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Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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Proverbs 24
Proverbs 24
Hindi Bible CLBSI 2015 (पवित्र बाइबिल CL Bible (BSI))
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1
दुर्जनों की सम्पत्ति देखकर उनसे ईष्र्या मत करना, और न उनकी संगति की इच्छा करना।
2
वे सदा हिंसा की बातें सोचते हैं, उनके मुंह से अनिष्ट की बातें निकलती हैं।
3
घर बुद्धि से बनता है, और वह समझ के द्वारा सुदृढ़ होता है।
4
उसके कमरे ज्ञान के द्वारा बहुमूल्य और मनोहर वस्तुओं से भर जाते हैं।
5
बलवान से बुद्धिमान और शक्तिमान से ज्ञानवान अधिक शक्तिशाली होता है।
6
क्योंकि बुद्धिमान मनुष्यों के निर्देशन में तुम युद्ध जीत सकते हो; अनेक सलाहकारों के होने से विजय निश्चित होती है।
7
मूर्ख के लिए बुद्धि उसकी पहुंच से परे होती है; वह सभा में अपना मुंह नहीं खोलता।
8
जो मनुष्य बुरे काम करने की योजनाएं बनाता है, उसको लोग दुष्कर्मी कहते हैं।
9
मूर्खतापूर्ण सोच-विचार भी पाप है, ज्ञान की हंसी उड़ानेवाले से लोग घृणा करते हैं।
10
यदि तुम संकटकाल में हताश हो जाते हो तो निस्सन्देह तुम में शक्ति का अभाव है।
11
जिनको मृत्यु के घाट पर लाया जा रहा है, उनको छुड़ाओ; वध होनेवालों को बचाओ!
12
यदि तू कहेगा, ‘हम उनको नहीं जानते।’ तो, मेरे पुत्र, हृदय को तौलनेवाला परमेश्वर तेरे विचार को जानता है; तेरी आत्मा की चौकसी करनेवाला परमेश्वर तेरा अभिप्राय जानता है। क्या वह तेरे कर्म के अनुसार तुझे फल नहीं देगा?
13
मेरे पुत्र, शहद खा, क्योंकि वह अच्छा है। शहद के छत्ते से टपकनेवाली बून्दें स्वाद में मीठी होती हैं।
14
यह बात जाने ले, कि तेरे प्राण को भी बुद्धि ऐसी ही मीठी लगेगी। यदि तू बुद्धि को पा लेगा तो तेरा भविष्य सुखद हो जाएगा, तेरी आशा पर तुषार-पात न होगा।
15
दुर्जन धार्मिक मनुष्य के घर को नष्ट करने के लिए घात लगाकर बैठता है; तू ऐसा मत करना। धार्मिक मनुष्य के निवास-स्थान को मत उजाड़ना।
16
क्योंकि धार्मिक मनुष्य सात बार गिरकर भी फिर खड़ा हो जाता है, किन्तु दुर्जन विपत्ति के बवण्डर में जड़ से उखड़ जाता है।
17
मेरे पुत्र, अपने शत्रु के पतन से आनन्दित मत होना; जब उसको ठोकर लगे तब तू हृदय में आनन्द मत मनाना।
18
अन्यथा प्रभु यह देखकर अप्रसन्न होगा, और उस पर से अपनी कोपपूर्ण दृष्टि हटा लेगा।
19
दुष्कर्मियों के वैभव के कारण मत कुढ़ना, दुर्जनों की सफलता के कारण उन से द्वेष न करना;
20
क्योंकि बुरे काम करनेवाले मनुष्य का भविष्य अन्धकारमय होता है; दुर्जन का जीवन-दीप बुझ जाएगा।
21
मेरे पुत्र, देश के राजा से डरना, तथा प्रभु का भय मानना; उनकी आज्ञाओं की उपेक्षा मत करना।
22
वे अचानक विपत्ति ढाहते हैं। कौन जानता है कि वे किस प्रकार की विपत्ति ढाहेंगे?
23
विद्वानों ने यह भी कहा है: न्याय करते समय पक्षपात करना अनुचित है।
24
जो न्यायाधीश दुर्जन से यह कहता है: ‘तू निर्दोष है!’ उसको जनता शाप देगी, लोग उससे घृणा करेंगे।
25
किन्तु दुर्जन को डांटनेवाले न्यायाधीश जनता की दृष्टि में आदरणीय होंगे, उन पर शुभ आशिषों की वर्षा होगी।
26
जो सही उत्तर देता है, वह सच्ची मित्रता प्रकट करता है।
27
पहले अपने घर के बाहर का काम पूरा करो, अपने खेत को तैयार रखो, तब अपना घर बसाना।
28
अकारण अपने पड़ोसी के विरुद्ध साक्षी मत देना; उसको झूठी बातों से धोखा भी मत देना।
29
उसके विषय में यह मत कहना: ‘जैसा उसने मेरे साथ किया है वैसा ही मैं उसके साथ करूँगा। जो व्यवहार उसने मेरे साथ किया है, उसका प्रतिफल मैं उसको दूंगा।’
30
मैं एक दिन आलसी मनुष्य के खेत-से, एक मूर्ख किसान के अंगूर-उद्यान से गुजरा।
31
तो मैंने देखा कि खेत में कंटीली झाड़ियां उग आयी हैं, भूमि बिच्छू पौधे से ढक गई है; उसकी पत्थर की दीवार भी गिर गई है।
32
यह देखके मैंने विचार किया खेत-उद्यान पर दृष्टि डाली तो यह शिक्षा मिली:
33
‘यदि तू काम के समय थोड़ी भी नींद लेगा, थोड़ी झपकी लेगा, छाती पर हाथ रखकर थोड़ा आराम करेगा,
34
तो डाकू के समान गरीबी तुझ पर टूट पड़ेगी, हथियार-बन्द शत्रु के सदृश अभाव तुझे घेर लेगा।’
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