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Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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Romans 14
Romans 14
Maithili - 2010 (Jivən Səndesh)
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1
जे व्यक्ति विश्वास मे कमजोर अछि, तकरा स्वीकार करू और व्यक्तिगत विचारधाराक कारण ओकरा सँ वाद-विवाद नहि करू।
2
केओ विश्वास करैत अछि जे सभ प्रकारक भोजन कयनाइ उचित अछि। दोसर, जकर विश्वास कमजोर अछि, से मात्र साग-पात खाइत अछि।
3
जे व्यक्ति सभ चीज खाइत अछि, से शाकाहारी केँ हेय दृष्टि सँ नहि देखय, आ ने शाकाहारी तकरा पर दोष लगाबय, जे सभ चीज खाइत अछि, कारण, परमेश्वर ओकरा स्वीकार कयने छथि।
4
अहाँ के छी जे दोसराक नोकर पर दोष लगबैत छी? ओ ठीक करैत अछि वा नहि, से ओकर अपन मालिक कहताह, आ ओ अवश्य ठीक ठहरत, कारण प्रभु ओकरा ठीक करबाक सामर्थ्य देथिन।
5
केओ एक दिन केँ दोसर दिन सँ नीक मानैत अछि आ दोसर व्यक्ति सभ दिन केँ बराबरि बुझैत अछि। एहन विषय सभक सम्बन्ध मे प्रत्येक व्यक्ति अपना मोन मे निश्चय करओ।
6
जे व्यक्ति कोनो दिन केँ विशेष मानैत अछि से ओकरा प्रभुक आदरक लेल विशेष मानैत अछि। जे माँसु खाइत अछि से प्रभुक आदरक लेल खाइत अछि, कारण, ओ तकरा लेल प्रभु केँ धन्यवाद दैत अछि। आ जे परहेज करैत अछि से प्रभुक आदरक लेल परहेज करैत अछि और ओहो प्रभु केँ धन्यवाद दैत अछि।
7
अपना सभ मे सँ केओ ने तँ अपना लेल जीबैत छी आ ने अपना लेल मरैत छी।
8
जँ जीवित रहैत छी तँ प्रभुक लेल आ जँ मरैत छी तँ प्रभुक लेल। तेँ अपना सभ जीबी वा मरी, प्रभुएक छी।
9
एही लेल मसीह मरलाह आ जीवित भऽ उठलाह जाहि सँ ओ मरल सभ आ जीवित सभ, दूनूक प्रभु होथि।
10
तखन अहाँ अपना भाय पर किएक दोष लगबैत छी? और एम्हर, अहाँ जे छी, अहाँ अपना भाय केँ हेय दृष्टि सँ किएक देखैत छी? कारण, अपना सभ गोटे केँ तँ परमेश्वरक न्याय-सिंहासनक सम्मुख ठाढ़ होयबाक अछि,
11
किएक तँ धर्मशास्त्र मे लिखल अछि जे, “प्रभु कहैत छथि जे, हमर जीवनक सपत प्रत्येक व्यक्ति हमरा समक्ष ठेहुनिया देत, आ प्रत्येक व्यक्ति अपना मुँह सँ स्वीकार करत जे हमहीं परमेश्वर छी।”
12
एहि सँ ई स्पष्ट अछि जे अपना सभ मे सँ प्रत्येक गोटे केँ अपन जीवनक लेखा परमेश्वर केँ देबऽ पड़त।
13
तेँ आब सँ अपना सभ एक-दोसर पर दोष लगौनाइ छोड़ि दी। निश्चय कऽ लिअ जे अपन भायक बाट पर रोड़ा नहि अटकायब वा जाल नहि ओछायब।
14
हम प्रभु यीशुक लोक होयबाक कारणेँ जनैत छी, हमरा एहि बातक पूर्ण निश्चय अछि, जे कोनो भोजन अपने मे अशुद्ध नहि अछि। मुदा जँ कोनो व्यक्ति ओकरा अशुद्ध मानैत अछि तँ ओ वस्तु ओकरा लेल अशुद्ध अछि।
15
अहाँ जे वस्तु खाइत छी ताहि कारणेँ जँ अहाँक भाय केँ चोट लगैत छैक तँ अहाँ अपना भायक संग प्रेमपूर्ण आचरण नहि कऽ रहल छी। ओहि भायक लेल मसीह अपन प्राण देलनि, तँ अहाँ अपन भोजन द्वारा ओकर विनाशक कारण नहि बनू।
16
जे बात अहाँ नीक मानैत छी तकरा निन्दाक विषय नहि बनऽ दिअ।
17
कारण, परमेश्वरक राज्य खयनाइ-पिनाइक बात नहि अछि, बल्कि परमेश्वरक पवित्र आत्मा सँ प्राप्त धार्मिकता, शान्ति आ आनन्दक बात अछि।
18
जे केओ एहि तरहेँ मसीहक सेवा करैत अछि, तकरा सँ परमेश्वर प्रसन्न रहैत छथिन आ ओकरा लोको सभ नीक मानैत छैक।
19
तेँ अपना सभ एही प्रयत्न मे रही जे ओहने बात सभ करी जाहि बात सभ सँ मेल-मिलापक वृद्धि होइत अछि आ जाहि द्वारा अपना सभ एक-दोसराक आत्मिक उन्नति कऽ सकब।
20
परमेश्वर जे काज कऽ रहल छथि तकरा भोजनक कारणेँ नहि बिगाड़ू। ई सत्य अछि जे सभ भोजन अपने मे शुद्ध अछि मुदा जँ कोनो वस्तु खयबाक कारणेँ दोसर व्यक्ति ओ खयबाक लेल प्रेरित भऽ जाइत अछि जे ओ गलत मानैत अछि, तँ खयनिहारक लेल ओ वस्तु खयनाइ गलत भऽ जाइत अछि।
21
जँ अहाँक माँसु-मदिराक सेवन सँ वा अहाँक आन कोनो काज कयनाइ अहाँक भायक लेल पाप करबाक कारण बनत, तँ उचित ई होयत जे अहाँ तकर परहेज करब।
22
एहि बात सभक सम्बन्ध मे अहाँक जे धारणा होअय, तकरा परमेश्वरक सम्मुख अपना धरि सीमित राखू। धन्य अछि ओ मनुष्य जे जाहि बात केँ ओ ठीक बुझैत अछि, ताहि कारणेँ अपना केँ दोषी नहि पबैत अछि।
23
मुदा जे व्यक्ति सन्देह कऽ कऽ खाइत अछि, से दोषी ठहरैत अछि, कारण, ओ विश्वास सँ नहि खाइत अछि; आ जे किछु एहि विश्वास सँ नहि कयल जाइत अछि जे ई ठीक अछि, से पाप अछि।
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