bible
ra
🌐 Language
English
Español
Français
Deutsch
Português
Italiano
Nederlands
Русский
中文
日本語
한국어
العربية
Türkçe
Tiếng Việt
ไทย
Indonesia
All Languages
Home
/
Hindi
/
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
/
Proverbs 12
Proverbs 12
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 13 →
1
जो मनुष्य शिक्षा से प्रेम करता है, वह ज्ञान-प्रिय भी होता है; पर जो डांट-फटकार से घृणा करता है, वह पशु के समान नासमझ है।
2
प्रभु भले मनुष्य पर कृपा करता है, पर वह बुरी योजनाएं रचनेवाले को दण्ड देता है।
3
मनुष्य दुष्कर्म के द्वारा स्थापित नहीं होता; पर धार्मिक मनुष्य की जड़ें नहीं उखड़तीं।
4
चरित्रवान पत्नी अपने पति की शोभा है, पर व्यभिचारिणी पत्नी मानो अपने पति की हड्डियों का क्षय है!
5
धार्मिक मनुष्य के विचार न्यायसंगत होते हैं पर दुर्जन सदा छल-कपट की बातें सोचता है।
6
दुर्जन के शब्द हिंसा से भरे होते हैं, किन्तु धार्मिक मनुष्य के वचन लोगों को बचाते हैं।
7
दुर्जन का पतन होता है, पृथ्वी से उसका नामोनिशान मिट जाता है; परन्तु धार्मिक मनुष्य का वंश सदा बना रहता है।
8
मनुष्य की प्रशंसा उसकी सद्बुद्धि के लिए होती है, किन्तु कुटिल हृदयवाले मनुष्य से सब लोग घृणा करते हैं।
9
साधारण मनुष्य, जो मेहनत की सूखी रोटी खाता है, वह बड़प्पन-प्रिय मनुष्य से श्रेष्ठ है जिसके पास खाने के लिए रोटी भी नहीं!
10
धार्मिक मनुष्य अपने पशु के प्राण की भी चिन्ता करता है; पर दुर्जन की दया भी निर्दयता के समान होती है!
11
जो किसान अपनी भूमि को स्वयं जोतता-गोड़ता है, उसको रोटी का अभाव नहीं होता! पर जो मनुष्य व्यर्थ की योजनाओं में समय गुजारता है, वह नासमझ है!
12
दुर्जनों का सुदृढ़ गढ़ भी ढह जाता है; पर धार्मिक मनुष्य की जड़ें गहरी होती हैं।
13
दुर्जन अपने मुंह से निकले शब्दों के जाल में स्वयं फंस जाता है, पर धार्मिक मनुष्य संकट आने पर भी बच जाता है।
14
मनुष्य को अपने वचनों के फल के अनुरूप उत्तम वस्तुएं प्राप्त होती हैं, और वह सन्तुष्ट होता है; मनुष्य जैसा कार्य करता है वैसा ही उसको फल मिलता है।
15
मूर्ख मनुष्य को अपना आचरण अपनी दृष्टि में उचित लगता है, पर बुद्धिमान मनुष्य दूसरों की सलाह को ध्यान से सुनता है।
16
मूर्ख मनुष्य अपनी चिढ़ तत्काल प्रकट कर देता है, किन्तु व्यवहार-कुशल मनुष्य अपना अपमान पी जाता है।
17
सच बोलनेवाला गवाह सच्ची साक्षी देता है; पर झूठा गवाह झूठ के अतिरिक्त कुछ नहीं बोलता।
18
बिना सोच-विचार के बोलनेवाले मनुष्य के शब्द तलवार की तरह बेधते हैं; पर बुद्धिमान की बातें मलहम का काम करती हैं।
19
सत्यनिष्ठ ओंठों के वचन अमर रहते हैं; किन्तु झूठी जीभ की बातें क्षणभंगुर होती हैं।
20
बुरी योजना रचनेवाले के दिल में छल-कपट भरा रहता है; परन्तु कल्याणकारी योजना बनानेवाला आनन्द-मग्न रहता है।
21
धार्मिक मनुष्य अनिष्ट से बचा रहता है; पर दुर्जन विपत्ति से घिरा रहता है।
22
प्रभु झूठ बोलनेवाले मनुष्यों से घृणा करता है; पर जो मनुष्य सच्चाई से काम करते हैं, उनसे प्रभु प्रसन्न होता है।
23
चतुर मनुष्य अपना ज्ञान छिपाकर रखता है; पर मूर्ख अपनी मूर्खता का प्रदर्शन करता है।
24
कठोर परिश्रम करनेवाला व्यक्ति शासक बनता है; पर आलसी मनुष्य दूसरों की बेगार करता है।
25
मनुष्य के मन की चिन्ता उसको दबा देती है; पर एक सुभाषित वचन उसको आनन्दित कर देता है।
26
धार्मिक मनुष्य दुराचरण से दूर रहता है, पर दुर्जन का मार्ग उसको विनाश की ओर ले जाता है।
27
आलसी मनुष्य अपने लक्ष्य तक कभी नहीं पहुंच पाता, किन्तु कठोर परिश्रम करनेवाला व्यक्ति अपार धन-सम्पत्ति अर्जित कर लेता है।
28
धर्म का मार्ग जीवन का मार्ग है; पर टेढ़े रास्ते पर चलना मृत्यु को बुलावा देना है।
← Chapter 11
Jump to:
Chapter 1
Chapter 2
Chapter 3
Chapter 4
Chapter 5
Chapter 6
Chapter 7
Chapter 8
Chapter 9
Chapter 10
Chapter 11
Chapter 12
Chapter 13
Chapter 14
Chapter 15
Chapter 16
Chapter 17
Chapter 18
Chapter 19
Chapter 20
Chapter 21
Chapter 22
Chapter 23
Chapter 24
Chapter 25
Chapter 26
Chapter 27
Chapter 28
Chapter 29
Chapter 30
Chapter 31
Chapter 13 →
All chapters:
1
2
3
4
5
6
7
8
9
10
11
12
13
14
15
16
17
18
19
20
21
22
23
24
25
26
27
28
29
30
31