभक लेल विनती करैत छथि, जकरा शब्द मे व्यक्त नहि कयल जा सकैत अछि।
27
और परमेश्वर, जे अपना सभक हृदयक भेद केँ जनैत छथि, से जनैत छथि जे आत्माक अभिप्राय की छनि, कारण, आत्मा परमेश्वरक इच्छाक अनुसार हुनकर लोक सभक लेल विनती करैत छथि।
28
अपना सभ जनैत छी जे परमेश्वर सँ प्रेम कयनिहार लोक, अर्थात् हुनका उद्देश्यक अनुरूप बजाओल गेल लोक सभक लेल प्रत्येक परिस्थिति मे परमेश्वर भलाइ उत्पन्न करैत छथि।
29
परमेश्वर अपना लोक केँ शुरुए सँ चिन्हैत छलाह, आ ओकरा सभक लेल ओ ई निश्चित कयलनि जे ओ सभ हुनकर पुत्रक समरूप बनय, जाहि सँ यीशु मसीह बहुतो भाय सभक जेठ भाय ठहरथि।
30
जकरा सभक लेल ओ ई निश्चित कयलनि जे ओ सभ हुनकर पुत्रक समरूप बनय, तकरा सभ केँ ओ बजौलनि सेहो, आ जकरा सभ केँ बजौलनि तकरा सभ केँ धार्मिक सेहो ठहरौलनि। जकरा सभ केँ ओ धार्मिक ठहरौलनि, तकरा सभ केँ ओ अपन महिमा मे सहभागी सेहो बनौलनि।
31
एहि बात सभक सम्बन्ध मे आब अपना सभ की कही? जँ परमेश्वर अपना सभक पक्ष मे छथि तँ अपना सभक विरोध मे के भऽ सकत?
32
परमेश्वर अपन निज पुत्र केँ जँ बँचा कऽ नहि रखलनि, बल्कि अपना सभ गोटेक लेल दऽ देलनि, तखन की ओ खुशी सँ अपना पुत्रक संग सभ किछु अपना सभ केँ नहि देताह?
33
परमेश्वरक चुनल लोक सभ पर के दोष लगाओत? परमेश्वर स्वयं अपना सभ केँ धार्मिक ठहरा रहल छथि,
34
तँ फेर अपना सभ केँ दण्डक आज्ञा के दऽ सकत? मसीह यीशु तँ स्वयं अपना सभक लेल मरलाह—एतबे नहि, ओ जिआओल सेहो गेलाह आ परमेश्वरक दहिना कात विराजमान भऽ अपना सभक पक्ष मे विनती करैत छथि।
35
अपना सभ केँ मसीहक प्रेम सँ के अलग कऽ सकैत अछि? की कष्ट, वा संकट, वा अत्याचार, वा अकाल, वा गरीबी, वा खतरा, वा तरुआरि?
36
जेना कि धर्मशास्त्र मे लिखल अछि, “अहाँक लेल दिन भरि हम सभ वध कयल जाइत छी। वध होमऽ वला भेँड़ा सभ जकाँ हम सभ मानल गेल छी।”
37
नहि! अपना सभ सँ जे प्रेम कयने छथि तिनका द्वारा अपना सभ एहि सभ बात मे पूर्ण विजय पबैत छी।
38
किएक तँ हमरा पूर्ण विश्वास अछि जे, ने मृत्यु आ ने जीवन, ने स्वर्गदूत आ ने नरकदूत, ने वर्तमान आ ने भविष्य, ने कोनो तरहक शक्ति,
39
ने आकाश आ ने पाताल, और ने सौंसे सृष्टि मे आरो कोनो वस्तु अपना सभ केँ परमेश्वरक ओहि प्रेम सँ अलग कऽ सकत जे ओ अपना सभक प्रभु, मसीह यीशु, द्वारा प्रगट कयलनि।
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